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पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन केवल नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों जैसे प्राकृतिक जलस्रोतों तक सीमित नहीं है। यदि कोई जलस्रोत मानव-निर्मित या कृत्रिम रूप से विकसित किया गया हो किंतु वह पर्यावरणीय या पारिस्थितिक उद्देश्यों की पूर्ति करता हो, तो उस पर भी यह सिद्धांत समान रूप से लागू होगा। 

पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन के बारे में

  • यह एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत है जिसके तहत कुछ प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक संसाधनों को सार्वजनिक हित में सुरक्षित रखना अनिवार्य माना गया है। 
  • इसकी उत्पत्ति रोमन विधि से मानी जाती है और आगे चलकर इसे अंग्रेज़ी कॉमन लॉ में विकसित किया गया।
  • इस सिद्धांत के दायरे में ज्वारीय क्षेत्र, नदियाँ, झीलें, आर्द्रभूमियाँ व विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र जैसे संसाधन आते हैं।
  • इसका मूल आधार यह है कि कुछ संसाधन इतने महत्त्वपूर्ण और सार्वजनीन उपयोग के होते हैं कि उन्हें निजी स्वामित्व में देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है। 

आधारभूत तत्व

  • इन संसाधनों का वास्तविक स्वामी जनता को माना जाता है जबकि सरकार उनकी संरक्षक (ट्रस्टी) के रूप में कार्य करती है।
  • सरकार पर यह दायित्व है कि वह इनका संरक्षण और संवर्धन सुनिश्चित करे, ताकि आम नागरिक उनका लाभ उठा सकें।
  • यदि किसी संसाधन का निजी या औद्योगिक उपयोग जनहित के विपरीत हो तो सरकार उसे अनुमति नहीं दे सकती है। 

सरकार की शक्तियों पर प्रमुख सीमाएँ

  • ट्रस्ट के अंतर्गत आने वाली संपत्ति का उपयोग केवल सार्वजनिक हित में होना चाहिए तथा वह आम जनता के लिए सुलभ रहनी चाहिए।
  • ऐसी संपत्ति को, चाहे उचित मूल्य ही क्यों न मिले, निजी पक्ष को हस्तांतरित या विक्रय नहीं किया जा सकता है।
  • इन संसाधनों का संरक्षण विशेष रूप से उन उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए, जिनके लिए वे स्वाभाविक रूप से उपयुक्त हैं। 
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