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एशियाई शेर संरक्षण : संख्या में वृद्धि के साथ दीर्घकालिक सुरक्षा की चुनौती

संदर्भ 

हाल ही में प्रकाशित एक विश्लेषण में यह रेखांकित किया गया है कि भारत में एशियाई शेर (Asiatic Lion) की संख्या 1,000 से अधिक हो चुकी है, जो वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रजाति का दीर्घकालिक अस्तित्व केवल जनसंख्या वृद्धि से सुनिश्चित नहीं होगा। इसके लिए भूदृश्य-आधारित (Landscape-Level) संरक्षण को सुदृढ़ करने तथा एक ही भौगोलिक क्षेत्र में अत्यधिक संकेंद्रण से उत्पन्न जोखिमों का समाधान करना आवश्यक है।   

एशियाई शेर : एक परिचय 

  • एशियाई शेर (Panthera leo persica) विश्व की सबसे संकटग्रस्त बड़ी बिल्ली प्रजातियों में से एक है और प्राकृतिक रूप से अब केवल भारत में ही पाया जाता है। कभी इसका विस्तार पश्चिम एशिया से लेकर उत्तर भारत तक था, किंतु वर्तमान में इसका प्राकृतिक आवास गुजरात के गिर परिदृश्य (Gir Landscape) तक सीमित रह गया है।

संरक्षण स्थिति:

  • IUCN रेड लिस्ट : Vulnerable (असुरक्षित)
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 : अनुसूची-I
  • CITES : परिशिष्ट-I 

एशियाई शेर संरक्षण की उल्लेखनीय सफलता 

  • एशियाई शेर का संरक्षण भारत की सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण पहलों में से एक मानी जाती है। लगभग छह दशक पूर्व इसकी संख्या घटकर केवल 100–150 रह गई थी। निरंतर संरक्षण प्रयासों के परिणामस्वरूप आज इसकी संख्या 1,000 से अधिक हो चुकी है। 
  • इस उपलब्धि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि अब लगभग आधी शेर आबादी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर निवास करती है। यह दर्शाता है कि शेरों ने गिर राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य से बाहर प्राकृतिक रूप से नए क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विस्तार किया है।  

भूदृश्य-आधारित संरक्षण की अवधारणा 

  • समय के साथ एशियाई शेर संरक्षण की रणनीति केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित न रहकर भूदृश्य-आधारित संरक्षण (Landscape-Level Conservation) की दिशा में विकसित हुई है। 
  • आज शेर केवल गिर राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सौराष्ट्र क्षेत्र के विभिन्न आवासों में पाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं - 
    • गिर राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य
    • गिरनार पर्वतीय क्षेत्र
    • मितियाला वन क्षेत्र
    • सावरकुंडला–लिलिया परिदृश्य
    • भावनगर की ओर विस्तृत तटीय क्षेत्र 
  • इन क्षेत्रों के बीच स्थित कृषि भूमि, घासभूमियाँ, नदी तट और पहाड़ी क्षेत्र पारिस्थितिक गलियारों (Ecological Corridors) के रूप में कार्य करते हैं, जो शेरों के प्राकृतिक विचरण को संभव बनाते हैं। 
  • इस संरक्षण मॉडल की सफलता का एक प्रमुख कारण स्थानीय समुदायों द्वारा विचरण करते शेरों को स्वीकार करना तथा मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना रहा है। 

संरक्षण की सफलता के प्रमुख आधार 

  • एशियाई शेर संरक्षण की उपलब्धि चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित रही है - 
    • मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति
    • प्रभावी वन प्रशासन
    • निरंतर वित्तीय सहयोग
    • स्थानीय समुदायों का सक्रिय सहभाग
    • संरक्षण के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
    • एक ही भौगोलिक क्षेत्र में संकेंद्रण 
  • वर्तमान में एशियाई शेरों की पूरी जंगली आबादी एक ही भौगोलिक परिदृश्य तक सीमित है। इससे किसी महामारी, प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य आकस्मिक संकट की स्थिति में पूरी प्रजाति पर एक साथ गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। 

रोगों का खतरा: 

