New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM Republic Day offer UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 28th Jan., 2026 GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM Republic Day offer UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 28th Jan., 2026 GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM

शिक्षा संस्थानों में मासिक धर्म स्वास्थ्य और गरिमा व समानता का मुद्दा

संदर्भ

  • हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय में घोषित किया कि मासिक धर्म स्वास्थ्य (Menstrual Health) और शैक्षणिक संस्थानों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (Menstrual Hygiene Management: MHM) तक पहुँच संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन एवं गरिमा के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है। 
  • यह विषय न केवल स्वास्थ्य से जुड़ा है, बल्कि शिक्षा, लैंगिक समानता और मानव गरिमा के व्यापक प्रश्नों से भी संबंधित है। यह निर्णय न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ द्वारा दिया गया।

निर्णय की संवैधानिक दृष्टि

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गरिमा कोई अमूर्त आदर्श नहीं है बल्कि इसका वास्तविक अर्थ उन परिस्थितियों से है जिनमें व्यक्ति अपमान, बहिष्करण एवं अनावश्यक कष्ट के बिना जीवन जी सके।
  • मासिक धर्म से गुजर रही बालिकाओं के लिए MHM सुविधाओं की अनुपलब्धता उन्हें कलंक, रूढ़िबद्ध सोच एवं अपमान का शिकार बनाती है। 
  • सुरक्षित एवं स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन के अभाव में छात्राओं को या तो विद्यालय से अनुपस्थित रहना पड़ता है या असुरक्षित तरीकों को अपनाना पड़ता है जो गरिमापूर्ण जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

शिक्षा का अधिकार और मासिक धर्म गरीबी

  • न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि मासिक धर्म गरीबी (Menstrual Poverty) बालिकाओं को बालक विद्यार्थियों या सक्षम आर्थिक वर्ग के छात्रों के समान गरिमापूर्ण शिक्षा का अधिकार प्रयोग करने से वंचित करती है।
  • प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा में व्यवधान के दीर्घकालिक एवं गंभीर दुष्परिणाम होते हैं। इस प्रकार MHM सुविधाओं का अभाव निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की संवैधानिक गारंटी को भी कमजोर करता है।

मासिक धर्म स्वच्छता की व्यापक चुनौतियाँ

  • सामाजिक व सांस्कृतिक वर्जनाएँ (Taboos)
  • स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति (Drop-out) में वृद्धि
  • बार-बार संक्रमण और स्वास्थ्य जोखिम
  • स्वच्छता अवसंरचना और कचरा निपटान की कमी

निजता एवं शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन

  • यह निर्णय डॉ. जया ठाकुर द्वारा दायर एक रिट याचिका पर आधारित था, जिसमें देशभर के स्कूलों में MHM सुविधाओं की कमी को उजागर किया गया था।
  • न्यायालय ने माना कि विद्यालयों में MHM उपायों की अनुपस्थिति छात्राओं के निजता के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) का उल्लंघन है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

  • न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को व्यापक निर्देश जारी किए, जिनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:
    • सरकारी एवं निजी, शहरी व ग्रामीण सभी विद्यालयों में कार्यशील, लैंगिक रूप से पृथक शौचालयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
    • छात्राओं को ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएँ। ऐसा अधिमानतः शौचालय परिसर में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों के माध्यम से किया जाए।
    • विद्यालयों में ‘MHM कॉर्नर’ स्थापित किए जाएँ, जिनमें अतिरिक्त अंतर्वस्त्र, अतिरिक्त यूनिफॉर्म, डिस्पोज़ेबल बैग और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो।

कुछ संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 21: जीवन एवं व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार
  • अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
  • अनुच्छेद 15: लिंग आधारित भेदभाव का निषेध
  • अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार
  • अनुच्छेद 47 (नीति निर्देशक सिद्धांत): सार्वजनिक स्वास्थ्य का संवर्धन

गरिमा, स्वायत्तता और विकल्प

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी बालिका की यह अपेक्षा पूरी तरह वैध है कि वह निजता और गरिमा के साथ मासिक धर्म का प्रबंधन कर सके। संसाधनों की कमी को उसकी शारीरिक स्वायत्तता पर हावी नहीं होने दिया जा सकता है।
  • MHM केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निर्णय की स्वतंत्रता, पर्याप्त उत्पाद, जल की उपलब्धता और स्वच्छ निपटान तंत्र शामिल हैं।

‘गरिमा बनाम शिक्षा’ के विकल्प की अवास्तविकता 

  • न्यायालय ने कहा कि राज्य किसी बालिका को गरिमा एवं शिक्षा में से किसी एक को चुनने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। 
  • सैनिटरी नैपकिन की अनुपलब्धता एक लैंगिक-विशिष्ट बाधा उत्पन्न करती है जो विद्यालय में उपस्थिति और शिक्षा की निरंतरता को प्रभावित करती है।
  • निर्णय में एक अलग खंड में न्यायालय ने पुरुष शिक्षकों और छात्रों को मासिक धर्म की जैविक वास्तविकता के प्रति शिक्षित और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि मासिक धर्म से गुजर रही छात्राओं के साथ उत्पीड़न, अपमानजनक या अनावश्यक प्रश्न से बचा जा सके।

RTE अधिनियम और जवाबदेही

  • यदि सरकारी विद्यालय RTE अधिनियम, 2009 की धारा 19 (बालक-बालिकाओं के लिए पृथक शौचालय सहित मानक) का पालन नहीं करते हैं, तो राज्य उत्तरदायी होगा।
  • वहीं निजी विद्यालयों के लिए अनुपालन न करने की स्थिति में मान्यता रद्द किए जाने और अन्य दंडात्मक कार्रवाइयों का प्रावधान किया गया है।

कुछ सरकारी प्रयास 

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अंतर्गत मासिक धर्म स्वच्छता योजना
  • समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों में शौचालय निर्माण
  • स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से स्वच्छता अवसंरचना पर बल

आगे की राह

  • स्कूलों में सार्वभौमिक स्वच्छता मानक निर्धारित करना
  • सैनिटरी पैड की नियमित और निःशुल्क उपलब्धता
  • सुरक्षित निपटान हेतु इंसीनरेटर या पर्यावरण-अनुकूल समाधान
  • मासिक धर्म शिक्षा को स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना
  • केंद्र-राज्य और निजी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय मासिक धर्म को स्वास्थ्य, शिक्षा, गरिमा और समानता के व्यापक संवैधानिक विमर्श से जोड़ता है। यह न केवल छात्राओं के लिए एक अधिकार-आधारित सुरक्षा कवच प्रदान करता है बल्कि राज्य की भूमिका को कल्याणकारी दायित्व से आगे बढ़ाकर संवैधानिक उत्तरदायित्व के रूप में स्थापित करता है। यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र में लैंगिक न्याय और गरिमापूर्ण शिक्षा की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR