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ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026

संदर्भ 

केंद्र सरकार ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management: SWM) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है। इन नियमों के तहत देशभर में अत्यधिक अपशिष्ट उत्पन्नकर्ताओं (Bulk Waste Generators) तथा स्थानीय निकायों के लिए अपशिष्ट का स्रोत स्तर पर प्रसंस्करण अनिवार्य कर दिया गया है। 

भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन: वर्तमान स्थिति और प्रमुख चुनौतियाँ 

  • भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन वर्तमान में शहरी प्रशासन के समक्ष एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर कर सामने आया है। इसका प्रमुख कारण तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, उपभोग के बदलते स्वरूप और निरंतर जनसंख्या वृद्धि है। 
  • नवीनतम अनुमानों के अनुसार, देश में प्रतिदिन लगभग 1.85 लाख टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है जिसमें से लगभग 30 से 40% अपशिष्ट आवासीय सोसायटियों, वाणिज्यिक परिसरों, संस्थानों एवं सरकारी भवनों जैसे थोक अपशिष्ट उत्पादकों से आता है।
  • हालाँकि, स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) जैसी प्रमुख योजनाओं के अंतर्गत घर-घर कचरा संग्रहण और स्रोत पर पृथक्करण में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी अपशिष्ट प्रसंस्करण की गति, अपशिष्ट उत्पादन के अनुरूप नहीं हो पाई है। आज भी एक बड़ा हिस्सा लैंडफिल में जा रहा है जिससे भूमि क्षरण, भूजल प्रदूषण, वायु गुणवत्ता में गिरावट और जनस्वास्थ्य से जुड़े गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं।
  • स्रोत स्तर पर अपशिष्ट का अपर्याप्त पृथक्करण अब भी एक स्थायी चुनौती बना हुआ है जिसके कारण आगे की प्रसंस्करण प्रक्रिया महंगी और कम प्रभावी हो जाती है। 

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का नियामक ढांचा 

  • भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की रूपरेखा मुख्यतः पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित नियमों द्वारा निर्धारित की जाती है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 ने लैंडफिल-केंद्रित निपटान प्रणाली से हटकर वैज्ञानिक और सतत अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तुत किया है जिसमें स्रोत पर पृथक्करण, विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण और अपशिष्ट से संसाधन सृजन (Waste-to-Resource) पर विशेष बल दिया गया। 

पूर्ववर्ती नियामक ढांचे की प्रमुख विशेषताएँ 

  • स्रोत स्तर पर अपशिष्ट का अनिवार्य पृथक्करण
  • संग्रहण एवं प्रसंस्करण की जिम्मेदारी शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को सौंपना
  • थोक अपशिष्ट उत्पादकों को नियामक दायरे में लाना
  • कम्पोस्टिंग, बायोमीथनेशन और पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित करना 
  • यद्यपि कमजोर प्रवर्तन तंत्र, शहरी स्थानीय निकायों की सीमित संस्थागत क्षमता तथा स्पष्ट जवाबदेही व्यवस्था के अभाव के कारण इन प्रावधानों का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ सका है। इन्हीं कमियों को दूर करने के उद्देश्य से नए अधिसूचित SWM नियम, 2026 लागू किए गए हैं जो विगत एक दशक से लागू व्यवस्था का स्थान लेंगे।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management–SWM) नियम, 2026 के बारे में 

  • पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 को 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी किया जा रहा है। 
  • इन नियमों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि थोक अपशिष्ट उत्पादकों के लिए स्रोत स्तर पर अपशिष्ट का प्रसंस्करण अनिवार्य कर दिया गया है जबकि ये इकाइयाँ देश के कुल ठोस अपशिष्ट का लगभग एक-तिहाई हिस्सा उत्पन्न करती हैं। 

