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भारत में महिलाओं के संपत्ति अधिकार

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान व निकाय)

संदर्भ

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की है कि किसी पुत्री को अपने पिता के घर में रहने का अधिकार है और इसे संपत्ति एवं पारिवारिक कानून के तहत उसके कानूनी अधिकारों का हिस्सा माना है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय 

  • उच्च न्यायालय उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें एक महिला ने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ विवाद के बाद अपने पिता के घर से बेदखली के विरुद्ध सुरक्षा की मांग की।
  • न्यायालय के अनुसार किसी पुत्री (चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित) के पास अपने पैतृक घर में रहने का अधिकार है।
  • ऐसे निवास अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सहदायिक अधिकारों और आश्रय के अधिकार से जुड़े हैं।
    • सहदायिक अधिकार (Coparcenary Rights) हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) में जन्म से ही संपत्ति में अधिकार प्राप्त करने की स्थिति को कहते हैं।
  • हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के अनुसार पुत्रियाँ पैतृक संपत्ति में समान सहदायिक हैं। 
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA) महिलाओं के ‘साझा घरेलू’ अधिकारों को मान्यता देता है।

हालिया निर्णय का महत्त्व 

  • संपत्ति एवं उत्तराधिकार कानूनों में लैंगिक समानता को मजबूतकरने पर बल
  • समानता (अनुच्छेद 14) और गैर-भेदभाव (अनुच्छेद 15) की संवैधानिक गारंटी को सुदृढ़ीकरण
  • महिलाओं के संपत्ति अधिकारों में प्रगतिशील न्यायिक प्रवृत्तियों के अनुरूप

भारत में महिला संपत्ति अधिकार संबंधी प्रावधान 

संवैधानिक प्रावधान 

  • अनुच्छेद 14 : कानून के समक्ष समानता
  • अनुच्छेद 15(1) एवं (3) : कोई भेदभाव नहीं; राज्य महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।
  • अनुच्छेद 21 : जीवन के अधिकार में आश्रय का अधिकार शामिल है।

विधिक प्रावधान

  • हिंदू विधि : हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और संशोधन अधिनियम, 2005
    • वर्ष 2005 से पूर्व : पुत्रियों के पैतृक संपत्ति में सीमित अधिकार थे; विवाहित पुत्रियों को सहदायिक अधिकारों से बाहर रखा गया था।
    • वर्ष 2005 के संशोधन के पश्चात् : पुत्रियां भी पुत्रों के समान सहदायिक हैं। अधिकार जन्म से होता है और पिता के जीवित रहने पर निर्भर नहीं करता है।
      • पैतृक संपत्ति का बंटवारा करने और उत्तराधिकार प्राप्त करने के समान पुत्रियों के  अधिकार।
  • मुस्लिम विधि 
    • शरीयत के तहत महिलाओं को हिस्सेदार के रूप में उत्तराधिकार प्राप्त होता है; हिस्सा प्राय: पुरुष उत्तराधिकारी के हिस्से का आधा होता है।
    • मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित है।
  • ईसाई एवं पारसी विधि  
    • भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में उत्तराधिकार में पुत्र एवं पुत्रियों के समान अधिकार हैं।

ऐतिहासिक निर्णय

  • विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा वाद, 2020 : इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुत्री का सहदायिक अधिकार जन्म से ही होता है, भले ही पिता की मृत्यु 2005 से पहले हो गई हो।
  • प्रकाश बनाम फुलवती वाद, 2016 : यदि पिता की मृत्यु वर्ष 2005 से पहले हो जाती है तो प्रारंभ में अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था (बाद में विनीता शर्मा द्वारा रद्द कर दिया गया)।
  • दानम्मा बनाम अमर वाद, 2018 : सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि वर्ष 1956 अधिनियम से पहले जन्म लेने पर भी पुत्रियों को अधिकार प्राप्त हैं क्योंकि अधिकार जन्म से ही प्रवाहित होते हैं।
  • सतीश चंद्र आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा वाद, 2020 : इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने  घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत ‘साझा घरेलू’ अधिकारों का विस्तार किया।
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