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थेवा कला (Thewa Art)

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी स्लोवाकिया यात्रा के दौरान वहाँ के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी को थेवा कला से निर्मित कफ़लिंक भेंट किए। इस अवसर ने राजस्थान की प्राचीन थेवा शिल्पकला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान की।

थेवा कला के बारे में 

  • थेवा भारत की एक विशिष्ट पारंपरिक आभूषण एवं सजावटी कला है, जिसमें शुद्ध सोने की बारीकी से उकेरी गई पतली परत को विशेष रूप से तैयार किए गए रंगीन काँच की सतह पर स्थायी रूप से स्थापित किया जाता है। 
  • यह प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म शिल्प कौशल और तकनीकी दक्षता की मांग करती है। 
  • इस कला से निर्मित वस्तुएँ अत्यधिक आकर्षक, स्वर्णाभ और अलंकृत दिखाई देती हैं। 
  • विशेष बात यह है कि इनमें अपेक्षाकृत कम मात्रा में सोने का उपयोग किया जाता है, फिर भी उनकी चमक ऐसी प्रतीत होती है मानो भीतर से प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा हो।

प्रमुख केंद्र:

  • थेवा कला का मूल और प्रमुख केंद्र राजस्थान का प्रतापगढ़ जिला है। 
  • वर्तमान में यह शिल्प मुख्य रूप से इसी क्षेत्र में संरक्षित और विकसित किया जा रहा है। 

जीआई (GI) दर्जा:

  • इस विशिष्ट कला को वर्ष 2014 में भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) का दर्जा प्रदान किया गया, जिससे इसकी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान को कानूनी संरक्षण प्राप्त हुआ। 

इतिहास एवं विकास: 

  • लगभग चार शताब्दियों पुरानी यह कला मुगल और राजपूत काल की विरासत मानी जाती है। 
  • इसका श्रेय 18वीं शताब्दी में प्रसिद्ध स्वर्णकार नाथूलाल सोनी को दिया जाता है, जिन्होंने इस अनूठी तकनीक का विकास किया। 

राजकीय संरक्षण:

  • अठारहवीं शताब्दी के मध्य में प्रतापगढ़ के महाराजा सामंत सिंह इस स्वर्ण-काँच शिल्प से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने इस कला को संरक्षण प्रदान करते हुए संबंधित परिवार को जागीर प्रदान की तथा उन्हें राजसोनी अर्थात राजकीय स्वर्णकार की उपाधि से सम्मानित किया।

परंपरागत ज्ञान का संरक्षण:

  • इस कला की विशिष्ट तकनीक को सुरक्षित रखने के लिए इसके निर्माण से जुड़े रहस्यों और प्रक्रियाओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार के भीतर ही हस्तांतरित किया जाता रहा है। 
  • परंपरागत रूप से यह ज्ञान पिता से पुत्र को सौंपा जाता था, जिसके कारण यह शिल्प लंबे समय तक राजसोनी परिवार की पुरुष वंश परंपरा तक सीमित रहा।

थेवा कला की प्रमुख विशेषताएँ:

1. बिना गोंद की अनूठी संयोजन तकनीक

  • थेवा कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट तापीय संयोजन प्रक्रिया है। इसमें 23 कैरेट सोने की नक्काशीदार पतली पन्नी को रंगीन काँच पर बिना किसी गोंद, सोल्डर या अन्य कृत्रिम चिपकाने वाले पदार्थ के स्थायी रूप से जोड़ा जाता है।  

2. सूक्ष्म जालीदार नक्काशी

  • कारीगर पहले सोने की अत्यंत पतली परत, जिसे थेवा की पत्ती कहा जाता है, को विशेष लाख-रेज़िन मिश्रण पर फैलाते हैं। इसके बाद महीन छेनी की सहायता से हाथ से नक्काशी की जाती है। अतिरिक्त हिस्सों को हटाकर जालीदार आकृतियाँ तैयार की जाती हैं, जिन्हें बाद में सावधानीपूर्वक रंगीन काँच पर स्थापित किया जाता है। 

3. बेल्जियन काँच का प्रयोग 

  • इस कला में पारंपरिक रूप से उच्च गुणवत्ता वाले आयातित बेल्जियन काँच का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः हरे, लाल, नीले जैसे गहरे रंगों को प्राथमिकता दी जाती है। विशेष प्रसंस्करण के माध्यम से इन काँचों की चमक और प्रकाश परावर्तन क्षमता को बढ़ाया जाता है। 

4. चाँदी की आकर्षक जड़ाई 

  • सोने और काँच से निर्मित कलाकृति को पूर्ण होने के बाद ठोस चाँदी के कलात्मक फ्रेम, डिबिया अथवा आभूषणों के आधार में जड़ा जाता है। इसके पीछे चाँदी की अतिरिक्त पन्नी लगाई जाती है, जिससे इसकी आभा और चमक और अधिक बढ़ जाती है।

5. कथात्मक एवं सांस्कृतिक रूपांकन 

थेवा कला की डिज़ाइनें केवल सजावट तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक कथाओं को भी अभिव्यक्त करती हैं। 

  • प्रकृति एवं जीव-जंतु आधारित आकृतियाँ
    • बेल-बूटे और लताएँ
    • कमल
    • मोर
    • हाथी
    • दौड़ते हुए हिरण
  • पौराणिक विषय-वस्तु
    • भगवान कृष्ण
    • राधा
    • भगवान गणेश
    • हिंदू महाकाव्यों एवं धार्मिक कथाओं के विविध प्रसंग 
  • राजसी जीवन के दृश्य
    • शिकार यात्राएँ
    • विवाह एवं बारात जुलूस
    • राजदरबार की सभाएँ
    • शाही उत्सव और समारोह
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