संदर्भ
देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court of India) ने एक अभूतपूर्व फैसला सुनाते हुए देश के नागरिकों को एक नया संवैधानिक कवच दिया है। न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से सीमांकित फुटपाथों (Demarcated Footpaths) पर चलना अब केवल एक नागरिक सुविधा नहीं, बल्कि संविधान के भाग III के अंतर्गत मिला एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। अपने निर्णय में अदालत ने साफ किया कि सड़कों पर चलने वाले राहगीरों का हक, गाड़ियों की आवाजाही से कहीं ऊपर है। इसके साथ ही कोर्ट ने पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों से जुड़ा फुटपाथ पर चलने का अधिकार
- शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पैदल चलना मनुष्य की सबसे बुनियादी गतिविधि है, जो हर तरह के वाहनों के आविष्कार से भी पहले से मौजूद है। इसलिए, अच्छी स्थिति वाले फुटपाथों तक लोगों की पहुँच एक अनिवार्य संवैधानिक हक है। कोर्ट ने इस अधिकार को संविधान के कई प्रमुख अनुच्छेदों का अभिन्न हिस्सा माना है:
- अनुच्छेद 21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्वक एवं निरस्त्र सभा करने का अधिकार
- अनुच्छेद 19(1)(c): संघ, संगठन एवं सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार
- अनुच्छेद 19(1)(d): भारत के राज्यक्षेत्र में स्वतंत्रतापूर्वक संचरण का अधिकार
प्रशासनिक निकायों की तय होगी जवाबदेही
- अदालत के इस फैसले ने पैदल यात्री बुनियादी ढांचे (Pedestrian Infrastructure) को प्रशासनिक इच्छाशक्ति के भरोसे छोड़ने के बजाय एक कानूनी बाध्यता बना दिया है। अब जहाँ भी सड़क का निर्माण होगा, वहाँ फुटपाथ बनाना प्रशासन का अनिवार्य कर्तव्य होगा।
उत्तरदायी निकाय (Duty Bearers):
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- शहरी विकास प्राधिकरण (Urban Development Authorities)
- नगर निगम (Municipal Corporations)
- नगरपालिकाएं और ग्राम पंचायतें
- इन सभी संस्थाओं को अपने कार्यक्षेत्र में फुटपाथों को चिन्हित करना होगा, उनका उचित रखरखाव करना होगा और उन्हें हर प्रकार के अतिक्रमण या प्रशासनिक उपेक्षा से मुक्त रखना होगा ताकि राहगीर बिना किसी डर के चल सकें।
मोटर वाहनों के एकाधिकार पर चोट
- वर्तमान शहरी नियोजन (Urban Planning) पर तीखी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था केवल गाड़ियों और मोटरों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है, जिससे पैदल चलने वाले हाशिए पर चले जाते हैं। कोर्ट ने अपने स्पष्ट वक्तव्य में कहा कि सार्वजनिक सड़कों और स्थानों पर केवल गाड़ियों का एकाधिकार नहीं हो सकता। सभी नागरिकों को सड़क पर समान अधिकार मिलना चाहिए।
लापरवाही पर देना होगा भारी मुआवजा
- इस फैसले की सबसे बड़ी बात यह है कि फुटपाथ न होने, उन पर अतिक्रमण होने या खराब रखरखाव के कारण यदि किसी नागरिक को चोट, नुकसान या परेशानी होती है, तो वे सीधे कानूनी उपचार और मुआवजे की मांग कर सकते हैं।
- विशेष कानूनी अधिकार: यह मुआवजा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाली राशि के अतिरिक्त होगा। पीड़ित नागरिक सीधे संवैधानिक उपचार और लोक अधिकारियों से हर्जाने की मांग कर सकेंगे।
भावुक कर देने वाले एक मामले से उपजा यह ऐतिहासिक फैसला
- यह ऐतिहासिक कानूनी बदलाव एक बेहद दुखद घटना के बाद सामने आया है। स्कूल जा रहे एक 5 वर्षीय मासूम बच्चे की टैंकर की चपेट में आने से मौत हो गई थी, जिसके बाद मुआवजे का यह विवाद शीर्ष अदालत तक पहुँचा।
दावा न्यायाधिकरण (MACT) का फैसला
- चरण 1: मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित परिवार के लिए ₹7.82 लाख का मुआवजा निर्धारित किया।
उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा कटौती
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का अंतिम न्याय
- चरण 3: सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की रकम को बढ़ाकर ₹11.44 लाख किया और इसे दो महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया।
- अदालत ने इस बात को गंभीरता से रेखांकित किया कि दुर्घटना वाली जगह पर न तो कोई फुटपाथ था और न ही जेब्रा क्रॉसिंग। यह स्थिति पैदल यात्रियों की सुरक्षा के प्रति सिस्टम की गहरी लापरवाही को दर्शाती है।
वर्तमान व्यवस्था सभ्यता की समस्या
- अदालत ने माना कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 केवल ड्राइवरों और गाड़ियों के नियमन की बात करता है, लेकिन पैदल चलने वालों के अधिकारों पर मौन है। पीठ (Bench) ने इस अनदेखी को एक सभ्यतागत समस्या करार दिया, जहां इंसानों से ज्यादा तवज्जो गाड़ियों को दी गई है।
पैदल चलने का लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्य
- अदालत ने याद दिलाया कि भारत के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में पैदल चलने (जैसे दांडी यात्रा या पदयात्राएं) का बड़ा सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक महत्व रहा है।
- यह सामाजिक जुड़ाव, अभिव्यक्ति और राजनीतिक प्रतिरोध का एक बड़ा माध्यम रहा है। इसलिए, इसे अनुच्छेद 51A के तहत आजादी के आंदोलनों के आदर्शों को संजोने के कर्तव्य से भी जोड़ा गया है।
नवीन कानून और स्वतंत्र नियामक (Regulator) की मांग
सड़कों पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से एक समर्पित कानून बनाने की सिफारिश की है, जो;
- औपचारिक तौर पर चलने के अधिकार को परिभाषित करे।
- जवाबदेह अधिकारियों और विभागों की जिम्मेदारी तय करे।
- नियमों के उल्लंघन पर तुरंत राहत और कानूनी उपचार की व्यवस्था करे।
- पूरे देश में फुटपाथों की निगरानी, योजना और क्रियान्वयन के लिए एक पूर्णकालिक नियामक प्राधिकरण (Regulatory Authority) का गठन करे।
निष्कर्ष
एक बेहतर और समावेशी लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहां गाड़ियां कितनी रफ्तार से दौड़ती हैं, बल्कि इससे होती है कि वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर समाज के सबसे कमजोर और पैदल चलने वाले नागरिक को कितनी सुरक्षा, सुलभता और सम्मान देता है। भविष्य के शहरी नियोजन को अब इसी सिद्धांत पर आगे बढ़ना होगा।