संदर्भ
विश्व बैंक की 2025 की रिपोर्ट ‘ए ब्रेथ ऑफ़ चेंज (A Breath of Change)’ के अनुसार, इंडो-गंगा मैदान एवं हिमालयी तराई क्षेत्र (IGP-HF) में लगभग एक अरब लोग विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित वायु में जीवन यापन कर रहे हैं। यह परिदृश्य स्पष्ट रूप से त्वरित, सशक्त एवं प्रभावी सीमा-पार सहयोग की आवश्यकता को सामने लाता है।
विश्व बैंक की ‘ए ब्रेथ ऑफ़ चेंज’ रिपोर्ट के बारे में
- ए ब्रेथ ऑफ़ चेंज केवल वायु प्रदूषण की समस्या को रेखांकित करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह IGP-HF वायुग्रह (Airshed) के लिए एक समाधान-केंद्रित रणनीतिक दस्तावेज है।
- इसमें बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल एवं पाकिस्तान के 13 प्रशासनिक क्षेत्रों को सम्मिलित करते हुए बहु-क्षेत्रीय एवं व्यावहारिक कार्यनीति प्रस्तुत की गई है।
रिपोर्ट में सुझाए गए समाधान का ‘4Is’ ढांचा
- Information (सूचना): डेटा-संचालित निर्णय लेना
- Incentives (प्रोत्साहन): स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए आर्थिक मदद
- Institutions (संस्थाएँ): मजबूत कानूनी और प्रशासनिक निकाय
- Infrastructure (अवसंरचना): प्रदूषण कम करने वाले भौतिक ढांचे का निर्माण
संकट संबंधी आंकड़े
- IGP-HF क्षेत्र में वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख असमय मृत्यु हो जाती हैं।
- उत्पादकता में कमी और स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि के चलते क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष लगभग 10% जी.डी.पी. के बराबर क्षति होती है।
- PM 2.5 के दीर्घकालिक संपर्क से औसतन तीन वर्ष से अधिक जीवनकाल कम हो जाता है। इस क्षेत्र के 81% सरकारी विद्यालयों के छात्र PM 2.5 के खतरनाक स्तर (35 µg/m³ से अधिक) के संपर्क में हैं।
- कई क्षेत्रों में परिवेशी PM 2.5 का 50% से अधिक हिस्सा स्थानीय प्रशासनिक सीमाओं के बाहर से आता है।
- IGP-HF विश्व का सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र है जहाँ PM 2.5 का स्तर WHO दिशानिर्देशों से 8–20 गुना अधिक पाया जाता है।
- 35 बाय 35 (35 by 35) लक्ष्य को WHO के पहले अंतरिम स्वच्छ वायु मानक के अनुरूप तय किया गया है। लिंडे का ‘35 बाय 35’ लक्ष्य वर्ष 2035 तक स्कोप 1 व 2 उत्सर्जन में 35% की कमी लाना है।
- नेपाल के तराई क्षेत्र में कुल वायु प्रदूषण का लगभग 68% हिस्सा अन्य देशों से आता है।
सीमा-पार वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण
- भौगोलिक बनावट और स्थलाकृति : हिमालय पर्वतमाला से घिरे समतल मैदानों में प्रदूषक फँस जाते हैं जिससे विशेषकर शीतकाल में तापीय इन्वर्ज़न एवं स्मॉग की स्थिति उत्पन्न होती है। उदाहरण: दिल्ली की भौगोलिक स्थिति इसे पंजाब व हरियाणा जैसे अपविंड क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषकों का प्राकृतिक संग्रहण केंद्र बना देती है।
- पवन प्रवृत्तियाँ : शीत ऋतु में उत्तर-पश्चिमी हवाएँ प्रदूषक कणों को देशों की सीमाओं के पार तक पहुँचा देती हैं। उदाहरण: पाकिस्तान के पंजाब से उत्पन्न प्रदूषण भारतीय पंजाब में कुल प्रदूषण का 30% तक योगदान कर सकता है।
- द्वितीयक कण निर्माण : SO₂ एवं अमोनिया जैसी प्रीकर्सर गैसें लंबी दूरी तय कर वायुमंडल में रासायनिक क्रियाओं के माध्यम से सूक्ष्म कण (PM₂.₅) में परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरण: एक क्षेत्र के कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से निकला सल्फर डाइऑक्साइड दूरस्थ क्षेत्रों में द्वितीयक PM 2.5 के रूप में प्रभाव डालता है।
- प्रीकर्सर गैसें ऐसे वाष्पशील या अर्ध-वाष्पशील रासायनिक यौगिक होते हैं जो वातावरणीय अभिक्रिया करके द्वितीयक प्रदूषक निर्मित करते हैं। विनिर्माण में ये केमिकल वेपर डिपोजिशन (CVD) में ठोस पदार्थ बनाने के लिए ज़रूरी कच्चे माल के तौर पर प्रयुक्त होते हैं।