नए SWM ढांचे के प्रमुख सिद्धांत 

  • संशोधित नियम अपशिष्ट सोपनिकी (Waste Hierarchy) की अवधारणा पर आधारित हैं जिसमें प्राथमिकताओं का क्रम निम्नलिखित है-
  • अपशिष्ट की रोकथाम और न्यूनतम उत्पादन
    • पुनर्उपयोग
    • पुनर्चक्रण
    • ऊर्जा की पुनर्प्राप्ति तथा 
    • अंतिम विकल्प के रूप में निपटान  
  • इन नियमों के अंतर्गत लैंडफिल का उपयोग केवल गैर-पुनर्चक्रणीय, गैर-पुनर्प्राप्त योग्य और निष्क्रिय अपशिष्ट के लिए ही किया जाएगा, जिससे चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की दिशा में संक्रमण को बढ़ावा मिलेगा।
  • छटाई रहित अपशिष्ट के निपटान के लिए उच्च लैंडफिल शुल्क निर्धारित किए गए हैं ताकि डंपिंग को हतोत्साहित किया जा सके और स्रोत स्तर पर प्रसंस्करण को बढ़ावा मिले। 

थोक अपशिष्ट उत्पादकों का विस्तारित दायरा 

  • नए नियमों के अंतर्गत निम्नलिखित इकाइयों को थोक अपशिष्ट उत्पादक के रूप में परिभाषित किया गया है:
    • 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक निर्मित क्षेत्रफल वाले भवन
    • प्रतिदिन 40,000 लीटर या उससे अधिक जल की खपत करने वाली संस्थाएँ
    • प्रतिदिन 100 किलोग्राम या उससे अधिक अपशिष्ट उत्पन्न करने वाली इकाइयाँ 
  • इस श्रेणी में आवासीय सोसायटियाँ, विश्वविद्यालय, छात्रावास, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान तथा केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न संस्थान शामिल हैं। 

अनिवार्य अपशिष्ट पृथक्करण मानदंड 

  • नियमों के अनुसार अपशिष्ट को चार अनिवार्य श्रेणियों में पृथक किया जाएगा:
    • गीला अपशिष्ट
    • सूखा अपशिष्ट
    • सैनिटरी अपशिष्ट 
    • विशेष देखभाल अपशिष्ट (जैसे- बैटरियाँ, ट्यूबलाइट और ई-कचरा) 
  • इस विस्तृत वर्गीकरण का उद्देश्य पुनर्चक्रण प्रक्रियाओं की दक्षता बढ़ाना और अपशिष्ट के आपसी संदूषण को कम करना है। 

थोक अपशिष्ट उत्पादकों की विस्तारित जिम्मेदारियाँ 

  • नियमों के तहत थोक अपशिष्ट उत्पादकों को निम्नलिखित दायित्वों का निर्वहन करना होगा: 
    • जहाँ तक संभव हो, गीले अपशिष्ट का स्थल पर ही प्रसंस्करण करना
    • स्थल पर प्रसंस्करण संभव न होने की स्थिति में विस्तारित थोक अपशिष्ट उत्पादक उत्तरदायित्व (EBWGR) प्रमाणपत्र प्राप्त करना
    • अपशिष्ट के पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित संग्रहण, परिवहन एवं प्रसंस्करण को सुनिश्चित करना 
  • अनुपालन की निगरानी और प्रभावी प्रवर्तन के लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन निगरानी पोर्टल के माध्यम से वास्तविक समय में निगरानी की जाएगी। 

स्थानीय निकायों को प्रदत्त नए अधिकार 

  • पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील पर्वतीय और द्वीपीय क्षेत्रों में स्थित स्थानीय निकायों को: 
    • पर्यटकों से अपशिष्ट प्रबंधन के लिए उपयोगकर्ता शुल्क वसूलने
    • क्षेत्र की अपशिष्ट वहन क्षमता के अनुरूप आगंतुकों की संख्या को नियंत्रित करने का अधिकार प्रदान किया गया है। 

नए नियमों का महत्व 

  • SWM नियम, 2026 के माध्यम से अपशिष्ट प्रबंधन का दायित्व शहरी स्थानीय निकायों से हटाकर सीधे अपशिष्ट उत्पन्न करने वालों पर डाला गया है जिससे जवाबदेही सुनिश्चित होगी और नगरपालिकाओं पर वित्तीय दबाव कम होगा।
  • शहरी अपशिष्ट के सबसे बड़े स्रोतों को सीधे लक्षित करते हुए यह नया ढांचा अपशिष्ट प्रसंस्करण दरों में उल्लेखनीय वृद्धि तथा लैंडफिल पर निर्भरता में कमी लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल के रूप में देखा जा रहा है। 
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