संदर्भ
भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक तथा यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल ताजमहल समय-समय पर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और न्यायिक विमर्श का विषय बनता रहा है। हाल के वर्षों में इसके मूल स्वरूप को लेकर उठे विवादों ने एक बार पुनः इतिहास, पुरातत्त्व और न्यायपालिका की भूमिका पर व्यापक बहस को जन्म दिया है। इसी क्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से एक याचिका पर जवाब तलब किए जाने के बाद यह विषय पुनः राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में यह दावा किया गया कि ताजमहल वास्तव में तेजो महालय नामक एक प्राचीन हिंदू मंदिर है।
- याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय से ताजमहल को हिंदू मंदिर घोषित करने, हिंदुओं को वहाँ पूजा-अर्चना की अनुमति देने तथा स्मारक का विस्तृत सर्वेक्षण, फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी कराने हेतु अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त करने का अनुरोध किया। इस संदर्भ में न्यायालय ने केंद्र सरकार एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा।
ताजमहल का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
- प्रचलित एवं व्यापक रूप से स्वीकृत ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार ताजमहल का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी पत्नी अर्जुमंद बानो बेगम (मुमताज महल) की स्मृति में एक मकबरे के रूप में कराया था।
- इसका निर्माण लगभग 22 वर्षों में पूर्ण हुआ तथा इसके लिए आवश्यक भूमि आमेर के शासक मिर्जा राजा जय सिंह से प्राप्त की गई, जिसके बदले उन्हें शाही संपत्ति से चार हवेलियाँ प्रदान की गईं।
- ताजमहल के निर्माण का श्रेय मुख्यतः उस्ताद अहमद लाहौरी को दिया जाता है। हालांकि इसके निर्माणकर्ता एवं वास्तुकार को लेकर समय-समय पर अनेक वैकल्पिक दावे सामने आते रहे हैं।
- सत्रहवीं शताब्दी में कुछ यूरोपीय लेखकों ने इसका श्रेय वेनिस के जौहरी जेरोनिमो वेरोनियो को देने का प्रयास किया। इसके पश्चात तारीख-ए-ताजमहल में मुगल बेग ने तुर्की के मुहम्मद एफेंदी को इसका वास्तुकार बताया, किंतु बाद में यह दावा भी निराधार सिद्ध हुआ।
- उन्नीसवीं शताब्दी में फ्रांसीसी जौहरी ऑस्टिन डी बोर्डो को भी इसका निर्माता बताया गया, परंतु ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट हुआ कि उनकी मृत्यु उसी वर्ष हो चुकी थी, जब ताजमहल का निर्माण प्रारंभ हुआ था।
पी. एन. ओक और वैकल्पिक इतिहास का प्रतिपादन
- ताजमहल की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर संगठित रूप से प्रश्न उठाने का श्रेय इतिहासकारों को नहीं, बल्कि पी. एन. ओक को जाता है, जिन्होंने 1965 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Taj Mahal is a Temple Palace में यह दावा किया कि ताजमहल मूलतः चौथी शताब्दी का एक राजपूत महल था। बाद में 1989 में उन्होंने अपने पूर्व मत में संशोधन करते हुए इसे बारहवीं शताब्दी का एक हिंदू मंदिर बताया तथा अपनी पुस्तक Taj Mahal: The True Story के माध्यम से इस मत का समर्थन किया।
- हालाँकि, मध्यकालीन भारतीय इतिहास के प्रमुख इतिहासकार- जैसे इरफ़ान हबीब, अथर अली, सतीश चोपड़ा तथा सैयद अली नदीम रिज़वी ने इन दावों को ऐतिहासिक साक्ष्यों के अभाव में पूर्णतः अस्वीकार किया। वर्ष 2000 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी पी. एन. ओक की याचिका को खारिज करते हुए उनके आरोपों को निराधार बताया।
न्यायिक हस्तक्षेप और निरंतर विवाद
- ताजमहल के संबंध में विभिन्न न्यायालयों में समय-समय पर अनेक याचिकाएँ दायर की जाती रही हैं। वर्ष 2005 में अमरनाथ मिश्रा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दावा किया कि ताजमहल 1189 ईस्वी में चंदेल शासकों द्वारा निर्मित मंदिर था। न्यायालय ने इस याचिका को अस्वीकार कर दिया।
- इसके उपरांत वर्ष 2015 में आगरा की एक दीवानी अदालत में ताजमहल को हिंदू मंदिर घोषित करने की मांग की गई, किंतु न्यायालय ने इसे भी स्वीकार नहीं किया। जब ताजमहल परिसर का सर्वेक्षण कराने की मांग अस्वीकार हुई, तब याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जवाब मांगा गया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दृष्टिकोण
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने वर्ष 2017 में स्पष्ट रूप से कहा कि ताजमहल सत्रहवीं शताब्दी का एक मकबरा है तथा इसके निर्माण में प्रयुक्त स्थापत्य तकनीकें (विशेषतः पित्रा ड्यूरा जैसी जड़ाऊ पत्थर कला) पूर्व-मध्यकालीन भारत में उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए ताजमहल को प्राचीन हिंदू मंदिर सिद्ध करने का कोई पुरातात्त्विक आधार उपलब्ध नहीं है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बारे में:
- संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देश के पुरातात्विक शोध एवं सांस्कृतिक विरासत की रक्षा को समर्पित एक अग्रणी संगठन है।
- राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों व पुरातात्विक स्थलों एवं ध्वंशावशेषों का रखरखाव व देखभाल इस संगठन का मुख्य कार्य है।
- इसके अतिरिक्त यह प्राचीन संस्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व ध्वंसावशेष अधिनियम 1958 के अनुसार देश में हो रही सभी तरह के पुरातात्विक गतिविधियों को संचालित एवं नियंत्रित करता है साथ ही यह संगठन पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम 1972 के प्रावधान को भी विनियमित करता है।
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- इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हुआ। वर्ष 2022 में सर्वोच्च न्यायालय में पुनः एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया। बाद के वर्षों में ताजमहल परिसर में धार्मिक अनुष्ठान करने के कुछ प्रयास भी हुए, जिन्हें प्रशासन ने रोक दिया। वर्ष 2017 में ताजमहल का कुछ समय के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन साहित्य से हटाया जाना भी विवाद का विषय बना।
इतिहास और न्यायपालिका के मध्य संतुलन
- ताजमहल से जुड़े विवाद केवल एक स्मारक की ऐतिहासिक पहचान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इतिहासलेखन, सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्त्विक साक्ष्यों तथा न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्संबंधों को भी रेखांकित करते हैं।
- इतिहास का पुनर्मूल्यांकन किसी भी समाज में स्वाभाविक प्रक्रिया हो सकती है, किंतु यह प्रक्रिया प्रामाणिक अभिलेखों, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए। केवल वैचारिक आग्रह या अप्रमाणित दावों के आधार पर ऐतिहासिक निष्कर्ष स्थापित नहीं किए जा सकते।
निष्कर्ष
ताजमहल भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्ट उपलब्धियों में से एक है तथा विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में उसकी पहचान स्थापित है। इसके संबंध में समय-समय पर उठने वाले विवाद भारतीय लोकतंत्र में उपलब्ध संवैधानिक एवं न्यायिक प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं, किंतु इनका अंतिम समाधान ऐतिहासिक प्रमाणों, पुरातात्त्विक अनुसंधानों तथा विधि के शासन के अनुरूप ही संभव है। अतः भारत की बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या के मध्य संतुलन बनाए रखना समय की प्रमुख आवश्यकता है।