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नवीन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) श्रृंखला

संदर्भ 

  • सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी दस्तावेज़ों के अनुसार, 2024 को आधार वर्ष मानकर तैयार किए गए भारत के संशोधित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य एवं पेय पदार्थों का भारांश 45.86% से घटकर 36.75% कर दिया जाएगा। 
  • इसके समानांतर आवास का हिस्सा CPI टोकरी में बढ़ाया गया है। किराए में वृद्धि को मापने की उन्नत पद्धतियों के साथ यह बदलाव आवासीय मुद्रास्फीति को ऊपर ले जा सकता है जिसका प्रभाव समग्र खुदरा मुद्रास्फीति पर दबाव के रूप में दिखाई दे सकता है। 

CPI में खाद्य पदार्थों के अधिक भारांश संबंधी चिंता

  • भारत के CPI में खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी लंबे समय से काफी अधिक रही है। इसके परिणामस्वरुप खाद्य कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव प्राय: हेडलाइन मुद्रास्फीति को प्रभावित करता है, भले ही अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रहे। 
  • जून 2025 से खाद्य मुद्रास्फीति नकारात्मक स्तर पर पहुंच गई, जहां खाद्य वस्तुओं की कीमतें लगातार पिछले वर्ष की तुलना में कम बनी रहीं। इसके चलते हेडलाइन CPI में तेज गिरावट दर्ज की गई और अक्टूबर 2025 में यह 0.25% के ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर आ गई। इसी दौरान खाद्य मुद्रास्फीति भी –5.02% के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई।

मुद्रास्फीति आंकड़ों पर नए CPI भारांश का प्रभाव 

  • विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सूचकांकों को यथावत रखते हुए नए भारांशों के आधार पर CPI की पुनर्गणना की जाए, तो:
    • खाद्य मुद्रास्फीति के निम्न स्तर पर रहने की स्थिति में समग्र CPI 20–30 आधार अंक अधिक हो सकता है।
    • वहीं, जब खाद्य मुद्रास्फीति उच्च होगी, तब CPI वर्तमान श्रृंखला की तुलना में 20–30 आधार अंक कम रह सकता है। 

मौजूदा CPI को लेकर RBI की असहजता 

  • भारतीय रिज़र्व बैंक के दृष्टिकोण से खाद्य पदार्थों का अत्यधिक भारांश चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि मौजूदा CPI 2011–12 के उपभोग पैटर्न पर आधारित है जो वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता है। 
  • अर्थशास्त्री अर्न्स्ट एंजेल के सिद्धांत के अनुसार, आय में वृद्धि के साथ खाद्य पर होने वाला व्यय अनुपातिक रूप से घटता है। हालिया भारतीय आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं।
  • नवीनतम CPI टोकरी MoSPI द्वारा किए गए 2023–24 घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES) पर आधारित है जिसके अनुसार:
    • ग्रामीण परिवारों में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग में भोजन की हिस्सेदारी 2011–12 के 52.9% से घटकर 47.04% रह गई है।
    • शहरी परिवारों में यह हिस्सा 42.62% से घटकर 39.68% हो गया है। 
  • घरेलू व्यय में खाद्य वस्तुओं की घटती भूमिका इस बात को स्पष्ट करती है कि CPI में खाद्य भारांश को कम करना आवश्यक है ताकि मुद्रास्फीति के आंकड़े अधिक स्थिर, प्रासंगिक एवं वर्तमान उपभोग व्यवहार के अनुरूप हों। 

CPI में खाद्य भारांश घटने से RBI को राहत 

  • RBI मुख्यतः ब्याज दरों के माध्यम से मांग को प्रभावित कर मुद्रास्फीति को नियंत्रित करता है। हालांकि, खाद्य कीमतों में आने वाले आपूर्ति-पक्षीय आघातों से निपटने की उसकी क्षमता सीमित रहती है क्योंकि ब्याज दरों में बदलाव से कृषि उत्पादन या खाद्य आपूर्ति में त्वरित परिवर्तन संभव नहीं होता है।
  • पूर्व में उच्च खाद्य मुद्रास्फीति के कारण हेडलाइन मुद्रास्फीति ऊंची बनी रही, जिससे कमजोर मांग की स्थिति में भी RBI के लिए ब्याज दरों में कटौती करना कठिन हो गया। इससे मौद्रिक नीति के निर्णय और अधिक जटिल हो गए।
  • इसी संदर्भ में आर्थिक सर्वेक्षण 2023–24 ने यह सुझाव दिया था कि भारत को खाद्य वस्तुओं को बाहर रखकर मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण पर विचार करना चाहिए या नहीं।
  • RBI ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए तत्कालीन गवर्नर शक्तिकांत दास ने स्पष्ट किया था कि अस्थायी खाद्य मुद्रास्फीति को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है किंतु लगातार बनी रहने वाली उच्च खाद्य मुद्रास्फीति की अनदेखी संभव नहीं है। 

वर्तमान मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचा 

  • कानूनी रूप से RBI को लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) ढांचे के तहत CPI मुद्रास्फीति को 4% पर बनाए रखना होता है जिसमें 2 से 6% की सहनशीलता सीमा निर्धारित है।
  • यह ढांचा फिलहाल समीक्षा के दौर में है और अप्रैल से शुरू होने वाले आगामी पांच वर्षों के लिए नया लक्ष्य मार्च तक घोषित किए जाने की संभावना है। अधिकांश अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि FIT ढांचा अपने मौजूदा स्वरूप में ही जारी रहेगा, हालांकि CPI की संरचना में बदलाव—विशेष रूप से खाद्य भारांश में कमी RBI को नीति संचालन में अधिक लचीलापन प्रदान कर सकता है।

नई CPI टोकरी: प्रमुख बदलाव 

  • नई CPI श्रृंखला की समय-सीमा: नई CPI टोकरी के श्रेणीगत व्यापक भारांश पहले ही जारी किए जा चुके हैं। इसके तहत जनवरी के लिए पहला मुद्रास्फीति आंकड़ा 12 फरवरी को जारी किया जाना है। इससे पूर्व विस्तृत मद-वार भारांश प्रकाशित किए जाने हैं।
  • विस्तारित कवरेज: नई टोकरी में अब 358 वस्तुएं शामिल होंगी, जबकि पहले यह संख्या 299 थी, जो बदलते उपभोग पैटर्न को दर्शाता है।
  • श्रेणियों का पुनर्गठन: MoSPI द्वारा CPI श्रेणियों का पुनर्वर्गीकरण किया गया है जिससे पुराने संस्करण से सीधी तुलना करना कठिन हो गया है। उदाहरण के तौर पर, शिक्षा सेवाओं को अब 3.33% भारांश के साथ एक स्वतंत्र श्रेणी बनाया गया है जबकि पहले यह ‘विविध’ श्रेणी के अंतर्गत 4.46% भारांश के साथ शामिल थी।
  • पुरानी और नई श्रृंखलाओं का संयोजन: निरंतरता बनाए रखने के लिए विशेषज्ञ समूह ने CPI-2012 और CPI-2024 के बीच एक लिंकिंग फैक्टर जारी करने की सिफारिश की है जो अखिल भारतीय, ग्रामीण एवं शहरी सूचकांकों के लिए CPI 2024 की पहली रिलीज के साथ उपलब्ध कराया जाएगा।

खाद्य भारांश घटा, आवास का महत्व बढ़ा 

  • नई CPI श्रृंखला में खाद्य पदार्थों का भारांश घटाया गया है जिससे मुद्रास्फीति में उतार-चढ़ाव कम होने की संभावना है।
  • इसके विपरीत, आवास का भार 10.07% से बढ़कर 17.66% कर दिया गया है। 

आवास भारांश में वृद्धि के कारण 

  • आवासीय उपयोगिताओं, जैसे- पानी, बिजली, गैस और अन्य ईंधन को शामिल करते हुए कवरेज का विस्तार।
  • 2023–24 HCES के अनुसार किराए पर बढ़ता खर्च:
    • ग्रामीण क्षेत्रों में किराए की हिस्सेदारी 0.45% से बढ़कर 0.56% हो गई।
    • शहरी क्षेत्रों में यह 6.24% से बढ़कर 6.58% हो गई। 

मुद्रास्फीति पर संभावित प्रभाव 

खाद्य भारांश में कमी से हेडलाइन CPI की अस्थिरता में कमी आने की उम्मीद है। हालाँकि, आवास के बढ़े हुए भारांश और पद्धतिगत बदलावों—जैसे किराया गणना से नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए आवास को बाहर रखने के कारण आवासीय मुद्रास्फीति बढ़ सकती है जिससे समग्र मुद्रास्फीति पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका है। 

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