संदर्भ
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसीए) की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया है। यह धारा किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्यों के निर्वहन के दौरान कथित रूप से किए गए अपराध की जांच शुरू करने से पहले उचित सरकार की पूर्व स्वीकृति को अनिवार्य बनाती है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 : पृष्ठभूमि
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act – PCA) भारत का प्राथमिक भ्रष्टाचार-विरोधी कानून है, जो लोक सेवकों द्वारा आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए भ्रष्ट आचरण से संबंधित अपराधों को नियंत्रित करता है।
- इस अधिनियम की उत्पत्ति संथानम समिति (1962–64) की सिफारिशों से जुड़ी है, जिसने सार्वजनिक जीवन में बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता व्यक्त करते हुए एक मजबूत और व्यापक कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया था।
- पीसीए, 1988 ने पूर्ववर्ती कानूनों को समेकित और सुदृढ़ किया तथा रिश्वतखोरी, आपराधिक कदाचार और आधिकारिक पद के दुरुपयोग से जुड़े कृत्यों को दंडनीय अपराध घोषित किया। अधिनियम में “लोक सेवक” की परिभाषा को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश और सार्वजनिक कर्तव्यों के लिए नियुक्त अन्य व्यक्ति शामिल हैं।
- समय के साथ, न्यायिक व्याख्याओं और विधायी संशोधनों ने इस कानून को इस तरह विकसित किया है कि एक ओर ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से संरक्षण मिले और दूसरी ओर भ्रष्ट आचरण के लिए सख्त जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
धारा 17A और इसका विधायी उद्देश्य
- धारा 17A को भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 के माध्यम से पीसीए में जोड़ा गया। इस प्रावधान के अनुसार, किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णयों या सिफारिशों से संबंधित किसी भी पूछताछ या जांच को प्रारंभ करने से पहले संबंधित सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
- इस प्रावधान के पीछे विधायी तर्क यह था कि ईमानदार अधिकारी तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण जांचों के भय से जोखिम लेने और निर्णायक फैसले करने से बच रहे थे। नीति-निर्माताओं का मानना था कि अत्यधिक जांच-पड़ताल से “नीतिगत गतिरोध” (policy paralysis) की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, विशेषकर आर्थिक और प्रशासनिक विवेक से जुड़े मामलों में।
- यह भी उल्लेखनीय है कि पीसीए में पहले से ही धारा 19 मौजूद है, जिसके अंतर्गत किसी न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार के अपराध का संज्ञान लेने से पहले अभियोजन स्वीकृति आवश्यक है। धारा 17A इस संरक्षण को जांच के प्रारंभिक चरण तक विस्तारित करती है।
पूर्व स्वीकृति पर न्यायिक मिसालें
- सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक रूप से भ्रष्टाचार की जांच पर कार्यपालिका के अत्यधिक नियंत्रण को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।
- विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998) में न्यायालय ने “एकल निर्देश” को निरस्त कर दिया, जिसके तहत वरिष्ठ अधिकारियों की जांच से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी।
- इसी प्रकार, सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई (2014) में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6A को अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक घोषित किया गया।
- इन निर्णयों ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि भ्रष्टाचार की जांच में पद या स्थिति के आधार पर भेदभाव कानून के समक्ष समानता और जवाबदेही के सिद्धांत को कमजोर करता है।
धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला
- हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया।
- एक न्यायाधीश ने इस प्रावधान को वैध ठहराते हुए कहा कि यह ईमानदार अधिकारियों को उत्पीड़न से बचाने और “सुरक्षित रहने” वाली नौकरशाही मानसिकता को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। हालांकि, उन्होंने यह महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी कि स्वीकृति तंत्र में लोकपाल या लोकायुक्त जैसे स्वतंत्र निकाय की भूमिका होनी चाहिए, न कि केवल कार्यपालिका का नियंत्रण।
- दूसरे न्यायाधीश ने धारा 17A को असंवैधानिक मानते हुए कहा कि यह पहले से अमान्य घोषित किए गए सुरक्षा उपायों को नए रूप में पुनः प्रस्तुत करती है। उनके अनुसार, यह प्रावधान अनुच्छेद 14 के तहत उचित वर्गीकरण की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, विशेषकर तब जब अभियोजन चरण में धारा 19 के तहत पर्याप्त संरक्षण पहले से उपलब्ध है।
- विभाजित निर्णय के कारण यह मामला अब बड़ी पीठ के समक्ष अंतिम निर्णय के लिए भेज दिया गया है।
शासन और जवाबदेही के निहितार्थ
- यह विवाद शासन व्यवस्था से जुड़े मूलभूत प्रश्नों को सामने लाता है।
- अत्यधिक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय भ्रष्टाचार-विरोधी एजेंसियों की प्रभावशीलता को कम कर सकते हैं और जांच में देरी का कारण बन सकते हैं।
- वहीं, बिना किसी नियंत्रण के जांचों का दुरुपयोग राजनीतिक या प्रशासनिक प्रतिशोध के साधन के रूप में भी किया जा सकता है।
- यह बहस प्रशासनिक दक्षता, निर्णय-निर्माण की स्वायत्तता तथा समानता और कानून के शासन जैसे संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
आगे की राह और प्रणालीगत सुधार
- संवैधानिक प्रश्न से परे, यह मामला भ्रष्टाचार से निपटने की प्रणालीगत चुनौतियों को उजागर करता है। प्रभावी भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए
- त्वरित जांच और समयबद्ध मुकदमे
- झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को दंडित करने वाले तंत्र
- अनुमोदन प्रक्रिया में पारदर्शिता और
- संस्थागत स्वतंत्रता व न्यायिक निगरानी अत्यंत आवश्यक हैं।
- आने वाले समय में बड़ी पीठ का निर्णय यह तय करेगा कि भारत का भ्रष्टाचार-निरोधी ढांचा जवाबदेही और प्रशासनिक संरक्षण के बीच किस प्रकार का संतुलन स्थापित करता है।