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क्षमा नीति पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 : कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय व विभाग, प्रभावक समूह व औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका)

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के निर्णय के अनुसार, यदि कोई दोषी समयपूर्व रिहाई के लिए पात्र है किंतु उपयुक्त सरकार या प्राधिकरण के समक्ष दोषी व्यक्तियों या उनके नातेदारों ने सजा माफी (रिहाई) के लिए आवेदन नहीं किया है तो भी आवेदन की प्रतीक्षा किए बिना ही उसकी समयपूर्व रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए। इस पीठ में न्यायमूर्ति ए. एस. ओका एवं न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां शामिल थे।

सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय 

उपयुक्त सरकार द्वारा सजा के छूट पर विचार 

  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 473 के तहत समय पूर्व रिहाई पर विचार के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करने वाली उपयुक्त सरकार की नीति उपलब्ध होने पर उपयुक्त सरकार का दायित्व है कि वह दोषियों की समय पूर्व रिहाई के मामलों पर विचार करे।
    • CrPC की धारा 432 एवं BNSS की धारा 473 का संबंध कारावास की सजा के निलंबन या छूट से है। 
  • यदि राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश सरकार तर्क देती है कि केवल उन्हीं लोगों को राहत दी जाएगी जो उक्त नीति के अनुसार आवेदन करते हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
  • न्यायालय के अनुसार CrPC की धारा 432(1) के तहत शक्ति का प्रयोग निष्पक्ष एवं उचित तरीके से किया जाना चाहिए।
  • न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि दोषी या उसके नातेदारों के लिए रिहाई से स्थायी छूट (Remission) के लिए आवेदन करना आवश्यक नहीं है। 
    • हालाँकि, यह निर्देश तब लागू होगा जब जेल मैनुअल या उपयुक्त सरकार द्वारा जारी किसी अन्य विभागीय निर्देश में ऐसे नीतिगत दिशा-निर्देश हों।
  • CrPC व BNSS के प्रावधानों के तहत प्राप्त छूट को रद्द करने का अधिकार उपयुक्त सरकार में निहित है। 
    • निर्धारित नियमों एवं शर्तों के उल्लंघन के आधार पर छूट को रद्द किया जा सकता है। छूट रद्द होने की स्थिति में दोषी को शेष सजा काटनी होगी।

रिहाई संबंधी नीति निर्माण का आदेश 

  • न्यायालय का आदेश है कि जिन राज्यों में CrPC की धारा 432 या BNSS की धारा 473 के अनुसार छूट प्रदान करने से संबंधित नीति का आभाव है उन्हें दो माह के भीतर नीति निर्माण करना होगा।
  • राज्य सरकार के पास स्थायी छूट (Remission) देने वाले आदेश में उपयुक्त शर्तें शामिल करने का अधिकार है। 
  • इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि : 
    • दोषी की आपराधिक प्रवृत्ति पर नियंत्रण रहे। 
    • दोषी समाज में खुद को पुनर्वासित कर सके।
    • शर्तें इतनी दमनकारी या कठोर नहीं होनी चाहिए कि दोषी स्थायी छूट वाले आदेश का लाभ न उठा सके। 
    • शर्तें स्पष्ट होनी चाहिए जिससे उनका पालन किया जा सके।

रिहाई से मना करने के स्पष्ट कारणों का उल्लेख 

स्थायी छूट देने या न देने के आदेश में संक्षिप्त कारणों का उल्लेख होने के साथ ही इसे जेल कार्यालय के माध्यम से दोषी को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए और संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के सचिवों को भेजा जाना चाहिए।

दोषी द्वारा रिहाई आदेश को चुनौती देने का अधिकार

जेल अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे दोषी को सूचित करें कि उसे छूट प्रदान करने के आवेदन को अस्वीकार करने के आदेश को चुनौती देने का अधिकार है। दोषी को सुनवाई का अवसर दिए बिना स्थायी छूट देने वाले आदेश को वापस या रद्द नहीं किया जा सकता है। 

जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा अद्यतन डाटा

निर्णय में जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को दोषियों का प्रासंगिक डाटा बनाए रखने और छूट के लिए कैदी के पात्र हो जाने पर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। न्यायालय ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को वास्तविक समय के आधार पर कैदियों की छूट पर डाटा अपलोड करने के लिए एक पोर्टल बनाने का निर्देश दिया है।

विभिन्न राज्यों में प्रावधान 

  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार समय पूर्व रिहाई (Premature Release) के प्रावधान विभिन्न राज्यों के जेल मैनुअल में शामिल किए गए हैं। 
    • जेल राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए विभिन्न राज्यों के जेल मैनुअल में भिन्नता पाई जाती है।
  • मॉडल जेल मैनुअल में यह प्रावधान है कि समय पूर्व रिहाई के लिए जेल के प्रभारी अधीक्षक को कार्यवाही प्रारंभ करनी होती है। 

तमिलनाडु सरकार का हालिया निर्णय 

तमिलनाडु सरकार ने अपने जेल नियमों में संशोधन किया है जिसके तहत बलात्कार जैसे अपराधों के दोषी या यौन अपराध बाल संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत सजा पाने वाले कैदी समय से पहले रिहाई के पात्र नहीं होंगे।

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