हाल ही में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) ने भारत में जैव प्रौद्योगिकी और सेल थेरेपी को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता किया है। यह समझौता हैदराबाद स्थित मेसर्स हेलिक्स सेल थेरेप्यूटिक्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ किया गया है।
इस परियोजना का उद्देश्य मल्टीपल मायलोमा कैंसर के इलाज के लिए नई डुअल-टार्गेटिंग सीएआर-टीसेल तकनीक विकसित करना और उसका प्रथम चरण का क्लिनिकल परीक्षण करना है। यह परियोजना भारत-सिंगापुर सहयोग के तहत सिंगापुर की बायोसेल इनोवेशन्स के साथ मिलकर संचालित की जाएगी।
परियोजना के संदर्भ में प्रमुख बिंदु
यह परियोजना मल्टीपल मायलोमा नामक गंभीर रक्त कैंसर के इलाज के लिए नई और उन्नत सीएआर-टी सेल थेरेपी विकसित करने पर आधारित है। मल्टीपल मायलोमा एक ऐसी बीमारी है जो मरीज को बहुत कमजोर बना देती है और अभी तक इसका पूरी तरह इलाज संभव नहीं है।
इस नई तकनीक का उद्देश्य कैंसर कोशिकाओं पर मौजूद दो मार्कर बीसीएमए और सीडी19 को एक साथ निशाना बनाकर इलाज को अधिक प्रभावी बनाना और मरीजों में लंबे समय तक बीमारी को नियंत्रित रखना है।
इस परियोजना के अंतर्गत हेलिक्स सेल थेरेप्यूटिक्स नई पीढ़ी की दोहरे लक्ष्यीकरण वाली सीएआर-टी कोशिकाओं का विकास, निर्माण और प्रथम चरण के क्लिनिकल परीक्षण करेगी। वस्तुतः यह उपचार खासतौर पर उन मरीजों के लिए विकसित किया जा रहा है जिन्होंने पहले कई उपचार लिए हैं, लेकिन जिनके पास अब बहुत कम उपचार विकल्प बचे हैं।
मल्टीपल मायलोमा कैंसर के बारे में
मल्टीपल मायलोमा एक प्रकार का रक्त कैंसर है जो अस्थि मज्जा में मौजूद प्लाज्मा कोशिकाओं में विकसित होता है।
अस्थि मज्जा हड्डियों के केंद्र में स्थित एक नरम, स्पंजी ऊतक होता है। स्वस्थ अस्थि मज्जा में , सामान्य प्लाज्मा कोशिकाएं संक्रमण से शरीर की रक्षा के लिए एंटीबॉडी बनाती हैं।
मल्टीपल मायलोमा में, प्लाज्मा कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं में परिवर्तित हो जाती हैं जो अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और संक्रमण से लड़ने में मदद करने वाली सामान्य कोशिकाओं को विस्थापित कर देती हैं।
ये घातक प्लाज्मा कोशिकाएं फिर एम प्रोटीन नामक एक असामान्य एंटीबॉडी का उत्पादन करती हैं , जिसका उच्च स्तर मल्टीपल मायलोमा की एक प्रमुख विशेषता है।
बीमारी के लक्षण
रक्ताल्पता
प्रतिरक्षा प्रणाली में कमी
प्लेटलेट की संख्या कम होना (थ्रोम्बोसाइटोपेनिया)
गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी और गुर्दे की विफलता
हड्डी की क्षति
अतिकैल्शियमरक्तता
मायलोमा किसे प्रभावित करता है ?
अधिकतर लोगों में 60 वर्ष की आयु के बाद इस बीमारी का पता चलता है।
पुरुषों में महिलाओं की तुलना में इस बीमारी के होने की संभावना अधिक होती है।
अन्य नस्लों के लोगों की तुलना में अश्वेत लोगों में मल्टीपल मायलोमा विकसित होने की संभावना अधिक होती है।
यदि किसी भाई या बहन या माता-पिता को मल्टीपल मायलोमा है, तो इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
सीएआर टी-सेल थेरेपी क्या है ?
काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (CAR) टी-सेल थेरेपी एक आधुनिक प्रतिरक्षा उपचार (इम्यूनोथेरेपी) है।
यह थेरेपी मुख्य रूप से कुछ प्रकार के रक्त कैंसर के इलाज में उपयोग की जाती है। इसमें शरीर की टी-कोशिकाओं (T-cells) को इस तरह बदला जाता है कि वे कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर अधिक प्रभावी तरीके से नष्ट कर सकें।
इस प्रक्रिया में डॉक्टर मरीज की टी-कोशिकाओं में एक नया जीन जोड़ते हैं। इससे ये कोशिकाएं कैंसर से लड़ने में अधिक मजबूत और सक्षम बन जाती हैं।
कुछ मरीजों में सीएआर टी-सेल थेरेपी से रक्त कैंसर पूरी तरह नियंत्रित या ठीक भी हो सकता है। वहीं, कई मामलों में यह मरीजों को अधिक समय तक स्वस्थ जीवन जीने में मदद करती है।