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वैश्विक समुद्री मत्स्य संसाधनों की स्थिति

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: विश्व भर के मुख्य प्राकृतिक संसाधनों का वितरण, वनस्पति व प्राणिजगत में परिवर्तन और इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रभाव, संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ  

  • संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने ‘विश्व समुद्री मत्स्य संसाधन स्थिति समीक्षा, 2025 (Review of the State of World Marine Fishery Resources, 2025)’ नामक द्विवार्षिक रिपोर्ट जारी की है। 
  • यह रिपोर्ट फ्रांस के नीस में आयोजित तीसरे संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC3) में प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में गहरे समुद्र की प्रजातियों एवं अत्यधिक प्रवासी शार्क प्रजातियों पर बढ़ते दबाव और उनकी असुरक्षित स्थिति पर चिंता जताई गई है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष 

  • गहरे समुद्र की प्रजातियों पर संकट : वैश्विक स्तर पर केवल 29% गहरे समुद्र की प्रजातियों के स्टॉक ही संधारणीय रूप से मत्स्यन की स्थिति में हैं जो एक गंभीर पर्यावरणीय एवं आर्थिक चुनौती को दर्शाता है।
  • रिपोर्ट में गहरे समुद्र में रहने वाली प्रजातियों के सतत दोहन के लिए उत्पन्न अद्वितीय चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है जिनमें देर से परिपक्वता, धीमी वृद्धि, लंबी जीवन प्रत्याशा, प्राकृतिक मृत्यु की निम्न दर एवं अनियमित प्रजनन शामिल हैं।
  • शार्क स्टॉक्स की असुरक्षित स्थिति : सात प्रजातियों के 23 शार्क स्टॉक्स में से 43.5% असुरक्षित रूप से मत्स्यन की स्थिति में हैं। शार्क का सर्वाधिक शिकार उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, जैसे- पश्चिमी मध्य प्रशांत, पूर्वी हिंद महासागर एवं पश्चिमी हिंद महासागर में दर्ज की गई है।
    • रिपोर्ट में कहा गया है कि शार्क एवं रे मछलियों का मत्स्य पालन अत्यधिक दबाव व उनकी जैविक विशेषताओं के कारण अति-शोषण की शिकार हो रही हैं।
  • वैश्विक मत्स्य स्टॉक की स्थिति : वैश्विक स्तर पर 64.5% मत्स्य स्टॉक का दोहन जैविक रूप से टिकाऊ स्तरों के भीतर किया जाता है जबकि 35.5% का अत्यधिक दोहन किया जाता है।
  • प्रभावी प्रबंधन की भूमिका : रिपोर्ट में प्रभावी प्रबंधन को मत्स्य संसाधनों के संरक्षण का सबसे शक्तिशाली उपकरण बताया गया है। 
    • उदाहरण के लिए, टूना जैसी प्रजातियों के 87% स्टॉक टिकाऊ स्तर पर हैं जो क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन संगठनों (RFMOs) की प्रभावी प्रबंधन प्रथाओं का परिणाम है।
  • क्षेत्रीय भिन्नताएँ : उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत में टिकाऊ मत्स्य पालन की दर अधिक है जबकि भूमध्य सागर व काला सागर (35.1%) और दक्षिण-पूर्वी प्रशांत (46.4%) में कम है। पूर्वी हिंद महासागर में 72.7% स्टॉक टिकाऊ हैं किंतु डाटा की कमी के कारण सावधानीपूर्वक व्याख्या आवश्यक है।
  • डाटा की कमी : कुछ क्षेत्रों में डाटा की अनुपलब्धता संवेदनशील प्रजातियों की स्थिति को समझने में बाधक है।

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें 

  • प्रभावी प्रबंधन को बढ़ावा : मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए मजबूत एवं सतर्क प्रबंधन प्रथाओं को लागू करना, विशेष रूप से गहरे समुद्र की प्रजातियों और शार्क के लिए, जो अति-शोषण के प्रति संवेदनशील हैं।
  • क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन संगठनों (RFMOs) को सशक्त करना : उच्च समुद्रों में टूना जैसे स्टॉक्स की सफलता को देखते हुए RFMOs को मजबूत डाटा संग्रह, निगरानी (जैसे-ऑन-बोर्ड कैमरे) एवं अनुपालन उपायों के साथ अधिक सशक्त करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना : शार्क एवं अन्य प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिए सुसंगत अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन ढांचे की स्थापना करना 
  • डाटा संग्रह में सुधार : उन क्षेत्रों (जैसे- पूर्वी हिंद महासागर) में डाटा की उपलब्धता बढ़ाना, जहाँ जानकारी की कमी के कारण संवेदनशील प्रजातियों की स्थिति का आकलन मुश्किल है।
  • क्षेत्रीय असमानताओं को संबोधित करना : कम टिकाऊ क्षेत्रों, जैसे- भूमध्य सागर व काला सागर (35.1% टिकाऊ) और दक्षिण-पूर्वी प्रशांत (46.4% टिकाऊ) में प्रबंधन प्रथाओं को मजबूत करना।
  • नीति निर्माण के लिए साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण : सरकारों को डाटा-आधारित नीतियाँ बनाने और समन्वय करने के लिए इस रिपोर्ट के निष्कर्षों का उपयोग करना, ताकि टिकाऊ मत्स्य पालन व समुद्री जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा मिले।
  • जागरूकता एवं संचार : राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर मत्स्य संसाधनों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने और हितधारकों के बीच संचार को प्रोत्साहित करना ताकि त्वरित कार्रवाई हो सके।
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