- कृषि संबंधी गतिविधियाँ : फसल कटाई के बाद अवशेष जलाने से विशाल मात्रा में धुआँ उत्पन्न होता है जो राज्य व राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर फैलता है। उदाहरण: भारत एवं पाकिस्तान में पराली जलाने की घटनाएँ पूरे IGP-HF क्षेत्र को मौसमी धुंध से ढक देती हैं।
- औद्योगिक क्लस्टर : ऊँची चिमनियों वाले उद्योग, विशेषकर ताप विद्युत संयंत्र, उत्सर्जन को बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में फैला देते हैं। उदाहरण: कानपुर और ढाका जैसे अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थित MSME क्लस्टर स्थानीय प्रदूषण उत्पन्न कर उसे शहर की सीमाओं से बाहर तक पहुँचा देते हैं।
प्रमुख पहलें
- काठमांडू रोडमैप (2022): विज्ञान और नीति के बीच संवाद तथा साझा वायु गुणवत्ता लक्ष्यों के लिए क्षेत्रीय मंच
- थिम्फू आउटकम (2024): 35 बाय 35 लक्ष्य का समर्थन और निगरानी व वित्तपोषण में समन्वय पर जोर
- माले घोषणा: संयुक्त निगरानी और क्षमता निर्माण के लिए एक दीर्घकालिक व गैर-बाध्यकारी क्षेत्रीय पहल
- भारत का राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP): 130 से अधिक शहरों में PM 10 स्तर घटाने का लक्ष्य
- बाज़ार आधारित प्रयोग: सूरत में गुजरात द्वारा लागू किया गया विश्व का पहला कणीय पदार्थ उत्सर्जन व्यापार तंत्र (ETS)
प्रमुख चुनौतियाँ
- संस्थागत विखंडन: पर्यावरण, परिवहन और कृषि मंत्रालयों के बीच जिम्मेदारियों का बिखराव समन्वित कार्रवाई में बाधक है।
- वित्तीय अभाव: क्षेत्रीय तंत्रों के पास दीर्घकालिक और स्थायी वित्तीय संसाधनों की कमी। उदाहरण: SIDA की सहायता समाप्त होने के बाद माले घोषणा की प्रगति धीमी हुई।
- कमज़ोर प्रवर्तन: नियमों के बावजूद प्रवर्तन एजेंसियों के पास पर्याप्त मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता नहीं है। उदाहरण: भारत में कई राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गंभीर स्टॉफ की कमी से जूझ रहे हैं।
- डेटा अंतराल: निगरानी प्रणालियाँ मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं जिससे ग्रामीण इलाके उपेक्षित रह जाते हैं।
- आर्थिक अवरोध: स्वच्छ तकनीकों की अधिक प्रारंभिक लागत MSMEs और किसानों को अपनाने से रोकती है। उदाहरण: भारत में भारी वाहनों के रेट्रोफिट की लागत औसत प्रति व्यक्ति आय से 180% अधिक हो सकती है।
अनुशंसित समाधान
- वास्तविक समय वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क का विस्तार और GeoAI आधारित उपग्रह ट्रैकिंग से ईंट भट्टों जैसे प्रदूषण केंद्रों की पहचान करना
- जीवाश्म ईंधन व उर्वरक सब्सिडी में सुधार कर संसाधनों को ईवी, हैपी सीडर जैसी स्वच्छ तकनीकों की ओर स्थानांतरित करना
- स्वतंत्र स्वच्छ वायु अधिनियम के माध्यम से कानूनी जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना और क्षेत्रीय समन्वय हेतु स्थायी सचिवालय की स्थापना
- क्षेत्रीय विद्युत ग्रिड, ईवी चार्जिंग नेटवर्क और साझा औद्योगिक बॉयलरों में निवेश कर व्यापक स्तर पर उत्सर्जन में कमी करना
- उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) और प्रदूषण कर (जैसे- नेपाल का ग्रीन टैक्स) का विस्तार कर निजी निवेश को प्रोत्साहित करना
निष्कर्ष
इंडो-गंगा मैदान में वायु प्रदूषण की चुनौती किसी एक राष्ट्र की सीमाओं में सिमटी हुई नहीं है बल्कि यह एक साझा क्षेत्रीय संकट है। यद्यपि ‘35 बाय 35’ लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता और सीमा-पार सहयोग को संस्थागत रूप देने से इस गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या को निम्न-कार्बन और सतत आर्थिक विकास के अवसर में बदला जा सकता है। वस्तुतः अब आवश्यकता केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और ठोस क्रियान्वयन की है ताकि लगभग एक अरब लोगों को वास्तविक अर्थों में ‘स्वच्छ श्वास’उपलब्ध कराई जा सके।