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सरसों पर ओरबैंकी का संकट

(प्रारंभिक परीक्षा: पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी) 

संदर्भ

सरसों देश में खाद्य तेल का सबसे बड़ा स्वदेशी स्रोत है जिसकी खेती लगभग 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा एवं पश्चिम बंगाल में होता है। हालाँकि, वर्तमान में यह फसल ओरोबैंकी एजिप्टियाका (Orobanche aegyptiaca) नामक परजीवी खरपतवार के गंभीर खतरे का सामना कर रही है। यह खरपतवार सरसों की जड़ों से चिपककर पानी एवं पोषक तत्व खींच लेती है जिससे पौधों की वृद्धि बाधित होती है और बीज उत्पादन में भारी कमी आ जाती है। 

ओरोबैंकी एजिप्टियाका (Orobanche aegyptiaca)

  • यह एक परजीवी खरपतवार है जो बिना क्लोरोफिल के होती है और स्वयं भोजन नहीं बना सकती है। यह फसल की जड़ों से चिपककर पानी, पोषक तत्व एवं कार्बन प्राप्त करती है।
  • यह खरपतवार विशेष रूप से सरसों, टमाटर, आलू, तंबाकू एवं चौड़ी पत्ती वाली अन्य फसलों को प्रभावित करती है। 
  • ओरोबैंकी (Orobanche) जमीन के नीचे फसल की जड़ों से जुड़ जाती है और शुरुआती अवस्था में दिखाई नहीं देती है जिससे किसानों को समय पर नुकसान का पता नहीं चल पाता है। 

मुख्य विशेषताएँ 

  • यह हजारों सूक्ष्म बीज उत्पन्न करता है।
  • बीज मिट्टी में 15–20 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं।
  • हवा, पानी और सिंचाई के जरिए तेजी से फैलती है।
  • पौधों में पीलापन, मुरझाहट और उत्पादन में भारी गिरावट का कारण बनती है। 

संक्रमण का तीव्र प्रसार एवं प्रभाव   

  • जिन खेतों में बार-बार सरसों की बुवाई होती है, वे विशेष रूप से अधिक जोखिम में रहते हैं क्योंकि सिंचाई से बीजों के अंकुरण और जड़ों से जुड़ाव के लिए अनुकूल वातावरण बनता है।
  • इस बढ़ते प्रकोप ने कम सिंचाई में उगने वाली सरसों के प्रति किसानों का भरोसा कमजोर कर दिया है। जैसे-जैसे ओरोबैंकी का खतरा बढ़ रहा है, किसानों में सरसों की खेती के प्रति झुकाव कम हो रहा है जिससे आने वाले समय में घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है। 
  • किसानों के अनुसार, सुझाए गए नियंत्रण उपायों को अपनाने के बावजूद उपज में लगातार गिरावट देखी जा रही है। शाकनाशियों के छिड़काव का भी सीमित प्रभाव दिखाई देता है जिसके चलते कई किसान सरसों छोड़कर गेहूं, चना व जौ जैसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। 
  • सरसों देश की सबसे अहम खाद्य तिलहन फसल है जो सालाना 10.5–10.6 मिलियन टन स्वदेशी खाद्य तेल उत्पादन में से 40 लाख टन से अधिक का योगदान देती है। यह भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने की नीति का एक प्रमुख आधार है।

आयात पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता 

  • भारत प्रत्येक वर्ष लगभग 1.6 करोड़ टन खाद्य तेल आयात करता है जिनमें पाम, सोयाबीन एवं सूरजमुखी तेल प्रमुख हैं।
  • इस आयात पर वर्ष 2023-24 में 15.9 अरब डॉलर और 2024-25 में 18.3 अरब डॉलर खर्च हुए।
  • इसी कारण सरसों की उत्पादकता बढ़ाना आयात व्यय घटाने की दिशा में एक अहम राष्ट्रीय लक्ष्य माना जाता है। 

बढ़ता रोग और कीट दबाव

  • पहले ओरोबैंकी फसल के अंतिम चरणों में और अधिकतर रेतीली मृदा में दिखाई देती थी किंतु अब यह फसल के शुरुआती दौर में ही उपजाऊ मिट्टी में भी उभरने लगी है।
  • यह बदलाव खतरे के अधिक गंभीर तथा आक्रामक होने का संकेत देता है। मृदा में लंबे समय तक बने रहने वाले बीजों के भंडार ने इसकी विनाशक क्षमता बढ़ा दी है जिससे जल्दी उभराव और अधिक उपज हानि हो रही है।  
  • ओरोबैंकी (मारगोजा) के साथ-साथ माहू (एफिड), सफेद रतुआ, पत्ती झुलसा, तना सड़न और चूर्णी फफूंदी जैसी बीमारियाँ भी सरसों की पैदावार व किसानों को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं।

पारंपरिक शाकनाशी का प्रभावी न होना 

  • ग्लाइफोसेट जैसे शाकनाशियों के जरिए रासायनिक नियंत्रण ओरोबैंकी से निपटने का एक तरीका हो सकता है। हालांकि, पारंपरिक सरसों की किस्मों में इस उपाय की कई व्यावहारिक सीमाएँ हैं।  
  • ग्लाइफोसेट और इसी तरह के व्यापक प्रभाव वाले शाकनाशी सभी पौधों को नष्ट कर देते हैं क्योंकि ये EPSPS (5-एनोलपाइरुवाइलशिकीमेट-3-फॉस्फेट सिंथेस) एंजाइम को रोकते हैं जो प्रोटीन निर्माण के लिए जरूरी है।
  • साधारण सरसों पर इनका छिड़काव करने से फसल भी नष्ट हो जाती है। वर्तमान में अनुशंसित कम मात्रा में ये शाकनाशी ओरोबैंकी पर भी प्रभावी नहीं साबित होते हैं। 

शाकनाशी-प्रतिरोधी सरसों का महत्व

  • एक नया समाधान ऐसी सरसों किस्मों के विकास में है जो चुनिंदा शाकनाशियों को सहन कर सकें। किसान एक हाइब्रिड सरसों का परीक्षण कर रहे हैं जो इमिडाज़ोलिनोन वर्ग के शाकनाशियों के प्रति प्रतिरोधी है और जिससे फसल को नुकसान पहुँचाए बिना ओरोबैंकी का चयनात्मक नियंत्रण संभव होता है।
  • पायनियर-45S42CL नामक यह हाइब्रिड इमाजापायर व इमाजापिक शाकनाशियों को सहन करने में सक्षम है।
  • इसे अनुकूल शाकनाशी मिश्रण के साथ बेचा जाता है और बुवाई के लगभग 25 दिन बाद केवल एक छिड़काव की आवश्यकता होती है। किसानों के खेतों में इसके शुरुआती परिणाम उत्साहजनक बताए जा रहे हैं। 

जीएम सरसों: आगे की राह

  • वैज्ञानिकों ने ग्लाइफोसेट सहित अन्य शाकनाशियों के प्रति प्रतिरोधी जीएम सरसों की किस्में भी विकसित की हैं, जो रासायनिक नियंत्रण के कई विकल्प प्रदान करती हैं और प्रतिरोध विकसित होने के खतरे को कम करती हैं।
  • सरसों के रणनीतिक महत्व और बढ़ते खरपतवार संकट को देखते हुए नीति-निर्माताओं के सामने जीएम फसलों को मंजूरी देने का एक महत्वपूर्ण निर्णय है। यद्यपि विशेषज्ञों का मत है कि यह फैसला विचारधारा के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों और कृषि अर्थशास्त्र के आधार पर होना चाहिए।
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