  • वर्ष 2018 में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (Canine Distemper Virus–CDV) के प्रकोप से 20 से अधिक एशियाई शेरों की मृत्यु हुई थी। यद्यपि गुजरात वन विभाग ने रोग निगरानी, पशु-चिकित्सा हस्तक्षेप और बेहतर मॉनिटरिंग के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित किया, किंतु इस घटना ने एक ही क्षेत्र में सीमित आबादी की संवेदनशीलता को स्पष्ट कर दिया। 

आवास विखंडन: 

  • संरक्षित क्षेत्रों से बाहर शेरों के विस्तार के साथ वन्यजीव गलियारों की निरंतरता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है। तीव्र अवसंरचनात्मक विकास, शहरीकरण तथा भूमि उपयोग में परिवर्तन से इन गलियारों का विखंडन हो सकता है, जिससे शेरों के प्राकृतिक विचरण में बाधा आएगी और मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है।

दीर्घकालिक संरक्षण रणनीति की आवश्यकता:

  • विशेषज्ञों का मत है कि संरक्षण प्रयास केवल गिर राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन सभी आवासों और पारिस्थितिक गलियारों की भी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए जिनका उपयोग शेर नए क्षेत्रों में फैलने के दौरान करते हैं। 

दूसरे प्राकृतिक आवास की आवश्यकता: 

  • वन्यजीव वैज्ञानिक लंबे समय से एशियाई शेरों के लिए दूसरी स्वतंत्र जंगली आबादी (Second Free-Ranging Population) स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं। वर्तमान में पूरी प्रजाति एक ही परिदृश्य तक सीमित है, जिससे उसका अस्तित्व अनेक जोखिमों से जुड़ा हुआ है। वस्तुतः दूसरे प्राकृतिक आवास की स्थापना से -
    • रोगों के व्यापक प्रकोप का जोखिम कम होगा।
    • प्राकृतिक आपदाओं से पूरी आबादी के प्रभावित होने की आशंका घटेगी।
    • प्रजाति की आनुवंशिक सुरक्षा (Genetic Security) मजबूत होगी।
    • जंगली आबादी की दीर्घकालिक अनुकूलन क्षमता (Resilience) बढ़ेगी। 
  • यद्यपि वैज्ञानिक समुदाय लंबे समय से इस आवश्यकता पर बल देता रहा है, फिर भी दूसरे प्राकृतिक आवास की स्थापना को लेकर अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है।

आगे की राह 

एशियाई शेर संरक्षण की आगामी रणनीति का उद्देश्य पिछले छह दशकों की उपलब्धियों को और अधिक सुदृढ़ करना होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित पहल आवश्यक हैं -

  • गिर परिदृश्य के वन्यजीव गलियारों का संरक्षण।
  • अवसंरचना विकास से होने वाले आवास विखंडन को रोकना।
  • रोग निगरानी एवं पशु-चिकित्सा तैयारियों को और मजबूत बनाना।
  • स्थानीय समुदायों और शेरों के बीच सह-अस्तित्व को निरंतर प्रोत्साहित करना।
  • एशियाई शेरों के लिए दूसरा स्वतंत्र प्राकृतिक आवास विकसित करना।
  • संरक्षण को केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित न रखकर भूदृश्य-आधारित दीर्घकालिक संरक्षण रणनीति अपनाना। 

निष्कर्ष 

एशियाई शेरों की संख्या में हुई उल्लेखनीय वृद्धि भारत की संरक्षण नीतियों की बड़ी सफलता का प्रमाण है। किंतु किसी भी प्रजाति का दीर्घकालिक संरक्षण केवल उसकी संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके आवास, आनुवंशिक विविधता, पारिस्थितिक गलियारों तथा भौगोलिक विस्तार की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक होती है। इसलिए एशियाई शेरों के संरक्षण का अगला चरण भूदृश्य-आधारित प्रबंधन, वैज्ञानिक योजना और बहु-आवासीय संरक्षण रणनीति पर आधारित होना चाहिए, जिससे यह गौरवशाली प्रजाति भविष्य में भी सुरक्षित रह सके। 

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