चर्चा में क्यों ?
हाल के वर्षों में वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि अमेरिकी डॉलर के कमजोर होने के बावजूद सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।

प्रमुख बिन्दु:
- पहली बार सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के पार चला गया है।
- यह उछाल केवल आम निवेशकों की मांग से नहीं, बल्कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा आक्रामक सोना खरीदने के कारण आया है।
- इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां मानी जा रही हैं, जिन्होंने अनजाने में ही डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को कमजोर किया और सोने को फिर से वैश्विक आरक्षित संपत्ति के रूप में स्थापित किया।
डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती क्यों मिल रही है ?
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिकी डॉलर वैश्विक वित्तीय प्रणाली की रीढ़ रहा है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद-बिक्री, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक पूंजी प्रवाह में डॉलर का वर्चस्व बना रहा। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में यह स्थिति धीरे-धीरे बदलने लगी।
- ट्रंप ने व्यापार युद्ध (Trade Wars) शुरू किए
- चीन, रूस, ईरान जैसे देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए
- टैरिफ को विदेश नीति के हथियार की तरह इस्तेमाल किया
- इन कदमों से अमेरिका ने यह संदेश दिया कि डॉलर एक तटस्थ मुद्रा नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव का साधन भी हो सकता है। यही बात कई देशों को असहज करने लगी।
प्रतिबंधों ने डर पैदा किया:
- फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया। यह घटना वैश्विक स्तर पर एक चेतावनी बन गई।
- कई देशों ने सोचा अगर भविष्य में अमेरिका से राजनीतिक मतभेद हुए तो क्या हमारे डॉलर-आधारित भंडार भी सुरक्षित रहेंगे?
- यहीं से डॉलर से दूरी (De-dollarisation) की प्रक्रिया ने गति पकड़ी।
सोना: राजनीतिक रूप से तटस्थ विकल्प
- डॉलर पर भरोसा कमजोर होते ही देशों ने ऐसे विकल्प तलाशे जोराजनीतिक दबाव से मुक्त हों,
- प्रतिबंधों के दायरे में न आते हों और लंबे समय तक मूल्य बनाए रखें।
- सोना इन सभी शर्तों पर खरा उतरता है।
- इसी कारण सोना एक बार फिर वैश्विक आरक्षित संपत्ति (Reserve Asset) के रूप में उभर रहा है।
केंद्रीय बैंकों की आक्रामक खरीद
- वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार पोलैंड, कजाकिस्तान, ब्राजील और भारत जैसे देश 2025 में सबसे बड़े सोना खरीदार रहे
- यह व्यक्तिगत निवेश नहीं, बल्कि नीतिगत और रणनीतिक निर्णय हैं।
- यह दर्शाता है कि अब सोना केवल संकट का निवेश नहीं, बल्कि लंबी अवधि की रणनीति बन चुका है।
भारत और RBI का उदाहरण:
- भारत में इस बदलाव को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कदमों से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
- भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया वृद्धि का लगभग एक-तिहाई हिस्सा सोने के मूल्य में बढ़ोतरी से आया है
- पिछले एक साल में सोने की कीमतों में करीब 70% की वृद्धि हुई
- भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी-
- यह दिखाता है कि RBI केवल डॉलर परिसंपत्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
अमेरिकी बॉन्ड से दूरी:
- डॉलर से दूरी केवल मुद्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिकी सरकारी बॉन्ड (US Treasuries) से भी निवेश घटाया जा रहा है।
- RBI ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश घटाकर 186.5 अरब डॉलर कर दिया
- चीन की हिस्सेदारी 16 वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गई
- यूरोप के बड़े पेंशन फंड भी भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण अमेरिकी बॉन्ड से बाहर निकलने पर विचार कर रहे हैं
- यह दिखाता है कि अब पूंजी प्रवाह भी एक राजनीतिक हथियार बन गया है।
डॉलर क्यों कमजोर हो रहा है ?
- विशेषज्ञों के अनुसार डॉलर की कमजोरी के प्रमुख कारण हैं:
- व्यापार संरक्षणवाद
- लगातार प्रतिबंधों का उपयोग
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उभार
- BRICS जैसे समूहों द्वारा वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर विचार
- 2025 में अमेरिकी डॉलर में लगभग 9% की गिरावट दर्ज की गई, जो एक दशक में सबसे बड़ी गिरावट है।
क्या डॉलर का अंत हो रहा है ?
- नहीं, आज भी वैश्विक विदेशी मुद्रा लेनदेन का लगभग 89% हिस्सा डॉलर में होता है।
- डॉलर अभी भी सबसे मजबूत और तरल मुद्रा है लेकिन उसका निर्विवाद प्रभुत्व कमजोर जरूर हो रहा है।
- IMF के अनुसार:
- वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी
- 1999 में: 71%
- 2024 में: 58.5% (30 साल का निचला स्तर)
निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने अनजाने में ही वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था की बुनियाद पर सवाल खड़े कर दिए। इनके परिणामस्वरूप डॉलर की तटस्थता और विश्वसनीयता पर संदेह गहराया, जिससे अनेक देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधीकरण की रणनीति अपनाई और सोने की ओर रुख किया। इस प्रक्रिया ने एक प्रकार की वैश्विक स्वर्ण पुनरुत्थान (Global Gold Revival) को गति दी। आज विश्व धीरे-धीरे एक ऐसी मौद्रिक संरचना की ओर बढ़ रहा है जहाँ डॉलर अब एकमात्र केंद्रीय स्तंभ नहीं रहा। सोना पुनः एक रणनीतिक परिसंपत्ति के रूप में उभर रहा है और केंद्रीय बैंक अपने आर्थिक जोखिमों को संतुलित करने के लिए बहुध्रुवीय दृष्टिकोण अपना रहे हैं। यह बदलाव भले ही क्रमिक और धीमा हो, लेकिन इसका स्वरूप दीर्घकालिक और संरचनात्मक है। आने वाले वर्षों में यही परिवर्तन न केवल वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था को नया आकार देगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को भी गहराई से प्रभावित करेगा।