New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM Republic Day offer UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 28th Jan., 2026 GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM Republic Day offer UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 28th Jan., 2026 GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM

पार्वती गिरि  

भारत के प्रधानमंत्री ने पार्वती गिरि की जन्म सदी के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान और आजीवन सामाजिक सेवा के प्रति उनकी निष्ठा को याद किया। 

पार्वती गिरि के बारे में 

  • पार्वती गिरि (1926–1995) ओडिशा की प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेविका थीं।
  • गरीबों, आदिवासियों व समाज के हाशिए पर स्थित वर्गों के लिए उनके निस्वार्थ मानवीय कार्यों के कारण उन्हें व्यापक रूप से ‘पश्चिमी ओडिशा की मदर टेरेसा’ कहा जाता है।

प्रारंभिक जीवन 

  • पार्वती गिरि का जन्म 19 जनवरी, 1926 को ओडिशा के बरगढ़ जिले के समलाईपादर गांव में हुआ था। 
  • वे कांग्रेस नेताओं द्वारा संचालित राष्ट्रवादी गतिविधियों से गहराई से प्रभावित थीं, जिनमें उनके चाचा रामचंद्र गिरि की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 
  • उन्होंने कम उम्र में ही औपचारिक शिक्षा छोड़ दी और 1938 तक कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़ गईं। 
  • इसी दौर में उन्होंने गांधीवादी विचारधारा को अपने जीवन का आधार बना लिया। 

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका 

  • पार्वती गिरि ने 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी की और खादी व चरखा आंदोलन के माध्यम से ग्रामीण जनता को संगठित किया। 
  • मात्र 16 वर्ष की आयु में उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया, रैलियों का नेतृत्व किया और ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी।
  • वे अपने साहसिक प्रतिरोध कार्यों के लिए जानी जाती थीं, जिनमें भारतीयों से ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान भी शामिल था। 
  • इन गतिविधियों के चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया और लगभग दो वर्षों तक कारावास में रहना पड़ा। 
  • उनके निडर राष्ट्रवाद और जनआंदोलन को संगठित करने की क्षमता के कारण उन्हें ‘बनही कन्या’ की उपाधि से भी नवाजा गया। 

सामाजिक और मानवीय सेवा 

  • पार्वती गिरि ने जमीनी स्तर की सक्रियता, संस्थाओं के निर्माण और समुदाय-आधारित सेवा कार्यों के लिए प्रसिद्धि प्राप्त की।
  • स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 1951 के ओडिशा अकाल के दौरान राहत कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
  • इसके अलावा, उन्होंने जेल सुधार, कुष्ठ रोग उन्मूलन और आदिवासी समुदायों के कल्याण के लिए निरंतर कार्य किया।

अंतिम वर्ष और सम्मान 

  • उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए भारत सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 1984 में उन्हें सम्मानित किया। 
  • वर्ष 1988 में संबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की।
  • 17 अगस्त, 1995 को उनका निधन हो गया। वे अपने पीछे सेवा, त्याग एवं नैतिक सार्वजनिक जीवन से जुड़ी एक प्रेरक विरासत छोड़ गईं जो आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं व राष्ट्रसेवकों को मार्गदर्शन देती है। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR