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संयुक्त राष्ट्र की भूमि क्षरण पर रिपोर्ट

प्रारंभिक परीक्षा 

(पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे)

मुख्य परीक्षा

(सामान्य अध्ययन प्रश्नप्रत्र- 3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन)

संदर्भ 

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भूमि क्षरण मानवता को बनाए रखने की पृथ्वी की क्षमता को कमजोर कर रहा है तथा इस प्रक्रिया को सुधारने या उत्क्रम करने (Reverse) में विफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए चुनौतियां उत्पन्न करेगी।

रिपोर्ट के बारे में 

  • शीर्षक : ‘स्टेपिंग बैक फ्रॉम द प्रीसिपिस: ट्रांसफॉर्मिंग लैंड मैनेजमेंट टू स्टे इनसाइड प्लैनेटरी बाउंड्रीज’ (Stepping back from the precipice: Transforming land management to stay within planetary boundaries)
  • जारीकर्ता : संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोधी सम्मेलन (UNCCD) द्वारा जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के सहयोग से 
  • यह रिपोर्ट रियाद (सऊदी अरब) में यू.एन.सी.सी.डी. के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज के 16वें सत्र (COP 16) के शुरू होने पहले जारी की गयी। 

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष 

  • प्रतिवर्ष दस लाख वर्ग किलोमीटर भूमि का क्षरण हो रहा है। ऐसा अनुमान है कि 15 मिलियन वर्ग किलोमीटर भूमि का क्षरण हो चुका है जो अंटार्कटिका महाद्वीप के पूरे क्षेत्र से भी अधिक है।
  • भूमि क्षरण ने पिछले दशक में वृक्षों एवं मृदा जैसे भूमि पारिस्थितिकी तंत्रों की मानव-जनित कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता को 20% तक कम कर दिया है। पहले, ये पारिस्थितिकी तंत्र इस तरह के प्रदूषण का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अवशोषित कर सकते थे।
  • वनों की कटाई, शहरीकरण आदि के कारण अभूतपूर्व पैमाने पर वैश्विक भूमि क्षरण हो रहा है, जिससे न केवल पृथ्वी प्रणाली के विभिन्न घटकों को खतरा हो रहा है, बल्कि मानव अस्तित्व को भी खतरा हो रहा है।
  • रिपोर्ट में दक्षिण एशिया, उत्तरी चीन, अमेरिका में हाई प्लेन्स और कैलिफोर्निया तथा भूमध्य सागर जैसे शुष्क क्षेत्रों में भूमि क्षरण के कई हॉटस्पॉट की पहचान की गई है। 
    • मानवता का एक-तिहाई हिस्सा अब शुष्क भूमि पर रहता है जिसमें अफ्रीका का तीन-चौथाई हिस्सा शामिल है।
  • रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भूमि क्षरण निम्न आय वाले देशों को असमान रूप से प्रभावित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसका प्रभाव उष्णकटिबंधीय एवं शुष्क क्षेत्रों में केंद्रित है और गरीब देशों में भूमि क्षरण तथा इसके परिणामों को सहन करने की क्षमता कम है।
  • अस्थायी सिंचाई पद्धतियां मीठे जल के संसाधनों को नष्ट कर देती हैं जबकि नाइट्रोजन एवं फास्फोरस आधारित उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर कर देता है।

क्या है भूमि क्षरण 

यू.एन.सी.सी.डी. के अनुसार, भूमि क्षरण वर्षा सिंचित कृषि भूमि, सिंचित कृषि भूमि, या क्षेत्र, चारागाह, वन एवं वनभूमि की जैविक या आर्थिक उत्पादकता और जटिलता में कमी या क्षति है, जो भूमि उपयोग और प्रबंधन प्रथाओं सहित विभिन्न दबावों के संयोजन के परिणामस्वरूप होती है।

भूमि क्षरण के कारण 

  • असंवहनीय कृषि पद्धतियाँ : रासायनिक इनपुट, कीटनाशकों और पानी के डायवर्जन का अत्यधिक उपयोग जैसी असंवहनीय कृषि पद्धतियाँ भूमि क्षरण के सबसे बड़े कारण हैं क्योंकि ऐसी प्रथाओं से मृदा के कटाव एवं प्रदूषण में वृद्धि होती है।
  • जलवायु परिवर्तन : भूमि क्षरण का एक प्रमुख कारक जलवायु परिवर्तन है क्योंकि भूमि क्षरण न केवल जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है बल्कि इससे प्रेरित भी होता है।
    • जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की एक रिपोर्ट के अनुसार  ग्लोबल वार्मिंग ने भारी वर्षा की आवृत्ति, तीव्रता एवं मात्रा में वृद्धि करने के साथ-साथ गर्मी के तनाव में वृद्धि करके भूमि क्षरण को अधिक खराब कर दिया है।
  • तीव्र शहरीकरण : वर्तमान में वैश्विक स्तर पर तेजी से शहरीकरण हो रहा है, जिसने आवास विनाश, प्रदूषण एवं जैव-विविधता क्षति में योगदान देकर भूमि क्षरण को तीव्र कर दिया है।

भूमि क्षरण का प्रभाव 

भूमि क्षरण से पृथ्वी के चारों ओर मनुष्यों एवं पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके प्रभावों में शामिल हैं :

  • खाद्य उत्पादन की गुणवत्ता एवं मात्रा को कम करके कुपोषण के जोखिम को बढ़ाना 
  • खराब स्वच्छता और स्वच्छ पानी की कमी के कारण होने वाली जल एवं खाद्य जनित बीमारियों में वृद्धि 
  • समुद्री एवं मीठे जल प्रणालियाँ पर नकारात्मक प्रभाव 
    • उदाहरण के लिए, उर्वरक एवं कीटनाशकों को ले जाने वाली मृदा का क्षरण जल निकायों में होता है, जिससे वहाँ रहने वाले जीव-जंतुओं और उन पर निर्भर स्थानीय समुदायों दोनों को नुकसान पहुँचता है।
  • जलवायु परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण योगदान
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