भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक नया इतिहास रचते हुए सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना (SLHEP) ने अपनी पहली इकाई के परिचालन के साथ ही दस्तक दे दी है।
लगभग दो दशकों के इंतजार और कई चुनौतियों को पार करने के बाद यह परियोजना अब भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना के बारे में
यह एक ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (Run-of-the-River) तकनीक पर आधारित जलविद्युत परियोजना है। इसकी कुल स्थापित क्षमता 2,000 मेगावाट है जो पूर्णतः कार्यान्वित होने पर इसे देश का सबसे बड़ा जलविद्युत संयंत्र बना देगी।
यह असम एवं अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर गेरुकामुख में स्थित है। यह ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदी ‘सुबनसिरी’ पर निर्मित है। इसकी क्रियान्वयन एजेंसी एनएचपीसी लिमिटेड (NHPC Limited) है।
परियोजना का सफरनामा: 2003 से 2025 तक
परियोजना को मंजूरी : इस महात्वाकांक्षी परियोजना को वर्ष 2003 में स्वीकृत किया गया था।
बाधाएँ (2011-2019) : पर्यावरणीय चिंताओं, भूकंपीय सुरक्षा समीक्षाओं और स्थानीय विरोध के कारण काम लंबे समय तक बाधित रहा।
सफलता : दिसंबर 2025 में इसकी पहली 250 मेगावाट की इकाई ने सफलतापूर्वक उत्पादन शुरू किया।
भविष्य की योजना : शेष सात इकाइयों (प्रत्येक 250 मेगावाट) को वर्ष 2026 और 2027 के बीच चरणबद्ध तरीके से चालू किया जाएगा।
मुख्य विशेषताएँ
यह एक कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण (Concrete Gravity) बाँध है। इसकी ऊँचाई नदी तल से 116 मीटर और नींव से 210 मीटर है तथा लंबाई 284 मीटर है।
भारत में पहली बार बांध के कंक्रीट निर्माण में ‘रोटेक टॉवर बेल्ट’ प्रणाली का उपयोग किया गया है। इसमें देश के सबसे भारी हाइड्रो जनरेटर रोटर और सबसे बड़े स्टेटर व इनलेट वाल्व लगाए गए हैं।
रणनीतिक और आर्थिक महत्व
यह बांध असम के निचले इलाकों में आने वाली विनाशकारी बाढ़ को नियंत्रित करने में सहायक होगा।
2,000 मेगावाट की स्वच्छ ऊर्जा राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड को अधिक मजबूती व स्थिरता प्रदान करेगी।
यह भारत के ‘नेट जीरो’ (Net Zero) लक्ष्य और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और बुनियादी ढाँचे का विकास होगा।