भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2026 : सुधार और स्वायत्तता के बीच संतुलन की चुनौती
संदर्भ
हाल ही में लोकसभा में प्रस्तुत भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2026 ने शैक्षणिक एवं अनुसंधान जगत में व्यापक बहस को जन्म दिया है। यह विधेयक 67 वर्ष पुराने भारतीय सांख्यिकी संस्थान अधिनियम, 1959 का स्थान लेकर संस्थान की शासन व्यवस्था में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव करता है।
सरकार इसे प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने की दिशा में आवश्यक सुधार मानती है, जबकि शिक्षक, छात्र और कर्मचारी इसे संस्थागत स्वायत्तता के लिए चुनौतीपूर्ण मानते हैं। परिणामस्वरूप, यह विधेयक प्रशासनिक सुधार और संस्थागत स्वायत्तता के बीच संतुलन पर केंद्रित एक महत्त्वपूर्ण विमर्श का विषय बन गया है।
भारतीय सांख्यिकी संस्थान : एक परिचय
भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना वर्ष 1931 में प्रख्यात सांख्यिकीविद् प्रो. पी.सी. महालनोबिस द्वारा कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में एक सांख्यिकी प्रयोगशाला के रूप में की गई थी।
समय के साथ यह संस्था सांख्यिकी, गणित, कंप्यूटर विज्ञान, सामाजिक विज्ञान तथा डेटा विज्ञान के क्षेत्र में देश की अग्रणी अनुसंधान संस्थाओं में विकसित हुई।
प्रारंभ में इसे सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 तथा बाद में पश्चिम बंगाल सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1961 के अंतर्गत एक सोसाइटी के रूप में पंजीकृत किया गया।
वर्ष 1959 में संसद द्वारा पारित भारतीय सांख्यिकी संस्थान अधिनियम के माध्यम से इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान (Institution of National Importance) घोषित किया गया, जिससे इसे डिग्री प्रदान करने का वैधानिक अधिकार तथा केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
सरकार द्वारा सुधार की आवश्यकता का औचित्य
सरकार का मानना है कि वर्तमान सोसाइटी-आधारित प्रशासनिक ढांचा समय के साथ जटिल और कम प्रभावी हो गया है। पिछले पाँच दशकों में शासन व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ, जबकि चार समीक्षा समितियों ने इसमें व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता बताई थी।
समितियों ने परिषद का आकार घटाने, निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने तथा नेतृत्व पदों पर योग्यता-आधारित चयन को बढ़ावा देने की सिफारिश की थी। इसके विपरीत परिषद 33 सदस्यीय निकाय बन गई। सरकार का तर्क है कि आईआईटी और आईआईएम की तरह छोटा, सक्षम और उत्तरदायी बोर्ड संस्थान के अधिक प्रभावी प्रशासन में सहायक होगा।
विधेयक में प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तन
भारतीय सांख्यिकी संस्थान को वर्तमान सोसाइटी स्वरूप से बदलकर संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित वैधानिक निकाय (Statutory Body Corporate) बनाया जाएगा।
वर्तमान सोसाइटी की सभी परिसंपत्तियाँ, देनदारियाँ, कर्मचारी और शैक्षणिक कार्यक्रम नए संस्थान में स्थानांतरित होंगे तथा कर्मचारियों की सेवा शर्तें यथावत रहेंगी।
भारत के राष्ट्रपति संस्थान के विज़िटर (Visitor) होंगे। प्रशासन के लिए 11 सदस्यीय बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का गठन होगा, जिसमें अध्यक्ष, दो वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, चार सांख्यिकी विशेषज्ञ, चार संस्थान प्रतिनिधि तथा रजिस्ट्रार (बोर्ड सचिव) शामिल होंगे।
शैक्षणिक कार्यों के संचालन हेतु निदेशक की अध्यक्षता में अकादमिक परिषद (Academic Council) गठित की जाएगी, जो पाठ्यक्रम, प्रवेश मानदंड और परीक्षाओं से जुड़े निर्णय लेगी।
निदेशक की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा गठित सर्च-कम-सेलेक्शन समिति की अनुशंसा पर बोर्ड अध्यक्ष करेंगे। साथ ही, विज़िटर को निदेशक को हटाने तथा संस्थान के कार्यों की जांच और समीक्षा कराने का अधिकार होगा।
विधेयक को लेकर उठी प्रमुख चिंताएँ
विरोधियों का मुख्य तर्क है कि प्रस्तावित व्यवस्था से संस्थान की स्वायत्तता प्रभावित होगी। उनके अनुसार 11 सदस्यीय बोर्ड के अधिकांश सदस्यों पर केंद्र सरकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रहेगा, जिससे निर्णय प्रक्रिया का अत्यधिक केंद्रीकरण हो सकता है।
दूसरी प्रमुख चिंता निदेशक की स्वतंत्रता को लेकर है। आलोचकों का मानना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में केंद्र सरकार की प्रमुख भूमिका तथा समय-समय पर समीक्षा की व्यवस्था निदेशक की स्वायत्तता को सीमित कर सकती है।
शिक्षक, छात्र और शोधकर्ता यह भी आरोप लगाते हैं कि विधेयक तैयार करने से पहले व्यापक हितधारक परामर्श नहीं किया गया। हालांकि सरकार का कहना है कि जुलाई 2025 में बेंगलुरु में विचार-मंथन बैठक आयोजित की गई थी तथा पूर्व-विधायी परामर्श की समय-सीमा भी बढ़ाई गई थी।
एक अन्य चिंता विधेयक में मुख्यालय के स्पष्ट उल्लेख का अभाव है। 1959 के अधिनियम में कोलकाता को पंजीकृत कार्यालय बताया गया था, जबकि नए विधेयक में इसका उल्लेख नहीं है। इससे मुख्यालय के संभावित स्थानांतरण की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं, हालांकि सरकार ने ऐसी किसी भी योजना से इनकार किया है।
निष्कर्ष
भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2026 देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थानों की शासन व्यवस्था को अधिक आधुनिक, उत्तरदायी और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। सरकार इसे प्रशासनिक सुधार का माध्यम मानती है, जबकि शिक्षाविद् और शोध समुदाय इसे संस्थागत स्वायत्तता के लिए चुनौतीपूर्ण मानते हैं।
अतः इस विधेयक की सफलता प्रशासनिक दक्षता, उत्तरदायित्व और शैक्षणिक स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करेगी। यही संतुलित दृष्टिकोण भविष्य में अन्य राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की शासन व्यवस्था के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है।