New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 5th July 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 20th July 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 5th July 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 20th July 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM

'बोर्ड ऑफ पीस': गाज़ा से वैश्विक संघर्षों तक

संदर्भ 

  • हाल ही में, अमेरिका के वाशिंगटन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उद्घाटन बैठक संपन्न हुई। मूल रूप से गाज़ा के पुनर्निर्माण और शांति बहाली के लिए बनाए गए इस बोर्ड का कार्यक्षेत्र अब विस्तारित कर ‘वैश्विक संघर्षों’ तक कर दिया गया है।
  • भारत ने इस पहल में ‘पूर्ण सदस्य’ के बजाय ‘पर्यवेक्षक’ (Observer) की भूमिका चुनी है। भारत का यह कदम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्ताव 2803 और गाज़ा शांति योजना के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साथ ही, एक स्वायत्त कूटनीतिक संतुलन भी बनाए रखता है।
  • वाशिंगटन में भारत की उप-मिशन प्रमुख नमग्या खम्पा ने इस बैठक में हिस्सा लिया जो गहन कूटनीतिक विमर्श के बाद लिया गया एक नपा-तुला निर्णय प्रतीत होता है।

बोर्ड की संरचना और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी 

इस बोर्ड में कुल 27 सदस्य देश और 22 पर्यवेक्षक देश शामिल हुए हैं।

श्रेणी

प्रमुख प्रतिभागी

स्थायी सदस्य (27)

इज़राइल, मिस्र, जॉर्डन, सऊदी अरब, UAE, कतर, तुर्की, बहरीन, अर्जेंटीना, हंगरी, वियतनाम, कंबोडिया और पाकिस्तान

पर्यवेक्षक (22)

भारत, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, जापान, स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, नीदरलैंड और यूरोपीय संघ

अनुपस्थिति

रूस, चीन और फ्रांस (UNSC के स्थायी सदस्य) इस पहल से बाहर हैं।

वित्तीय प्रतिबद्धताएँ और विवाद 

  • सामूहिक योगदान: ट्रंप के अनुसार, 9 सदस्य देशों ने मिलकर गाज़ा राहत के लिए 7 अरब डॉलर की सहायता का संकल्प लिया है।
  • अमेरिकी निवेश: अमेरिका ने स्वयं इस बोर्ड के लिए 10 अरब डॉलर की घोषणा की है जिसे ट्रंप ने क्षेत्रीय स्थिरता के लिए निवेश बताया है।
  • चिंता का विषय: आलोचकों का तर्क है कि यह मंच संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को सीमित कर सकता है। हालाँकि, ट्रंप ने ‘समन्वय’ का आश्वासन दिया है किंतु बोर्ड के अस्पष्ट व व्यापक अधिकार-क्षेत्र ने कई देशों को संशय में डाल दिया है। 

भारत का ‘ऑब्ज़र्वर स्टेटस’ के निहितार्थ 

भारत द्वारा इस बोर्ड का हिस्सा न बनकर केवल ‘पर्यवेक्षक’ बने रहने का निर्णय कई रणनीतिक कारणों से लिया है-

  • रणनीतिक स्वायत्तता: भारत किसी ऐसी व्यक्तिगत परियोजना का पूर्ण हिस्सा नहीं बनना चाहता है जो दीर्घकालिक न हो या जिसका स्वरूप केवल एक राष्ट्रपति के कार्यकाल तक सीमित रहे। 
  • संयुक्त राष्ट्र का महत्त्व: भारत बहुपक्षीय मंचों (UN) के समानांतर किसी नए वैश्विक तंत्र को लेकर सतर्क है।
  • पाकिस्तान कारक: चूँकि पाकिस्तान इस बोर्ड का पूर्ण सदस्य है और उसके प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ बैठक में शामिल हुए, अत: भारत के लिए वहाँ मौजूद रहना आवश्यक था। पर्यवेक्षक के रूप में भारत चर्चाओं पर नज़र रख सकता है और किसी भी संभावित ‘भारत-विरोधी’ अंतर्राष्ट्रीयकरण के प्रयास को विफल कर सकता है। 
  • अमेरिका के साथ संतुलन: भारत ने पर्यवेक्षक बनकर यह संकेत दिया है कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ सहयोग को तैयार है किंतु किसी भी विवादास्पद या अस्थिर पहल पर आँख मूँदकर हस्ताक्षर नहीं करेगा। 

क्षेत्रीय और आर्थिक हित 

भारत के लिए पश्चिम एशिया (Middle East) में शांति केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं है बल्कि आर्थिक ज़रूरत भी है-

  • IMEC कॉरिडोर: शांति बहाल होने से ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (IMEC) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को गति मिलेगी।
  • दो-राष्ट्र समाधान: भारत लगातार इज़राइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का समर्थन करता रहा है। 

निष्कर्ष 

भारत का रुख ‘सतर्क कूटनीति’ का उत्कृष्ट उदाहरण है। ट्रंप की अप्रत्याशित कार्यशैली और ‘पैक्स सिलिका’ जैसे तकनीकी सहयोग के बीच भारत ने स्वयं को एक ऐसे स्थान पर रखा है जहाँ वह वैश्विक शांति प्रयासों का समर्थन भी कर रही है और अपनी ‘रणनीतिक स्वतंत्रता’ को भी सुरक्षित रख रही है।

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR