संदर्भ
केंद्र सरकार ने भारत की कीटनाशक नियामक प्रणाली में सुधार के उद्देश्य से कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025 का संशोधित प्रारूप जारी किया है तथा इस पर नागरिकों और हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए हैं।
पृष्ठभूमि: भारत में कीटनाशक नियमन
- वर्तमान में भारत में कीटनाशकों का विनियमन कीटनाशक अधिनियम, 1968 और उससे संबद्ध नियमों के अंतर्गत किया जाता है जिनका निर्माण लगभग पचास वर्ष पूर्व हुआ था।
- यह कानून उस दौर की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया गया था, जब कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों पर भारी निर्भरता थी और पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य पर उनके दुष्प्रभावों को लेकर जागरूकता सीमित थी।
कीटनाशक अधिनियम, 1968 से जुड़ी समस्याएँ
- नकली एवं निम्न गुणवत्ता वाले कीटनाशकों का बढ़ता प्रसार
- मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव और विशेषकर किसानों में विषाक्तता व संपर्क से जुड़ी बीमारियाँ
- पर्यावरण को होने वाला नुकसान और मृदा व जल स्रोतों का प्रदूषण
- प्रवर्तन तंत्र की कमजोरी और पुराने नियामक उपाय
- इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सरकारों ने कीटनाशक अधिनियम, 1968 को प्रतिस्थापित करने के लिए नए व व्यापक कानून लाने के प्रयास किए। वर्ष 2008, 2018 एवं 2020 में विधेयकों के मसौदे प्रस्तुत किए गए किंतु वे कानून का रूप नहीं ले सके।
कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025 के बारे में
- कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025 भारत की कीटनाशक प्रशासन व्यवस्था को आधुनिक व प्रभावी बनाने की दिशा में नवीनतम प्रयास है।
- इस विधेयक का उद्देश्य देश में कीटनाशकों के निर्माण, आयात-निर्यात, भंडारण, बिक्री, वितरण तथा उपयोग को सुव्यवस्थित ढंग से नियंत्रित करना है।
विधेयक के प्रमुख लक्ष्य
- मानव, पशुओं एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले जोखिमों को कम करना
- कीटनाशकों के सुरक्षित और प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करना
- पारदर्शिता, अनुरेखण (ट्रेसेबिलिटी) और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना
- किसानों को बेहतर सेवाएँ उपलब्ध कराना तथा जीवन की सुगमता में सुधार करना
- यह विधेयक कीटनाशक अधिनियम, 1968 को निरस्त करने का प्रस्ताव करता है, जिससे कीटनाशक नियमन के लिए एक नया और आधुनिक विधायी ढांचा स्थापित किया जा सके।
विधेयक के अंतर्गत संस्थागत व्यवस्था
पंजीकरण समिति
- विधेयक के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा एक पंजीकरण समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें निम्नलिखित संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे-
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
- औषधि महानियंत्रक (Drugs Controller General of India)
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
- रसायन एवं पेट्रोकेमिकल्स विभाग
- राष्ट्रीय स्तर का कोई विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान
समिति के प्रमुख कार्य
- कीटनाशकों का पंजीकरण करना
- सुरक्षा से संबंधित मुद्दों की समीक्षा करना
- राज्यों द्वारा लगाए गए अस्थायी प्रतिबंधों की जाँच करना
केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड
- विधेयक में एक केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड के गठन का भी प्रावधान है जिसकी निम्नलिखित जिम्मेदारियाँ होंगी-
- विधेयक के अंतर्गत शामिल किए जाने वाले कीटनाशकों की अनुशंसा करना
- अच्छे निर्माण व्यवहार (GMP) के मानक निर्धारित करना
- कीटनाशकों की वापसी (रिकॉल) के लिए दिशा-निर्देश तय करना
- विषाक्तता के मामलों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) बनाना
- कीटनाशकों एवं उनके पैकेजिंग के सुरक्षित निपटान हेतु मार्गदर्शन देना
राज्य सरकारों की भूमिका
- प्रस्तावित विधेयक के तहत राज्य सरकारों को सीमित नियामक अधिकार दिए गए हैं जिसके तहत वे-
- किसी कीटनाशक या उसके किसी विशेष बैच की बिक्री, वितरण या उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगा सकती हैं।
- यह प्रतिबंध अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए हो सकता है।
- हालाँकि, ऐसे किसी भी आदेश की समीक्षा पंजीकरण समिति द्वारा की जाएगी और राज्यों को स्थायी प्रतिबंध लगाने या स्वतंत्र दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होगा। यद्यपि इस सीमित की भूमिका को लेकर विशेषज्ञों और नागरिक समाज संगठनों ने आपत्तियाँ जताई हैं।
2025 के मसौदे से जुड़ी प्रमुख कमियाँ और आशंकाएँ
- यद्यपि इसे संशोधित मसौदा कहा गया है, फिर भी 2025 का प्रारूप 2020 के मसौदे की तुलना में अपेक्षाकृत कम ठोस सुधार प्रस्तुत करता है। इसकी प्रमुख चिंताएँ इस प्रकार हैं-
- कमजोर विधायी शब्दावली: विधेयक केवल ‘जोखिम कम करने का प्रयास’ करने की बात करता है, न कि उसे सुनिश्चित करने की।
- आपराधिक उत्तरदायित्व का अभाव: दुरुपयोग, विषाक्तता या पर्यावरणीय क्षति के मामलों में निर्माताओं और वितरकों की स्पष्ट आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की गई है।
- राज्यों की सीमित शक्तियाँ: राज्य सरकारें खतरनाक कीटनाशकों पर स्थायी प्रतिबंध लगाने में सक्षम नहीं हैं।
- मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था नहीं: कीटनाशकों की ऊँची कीमतों और किसानों की वहन क्षमता से जुड़ा कोई प्रावधान नहीं है।
- कमजोर शिकायत निवारण तंत्र: प्रभावित किसानों के लिए मुआवज़े और दायित्व निर्धारण की स्पष्ट प्रणाली का अभाव है।
- विशेषज्ञों का मत है कि सशक्त प्रवर्तन और स्पष्ट जवाबदेही के बिना यह विधेयक प्रभावी नियमन सुनिश्चित नहीं कर पाएगा।
आगे की दिशा
- सरकार ने इस विधेयक पर 2 फरवरी, 2026 तक सार्वजनिक टिप्पणियाँ और हितधारकों की राय आमंत्रित की है। विधेयक के लंबे विधायी इतिहास तथा किसानों, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पर्यावरण संगठनों द्वारा उठाई गई लगातार चिंताओं को देखते हुए यह परामर्श प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
- साथ ही, यह विधेयक व्यापक नीतिगत उद्देश्यों के अनुरूप है, जिनमें शामिल हैं-
- जैविक और पारंपरिक कीट नियंत्रण विधियों को बढ़ावा देना
- खतरनाक रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता को कम करना
- नियामक पारदर्शिता के माध्यम से किसानों के विश्वास को मजबूत करना