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भारत में MSME ऋण अंतर: चुनौतियाँ एवं समाधान

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक आर्थिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र -3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ 

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘समय पर एवं पर्याप्त’ ऋण तक पहुंच की कमी के साथ-साथ जनशक्ति की कमी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) के सामने प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं।

SIDBI रिपोर्ट के बारे में

  • शीर्षक : ‘भारतीय एम.एस.एम.ई. क्षेत्र को समझना: प्रगति एवं चुनौतियां’
  • आधार : 19 क्षेत्रों में 2,000 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम स्तर के उद्यमों (एम.एस.एम.ई.) के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार।
  • उद्देश्य : एम.एस.एम.ई. क्षेत्र में ऋण अंतर के कारणों, प्रभावों व समाधानों का विश्लेषण।
    • यह क्षेत्र 12 करोड़ नौकरियाँ प्रदान करता है और भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था लक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु 

  • कुल ऋण मांग : MSME क्षेत्र की वित्तीय मांग 123 लाख करोड़ रुपए आंकी गई है जिसमें से 92 लाख करोड़ रुपए ऋण मांग है। इसमें से 64 लाख करोड़ रुपए के ऋण आवेदन को योग्य माना गया है। हालाँकि, केवल 34 लाख करोड़ रुपए के ऋण ही औपचारिक संस्थानों द्वारा प्रदान किए जा रहे हैं जिससे 30 लाख करोड़ रुपए का अंतर रह जाता है।
  • क्षेत्रीय असमानताएँ: मध्यम उद्यमों (29%) और महिला-स्वामित्व वाले व्यवसायों (35%) के लिए ऋण अंतराल सर्वाधिक है। कार्यशील पूंजी पर निर्भर रहने वाले और संपार्श्विक (Collateral- ऋण के बदले गिरवी के लिए) की कमी का सामना करने वाले व्यापार क्षेत्र में 33% का अंतर है। इसके बाद सेवा क्षेत्र में यह अंतराल 27% है।
  • औपचारीकरण की चुनौतियाँ : मार्च 2025 तक उद्यम एवं उद्यम सहायता पोर्टल पर 6.2 करोड़ से अधिक MSMEs पंजीकृत हैं, फिर भी सर्वेक्षण किए गए उद्यमों में से 35% अपंजीकृत हैं जो जागरूकता की कमी या नियामक जाँच के डर के कारण हो सकता है।
  • अनौपचारिक ऋण पर निर्भरता: 17% MSMEs ने किसी भी प्रकार का ऋण नहीं लिया है और 8% अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं। सूक्ष्म इकाइयों में 12% अनौपचारिक रूप से ऋण लेते हैं जबकि लघु एवं मध्यम उद्यमों में यह केवल 2-3% है।
  • डिजिटल ऋण की संभावना: वर्तमान में केवल 18% MSMEs डिजिटल ऋण का उपयोग करते हैं जबकि 90% से अधिक डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं, जो फिनटेक-आधारित समाधानों के लिए तैयारियों को दर्शाता है, विशेषकर खाद्य प्रसंस्करण, होटल एवं रेडीमेड गारमेंट्स जैसे क्षेत्रों में।

ऋण अंतराल के कारण

  • औपचारिक वित्त तक सीमित पहुँच : सूक्ष्म उद्यम एवं महिला-स्वामित्व वाले व्यवसायों को प्राय: संपार्श्विक, क्रेडिट हिस्ट्री या दस्तावेज की कमी के कारण औपचारिक ऋण नहीं मिल पाता है।
  • अनौपचारिक अर्थव्यवस्था: MSMEs का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक रूप से संचालित होता है जो जागरूकता की कमी या नियामक अनुपालन के डर के कारण औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर रहता है।
  • उच्च जोखिम की धारणा : बैंक एवं वित्तीय संस्थान MSMEs (विशेष रूप से सूक्ष्म इकाइयों) को अस्थिर नकदी प्रवाह तथा संपत्तियों की कमी के कारण उच्च जोखिम वाले उधारकर्ता मानते हैं।
  • जटिल ऋण प्रक्रियाएँ: जटिल दस्तावेजीकरण, लंबी स्वीकृति प्रक्रियाएँ और उच्च ब्याज दरें MSMEs को औपचारिक ऋण लेने से रोकती हैं।
  • क्षेत्रीय एवं सेक्टोरल भिन्नताएँ: कुछ क्षेत्रों (जैसे- व्यापार, सेवाएँ) और अल्प विकसित बैंकिंग बुनियादी ढांचे वाले क्षेत्रों में ऋण अंतराल अधिक स्पष्ट है।

