संदर्भ
भारत की कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों ने पिछले दशक में उल्लेखनीय प्रगति की है। वित्त वर्ष 2016 से 2025 के बीच कृषि क्षेत्र ने 4.45 प्रतिशत की दशकीय वृद्धि दर्ज की, जो पिछले दशकों में सबसे अधिक रही। हालांकि, इस वृद्धि को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए मिट्टी, जल, जैव-विविधता और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, सूखा, लू, अत्यधिक बारिश तथा रासायनिक इनपुट के बढ़ते उपयोग ने कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे में पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) एक महत्वपूर्ण समाधान के रूप में उभर रही है।
पुनर्योजी कृषि की अवधारणा
- पुनर्योजी कृषि एक समग्र कृषि दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य केवल वर्तमान उत्पादकता बनाए रखना नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत, जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की क्षमता को लगातार बेहतर बनाना है।
- यह मिट्टी के जैविक पदार्थ, जलधारण क्षमता और पोषक तत्वों को बढ़ाने के साथ कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला बनाने पर जोर देती है।
- इसके प्रमुख सिद्धांतों में मिट्टी की कम से कम जुताई, मिट्टी को आवरण प्रदान करना, जीवित जड़ों का संरक्षण, पशुधन का एकीकरण, रासायनिक इनपुट में कमी और जैव-विविधता का संवर्धन शामिल हैं। इस प्रकार यह खेती के प्राकृतिक आधार को मजबूत करके दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता का मार्ग प्रशस्त करती है।
प्रमुख पुनर्योजी कृषि पद्धतियां
- जल एवं संसाधन दक्षता के लिए ड्रिप, स्प्रिंकलर और फॉगर जैसी सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियां उपयोगी हैं। ये पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाकर जल की बर्बादी कम करती हैं तथा सूखे और जल संकट के प्रति कृषि की सुदृढ़ता बढ़ाती हैं। इसी प्रकार कृषि मशीनीकरण से पानी, ईंधन और उर्वरकों के उपयोग को अधिक दक्ष बनाया जा सकता है।
- मृदा एवं पोषक तत्व प्रबंधन में संतुलित नाइट्रोजन उर्वरक उपयोग, जैविक इनपुट, साइनोबैक्टीरिया और दलहनी फसलों की अंतरवर्तीय खेती महत्वपूर्ण हैं। इससे उर्वरकों की उपयोग-दक्षता बढ़ती है और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायता मिलती है।
- प्राकृतिक खेती भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर आधारित रसायन-मुक्त पद्धति है, जिसमें जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी जैसे जैविक इनपुट का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ कवर क्रॉपिंग, मल्चिंग, हरी खाद, बहुफसली खेती और न्यूनतम जुताई जैसी तकनीकें मिट्टी की उर्वरता और नमी को बनाए रखने में सहायक होती हैं।
एकीकृत और जलवायु-अनुकूल कृषि
- एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) में फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, मत्स्यपालन, बागवानी, कृषि-वानिकी और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियों को जोड़ा जाता है। इससे किसानों की आय के स्रोतों में विविधता आती है और किसी एक फसल के खराब होने से होने वाला आर्थिक जोखिम कम होता है।
- वहीं कृषि-वानिकी में वृक्षों को फसलों और बागवानी के साथ जोड़ा जाता है। इससे अतिरिक्त आय के साथ मिट्टी की नमी, जैव-विविधता और कार्बन भंडारण में सुधार होता है। जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) संतुलित उर्वरक उपयोग, कुशल जल प्रबंधन, मिट्टी की नमी संरक्षण और प्रभावी कीट प्रबंधन के माध्यम से कृषि को बदलती जलवायु के अनुकूल बनाने पर केंद्रित है।
पुनर्योजी कृषि के लाभ
- पुनर्योजी कृषि के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक - तीनों स्तरों पर लाभ हैं। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है, मिट्टी की संरचना और उर्वरता सुधरती है तथा जलधारण क्षमता बढ़ती है। स्वस्थ मिट्टी अपरदन और जल प्रदूषण को कम करने में भी सहायक होती है।
- जैव-विविधता बढ़ने से परागणकों, लाभकारी कीटों और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। इसके अलावा, मिट्टी और वनस्पति में अधिक कार्बन संग्रहित होने से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।
- आर्थिक दृष्टि से रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई पर निर्भरता घटने से उत्पादन लागत कम हो सकती है। साथ ही, विविधीकृत कृषि प्रणालियां किसानों की आय और जलवायु जोखिमों से निपटने की क्षमता को बढ़ाती हैं।
सरकारी पहलें
- भारत सरकार ने पुनर्योजी और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) के तहत किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहन तथा जैव-इनपुट संसाधन केंद्रों की व्यवस्था की जा रही है। परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) जैविक खेती, प्रमाणन और बाजार पहुंच को बढ़ावा देती है।
- ‘हर बूंद, अधिक फसल’ (PDMC) के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। छोटे एवं सीमांत किसानों को इनके लिए 55 प्रतिशत, जबकि अन्य किसानों को 45 प्रतिशत वित्तीय सहायता दी जाती है।
- इसके अतिरिक्त, वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम (RAD) एकीकृत कृषि प्रणाली को बढ़ावा देता है। कृषि-वानिकी घटक के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण पौधरोपण सामग्री और नर्सरी विकास को सहायता दी जा रही है। वहीं मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना किसानों को वैज्ञानिक मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरक और पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग की सलाह देती है।
निष्कर्ष
- पुनर्योजी कृषि केवल एक नई कृषि तकनीक नहीं, बल्कि मिट्टी, जल, जैव-विविधता और किसान की आय को एक साथ देखने वाला दीर्घकालिक दृष्टिकोण है। भारत में जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए इसका महत्व और बढ़ गया है।
- प्राकृतिक खेती, कृषि-वानिकी, सूक्ष्म-सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणाली और वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन जैसी पद्धतियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बढ़ावा देकर भारत उत्पादक, पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और जलवायु-सुदृढ़ कृषि व्यवस्था का निर्माण कर सकता है। अतः पुनर्योजी कृषि को केवल पर्यावरण संरक्षण की पहल न मानकर किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास की रणनीति के रूप में देखना आवश्यक है।