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समुद्री जलस्तर में वृद्धि तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा

(सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान- अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं और वनस्पति एवं प्राणिजगत में परिवर्तन तथा इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रभाव)

संदर्भ 

  • 21वीं सदी जलवायु परिवर्तन के रूप में एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है और इसके सबसे स्पष्ट स्वरूपों में से एक समुद्री जलस्तर में निरंतर वृद्धि है। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर के तटीय समुदाय पारिस्थितिक व्यवधानों एवं सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का सामना कर रहे हैं।

  • अपनी विशाल तटरेखा के साथ भारत भी इसका अपवाद नहीं है। यह घटना जीवन एवं आजीविका को खतरे में डालने के साथ ही समावेशिता, न्याय व समता के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी बुनियादी चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है।

समुद्री जलस्तर में वृद्धि : धीमी गति से बढ़ती आपदा

  • जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) के अनुसार, 1900 के बाद से वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 20 सेमी. की वृद्धि हुई है तथा हाल के दशकों में यह दर और भी तेज़ हो गई है। 
  • भारत में कोलकाता, मुंबई व चेन्नई जैसे शहर तटीय कटाव, खारे पानी के प्रवेश और बाढ़ के प्रति तेज़ी से संवेदनशील होते जा रहे हैं। 
  • निचले इलाकों के जलमग्न होने के कारण लाखों लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है।

पर्यावरणीय परिवर्तन की मानवीय कीमत

  • बढ़ता समुद्री जलस्तर लाखों लोगों के जीवन में बदलाव लाते हैं। तटीय एवं द्वीपीय समुदायों को प्राय: औपचारिक पुनर्वास नीतियों के बिना अंतर्देशीय प्रवास करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
    • उदाहरण के लिए, सुंदरबन पहले से ही जलवायु-प्रेरित विस्थापन का सामना कर रहा है। 
  • मत्स्य पालन एवं खेती जैसी प्रमुख आजीविकाओं के नष्ट होने से आर्थिक असमानता बढ़ने के साथ ही जलवायु शरणार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। 
    • जलवायु शरणार्थी एक ऐसा समूह है जिसे अभी तक अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत मान्यता नहीं दी गई है।
  • ये बदलाव विशेष रूप से हाशिए पर स्थित वर्गों (जैसे- आदिवासी समूह, महिला एवं गरीबों) को प्रभावित करते हैं जिनमें अनुकूलन की क्षमता न्यूनतम होती है।
  • यह अंतर-राज्यीय प्रवास एवं संसाधन संघर्षों का भी कारण बनता है जिससे शहरी बुनियादी ढाँचे और सामाजिक सामंजस्य पर दबाव पड़ता है।

लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा

  • बढ़ता समुद्री जलस्तर लोकतांत्रिक संस्थाओं के समक्ष एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते  हैं। 
  • लोकतंत्र भागीदारी, न्याय एवं अधिकारों के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। इस संदर्भ में विचारणीय है कि-
    • क्या जलवायु नीतियाँ कमजोर समुदायों को शामिल करती हैं?
    • क्या राहत, पुनर्वास एवं अनुकूलन संसाधनों तक समान पहुँच है?
    • क्या निर्णय लेने में प्रभावित समुदायों के राय को स्थान दिया जाता है?
  • पर्यावरणीय शासन शीर्ष-स्तरीय, तकनीकी-तंत्रात्मक एवं प्राय: जमीनी स्तर की चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने वाला बना हुआ है। 
  • तटीय विकास परियोजनाओं या इको-पर्यटन के नाम पर विस्थापन कमजोर समुदायों को और अलग-थलग कर देती है।
  • इसके अलावा जलवायु निष्क्रियता या संबंधित नीतियों का कमज़ोर कार्यान्वयन लोकतांत्रिक प्रणालियों के जवाबदेही तंत्र की विफलता को दर्शाता है। 

सुझाव 

  • इस चुनौती का सामना करने के लिए भारत को राष्ट्रीय एवं स्थानीय नीतियों में जलवायु न्याय को मुख्यधारा में लाने को प्राथमिकता देनी होगी। इसमें शामिल हैं:
    • जलवायु अनुकूलन में स्थानीय समुदायों को शामिल करते हुए सहभागी योजना बनाना
    • विस्थापित आबादी की सुरक्षा के लिए एक व्यापक जलवायु शरणार्थी नीति लागू करना
    • धीमी गति से शुरू होने वाली जलवायु आपदाओं को शामिल करने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम को मज़बूत बनाना
    • स्मार्ट बुनियादी ढाँचे और समावेशी आवास नीतियों के माध्यम से शहरी लचीलापन बढ़ाना
    • पूर्व चेतावनी प्रणालियों, मैंग्रोव संरक्षण एवं प्रकृति-आधारित समाधानों में निवेश करना
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को जलवायु वार्ताओं में वैश्विक दक्षिण के हित में पहल करनी चाहिए, जिसमें नुकसान एवं क्षति के वित्तपोषण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण व जलवायु समानता पर बल दिया जाना चाहिए।
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