संदर्भ
हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं के कारण देशभर में हुए युवा विरोध-प्रदर्शन केवल परीक्षा प्रणाली की खामियों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि वे बेरोज़गारी, शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितता, मानव पूंजी में घटते सार्वजनिक निवेश तथा संस्थागत विश्वसनीयता के संकट को भी उजागर करते हैं। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है और उसका जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) विकास का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।
जनसांख्यिकीय लाभांश : अवसर और चुनौती
- भारत विश्व की सबसे बड़ी कार्यशील आयु (15–64 वर्ष) वाली आबादी वाले देशों में से एक है। यदि इस युवा आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार उपलब्ध कराया जाए, तो यह आर्थिक विकास, नवाचार और उत्पादकता का प्रमुख स्रोत बन सकती है।
- किंतु जनसांख्यिकीय लाभांश स्वतः आर्थिक लाभ में परिवर्तित नहीं होता; इसके लिए मानव पूंजी में निवेश, कौशल विकास तथा पर्याप्त रोजगार सृजन अनिवार्य है।
- वर्तमान परिदृश्य में युवाओं में लगातार बढ़ती बेरोज़गारी यह संकेत देती है कि भारत अपनी युवा शक्ति का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा है।
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ये भी जाने
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21क प्रत्येक 6–14 वर्ष के बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 41 राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर नागरिकों को काम का अधिकार, शिक्षा तथा सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश देता है।
- इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 39(क) सभी नागरिकों के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों की उपलब्धता पर बल देता है।
- ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार केवल आर्थिक आवश्यकताएँ नहीं, बल्कि संवैधानिक एवं कल्याणकारी राज्य की मूल जिम्मेदारियाँ भी हैं।
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रोज़गार संकट : विकास के बावजूद रोजगार का अभाव
भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्षों में उल्लेखनीय विकास दर दर्ज की है, किंतु यह विकास पर्याप्त रोजगार सृजन में परिवर्तित नहीं हो पाया। यह स्थिति "जॉबलेस ग्रोथ" (Jobless Growth) की समस्या को दर्शाती है। वस्तुतः विशेष चिंता का विषय यह है कि -
- 15–29 वर्ष आयु वर्ग की बेरोज़गारी दर समग्र बेरोज़गारी दर की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है।
- शहरी युवा महिलाओं में बेरोज़गारी अपेक्षाकृत अधिक है।
- शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी बढ़ना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि समस्या कौशल की कमी नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण रोजगारों के अभाव की है।
इससे युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं और उपलब्ध अवसरों के बीच गहरा अंतर उत्पन्न हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप असंतोष, निराशा और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है।
शिक्षा में सार्वजनिक निवेश की चुनौती
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भारत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 के माध्यम से शिक्षा को परिवर्तन का आधार बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। नीति में शिक्षा पर जीडीपी का लगभग 6 प्रतिशत व्यय करने की अनुशंसा की गई है, किंतु वास्तविक सार्वजनिक निवेश अभी भी इस लक्ष्य से कम है।
शिक्षा पर अपेक्षाकृत कम निवेश के कारण
- शैक्षणिक अवसंरचना का अपेक्षित विस्तार नहीं हो पा रहा।
- उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच सीमित हो रही है।
- शोध, नवाचार तथा कौशल विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
स्पष्ट है कि शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय में प्रवेश तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और रोजगारोन्मुख शिक्षा उपलब्ध कराना भी राज्य की जिम्मेदारी है।
उच्च शिक्षा में प्रवेश व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली की चुनौतियाँ
- हाल के वर्षों में कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) पर बढ़ती निर्भरता ने प्रवेश प्रणाली में एकरूपता तो लाई है, किंतु इसके साथ कई नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं।
- विद्यालयी शिक्षा की अपेक्षा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को अधिक महत्व मिलने लगा है। बहुविकल्पीय प्रश्नों पर आधारित प्रवेश परीक्षाओं ने कोचिंग संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिससे समग्र अधिगम (Holistic Learning) प्रभावित हो रहा है।
इसके अतिरिक्त:
- परीक्षाओं और प्रवेश प्रक्रिया में विलंब,
- शैक्षणिक कैलेंडर का बाधित होना,
- सत्र प्रारंभ होने के बाद प्रवेश तथा
- बार-बार नीतिगत परिवर्तन विद्यार्थियों में असुरक्षा और अनिश्चितता की भावना उत्पन्न कर रहे हैं।
प्रश्नपत्र लीक और संस्थागत विश्वसनीयता का संकट
- हाल के वर्षों में अनेक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने युवाओं के विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। वर्षों की तैयारी के बाद यदि परीक्षा रद्द हो जाए या उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि समान अवसर (Equality of Opportunity) के सिद्धांत पर भी आघात है। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएँ निम्न समस्याओं को जन्म देती हैं -
- युवाओं में मानसिक तनाव और निराशा।
- सार्वजनिक संस्थानों पर घटता विश्वास।
- प्रतिभा आधारित चयन प्रणाली पर प्रश्नचिह्न।
- सामाजिक असंतोष एवं विरोध-प्रदर्शन में वृद्धि।
- वस्तुतः उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और सुशासन की आवश्यकता केवल विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक है -
- पर्याप्त वित्तीय निवेश,
- आधुनिक अवसंरचना,
- योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति,
- अनुसंधान को प्रोत्साहन,
- संस्थागत स्वायत्तता तथा
- पारदर्शी एवं उत्तरदायी प्रशासन।
- यदि शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक उत्कृष्टता और सुशासन का अभाव रहेगा, तो शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जाएगी।
आगे की राह
भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं -
- विनिर्माण, एमएसएमई और सेवा क्षेत्र में श्रम-प्रधान रोजगार का विस्तार।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुरूप शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय में पर्याप्त वृद्धि।
- परीक्षा प्रणाली को पूर्णतः सुरक्षित, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना।
- प्रश्नपत्र लीक रोकने हेतु कठोर तकनीकी एवं कानूनी तंत्र विकसित करना।
- प्रवेश प्रक्रिया को स्थिर, पूर्वानुमेय और विद्यार्थी-केंद्रित बनाना।
- उच्च शिक्षा में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, अनुसंधान तथा संस्थागत स्वायत्तता को बढ़ावा देना।
- महिला श्रमबल भागीदारी बढ़ाने हेतु लक्षित कौशल विकास और रोजगार कार्यक्रम लागू करना।
- उद्योगों और शिक्षा संस्थानों के बीच समन्वय बढ़ाकर रोजगारोन्मुख कौशल विकसित करना।
निष्कर्ष
- भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश उसकी सबसे बड़ी विकासात्मक शक्ति है, किंतु यह तभी राष्ट्रीय संपदा में परिवर्तित होगा जब प्रत्येक युवा को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था, कौशल विकास और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध हों। शिक्षा का अधिकार और काम का अधिकार केवल संवैधानिक आदर्श नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक स्थिरता की आधारशिला हैं।
- यदि भारत शिक्षा में पर्याप्त निवेश, रोजगार सृजन, पारदर्शी शासन और संस्थागत विश्वसनीयता को प्राथमिकता देता है, तो वह अपनी युवा शक्ति को उत्पादक मानव पूंजी में बदलकर विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में निर्णायक प्रगति कर सकता है। अन्यथा, वर्तमान जनसांख्यिकीय अवसर एक चूके हुए अवसर (Missed Opportunity) में परिवर्तित होने का जोखिम उत्पन्न कर सकता है।