हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी स्लोवाकिया यात्रा के दौरान वहाँ के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी को थेवा कला से निर्मित कफ़लिंक भेंट किए। इस अवसर ने राजस्थान की प्राचीन थेवा शिल्पकला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान की।
इस विशिष्ट कला को वर्ष 2014 में भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) का दर्जा प्रदान किया गया, जिससे इसकी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान को कानूनी संरक्षण प्राप्त हुआ।
अठारहवीं शताब्दी के मध्य में प्रतापगढ़ के महाराजा सामंत सिंह इस स्वर्ण-काँच शिल्प से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने इस कला को संरक्षण प्रदान करते हुए संबंधित परिवार को जागीर प्रदान की तथा उन्हें राजसोनी अर्थात राजकीय स्वर्णकार की उपाधि से सम्मानित किया।
थेवा कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट तापीय संयोजन प्रक्रिया है। इसमें 23 कैरेट सोने की नक्काशीदार पतली पन्नी को रंगीन काँच पर बिना किसी गोंद, सोल्डर या अन्य कृत्रिम चिपकाने वाले पदार्थ के स्थायी रूप से जोड़ा जाता है।
कारीगर पहले सोने की अत्यंत पतली परत, जिसे थेवा की पत्ती कहा जाता है, को विशेष लाख-रेज़िन मिश्रण पर फैलाते हैं। इसके बाद महीन छेनी की सहायता से हाथ से नक्काशी की जाती है। अतिरिक्त हिस्सों को हटाकर जालीदार आकृतियाँ तैयार की जाती हैं, जिन्हें बाद में सावधानीपूर्वक रंगीन काँच पर स्थापित किया जाता है।
इस कला में पारंपरिक रूप से उच्च गुणवत्ता वाले आयातित बेल्जियन काँच का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः हरे, लाल, नीले जैसे गहरे रंगों को प्राथमिकता दी जाती है। विशेष प्रसंस्करण के माध्यम से इन काँचों की चमक और प्रकाश परावर्तन क्षमता को बढ़ाया जाता है।
सोने और काँच से निर्मित कलाकृति को पूर्ण होने के बाद ठोस चाँदी के कलात्मक फ्रेम, डिबिया अथवा आभूषणों के आधार में जड़ा जाता है। इसके पीछे चाँदी की अतिरिक्त पन्नी लगाई जाती है, जिससे इसकी आभा और चमक और अधिक बढ़ जाती है।
थेवा कला की डिज़ाइनें केवल सजावट तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक कथाओं को भी अभिव्यक्त करती हैं।
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