MSME ऋण अंतराल के व्यापक परिणाम

  • आर्थिक विकास: MSMEs भारत के जी.डी.पी. में लगभग 30% और निर्यात में 45% का योगदान देते हैं। लगातार ऋण अंतराल उनकी वृद्धि को बाधित करता है, जिससे 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की महत्वाकांक्षा को खतरा है।
  • रोजगार सृजन: 12 करोड़ से अधिक नौकरियों वाले इस क्षेत्र में अपर्याप्त वित्तपोषण से रोजगार सृजन सीमित होता है, जिससे बेरोजगारी की चुनौतियाँ बढ़ती हैं।
  • लैंगिक असमानता: महिला-स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए 35% ऋण अंतराल आर्थिक बहिष्कार को बढ़ाता है और उद्यमिता में लैंगिक समानता को बाधित करता है।
  • क्षेत्रीय असमानताएँ: असमान ऋण पहुंच क्षेत्रीय आर्थिक असंतुलन को बढ़ाता है, विशेष रूप से ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहाँ सूक्ष्म उद्यमों का वर्चस्व है।

ऋण अंतराल को कम करने के लिए सरकारी पहल

  • क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE): 2 करोड़ रुपए तक के बिना संपार्श्विक ऋण प्रदान करता है। हालाँकि, जागरूकता व पहुंच सीमित है।
  • मुद्रा योजना: सूक्ष्म उद्यमों के लिए 10 लाख रुपए तक के ऋण प्रदान करती है, फिर भी कई पात्र इकाइयाँ जागरूकता या दस्तावेजीकरण समस्याओं के कारण बाहर रह जाती हैं।
  • उद्यम पंजीकरण पोर्टल: औपचारिकता को सुगम बनाता है किंतु अपंजीकृत इकाइयों की संख्या अभी भी अधिक है।
  • डिजिटल इंडिया एवं फिनटेक: डिजिटल भुगतान और वैकल्पिक क्रेडिट स्कोरिंग मॉडल को बढ़ावा देता है किंतु इसका पूर्ण उपयोग अभी बाकी है।

आगे की राह

  • डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का विस्तार: डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले 90% MSMEs को लक्षित करते हुए डिजिटल ऋण मंचों को बढ़ावा देना।
  • वैकल्पिक क्रेडिट स्कोरिंग: गैर-पारंपरिक डाटा (जैसे- डिजिटल लेनदेन, बिक्री रिकॉर्ड) का उपयोग करके सूक्ष्म एवं अनौपचारिक इकाइयों के लिए क्रेडिट योग्यता का आकलन करना।
  • फिनटेक साझेदारी: फिनटेक कंपनियों के साथ सहयोग बढ़ाकर त्वरित व कम दस्तावेजीकरण वाले ऋण प्रदान करना।
  • सरलीकृत प्रक्रियाएँ: ऋण आवेदन प्रक्रियाओं को सरल करना, दस्तावेजीकरण कम करना और ब्याज दरों को कम करना।
  • जागरूकता अभियान: सरकारी योजनाओं और औपचारिकता के लाभों के बारे में ग्रामीण एवं सूक्ष्म उद्यमों में जागरूकता बढ़ाना।
  • प्रत्यक्ष सब्सिडी व अनुदान: 22% MSMEs ने प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता की मांग की है जो कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा कर सकती है।
  • महिला उद्यमियों के लिए लक्षित योजनाएँ: महिला-स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए विशेष ऋण उत्पाद और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना।

निष्कर्ष

MSME क्षेत्र भारत की आर्थिक वृद्धि और समावेशी विकास की कुंजी है किंतु 30 लाख करोड़ रुपए का ऋण अंतराल इसकी क्षमता को सीमित करता है। डिजिटल ऋण, वैकल्पिक क्रेडिट मॉडल और लक्षित नीतिगत सुधारों के माध्यम से इस अंतराल को पाटना न केवल आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा, बल्कि रोजगार सृजन, लैंगिक समानता व क्षेत्रीय संतुलन को भी मजबूत करेगा।

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