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भारत में अस्पृश्यता : एक गंभीर सामाजिक चुनौती

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा तथा बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान व निकाय)

संदर्भ

भारत में अस्पृश्यता (Untouchability) एक गंभीर सामाजिक समस्या रही है जो सदियों से सामाजिक एवं आर्थिक असमानता को बढ़ावा देती रही है। 15 जुलाई, 2025 को प्रकाशित एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम (PCR Act), 1955 के तहत अस्पृश्यता से संबंधित मामलों में 97% से अधिक मामले न्यायालय में लंबित हैं और अधिकांश निपटाए गए मामलों में अभियुक्त बरी हो रहे हैं।

अस्पृश्यता के बारे में

  • यह एक सामाजिक प्रथा है जिसमें कुछ समुदायों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों (SCs) को सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक गतिविधियों से बाहर रखा जाता है।
  • इस औचित्य का आधार ‘अशुद्धता’ एवं ‘मलिन’ की अवधारणा थी, जिसके तहत दलितों को पूजास्थलों में प्रवेश, सार्वजनिक जल स्रोतों का उपयोग और सामाजिक समारोहों में भागीदारी से वंचित किया जाता था।
  • यह प्रथा न केवल सामाजिक बहिष्कार को बढ़ावा देती है बल्कि मानवीय गरिमा एवं समानता को भी नकारती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • अस्पृश्यता की जड़ें भारतीय जाति (वर्ण) व्यवस्था में निहित हैं जो प्रारंभ में व्यवसाय (कर्म) आधारित थी।
  • वैदिक काल में चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की व्यवस्था थी किंतु समय के साथ यह वंशानुगत एवं कठोर होती गई।
  • कुछ समुदाय, जो कथित तौर पर ‘अशुद्ध’ कार्यों जैसे शवों का निपटान, चमड़े का काम, या सफाई से जुड़े थे, उन्हें ‘अवर्ण’ या ‘अस्पृश्य’ माना गया।
  • मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने इस प्रथा को धार्मिक औचित्य प्रदान किया। 
  • 19वीं और 20वीं सदी में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ की पहचान और महात्मा गांधी द्वारा ‘हरिजन’ शब्द के उपयोग से यह मुद्दा राष्ट्रीय मंच पर आया। 
  • स्वतंत्रता के बाद भारत ने संवैधानिक एवं कानूनी सुधारों के माध्यम से इसे समाप्त करने का प्रयास किया।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 17 : अस्पृश्यता को समाप्त करता है और इसके किसी भी रूप में अभ्यास को प्रतिबंधित करता है। इससे उत्पन्न होने वाली किसी भी अक्षमता का लागू करना अपराध है जो कानून के अनुसार दंडनीय है।
  • अनुच्छेद 14-18 : समानता, अवसर की समानता और भेदभाव के खिलाफ अधिकार सुनिश्चित करते हैं।
  • अनुच्छेद 35(a)(ii) : संसद को अनुच्छेद 17 के तहत अपराधों के लिए दंडात्मक कानून बनाने की शक्ति देता है।

संबंधित कानून एवं नीतियाँ

  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम (PCR Act), 1955 : अस्पृश्यता के अभ्यास को अपराध घोषित करता है और सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में भेदभाव को रोकता है।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 : अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के खिलाफ अत्याचारों को रोकने के लिए कठोर प्रावधान करता है।
  • सफाई कर्मचारी नियोजन एवं शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 : मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से सफाई कर्म) एवं ड्राई लैट्रिन्स (शुष्क शौचालय) के नियोजन पर रोक लगाता है।
  • मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का प्रतिषेध एवं उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 : मैनुअल स्कैवेंजर्स के पुनर्वास को सुनिश्चित करता है।
  • अंतर-जाति विवाह प्रोत्साहन : सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अंतर-जातीय विवाह करने वाले युगलों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।

सरकार की लंबित मामलों पर रिपोर्ट

15 जुलाई, 2025 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा जारी 2022 की वार्षिक रिपोर्ट ने PCR Act, 1955 के कार्यान्वयन पर प्रकाश डाला। यह रिपोर्ट राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • मामलों की संख्या में कमी : वर्ष 2022 में PCR अधिनियम के तहत केवल 13 मामले दर्ज किए गए, जो वर्ष 2021 में 24 और वर्ष 2020 में 25 से कम है। ये मामले जम्मू एवं कश्मीर (5), कर्नाटक (5), महाराष्ट्र (2) एवं हिमाचल प्रदेश (1) से थे।
  • लंबित मामले : पुलिस के पास 51 मामले लंबित थे, जिनमें से 12 में चार्जशीट दाखिल की गई। न्यायालय में 1,242 मामले लंबित थे।
  • बरी होने की उच्च दर : वर्ष 2022 में निपटाए गए 31 मामलों में से केवल एक में सजा हुई, बाकी 30 में बरी हो गए। वर्ष 2019-2021 के बीच निपटाए गए सभी 37 मामले भी बरी हुए।
  • अन्य अधिनियम की तुलना : अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत वर्ष 2022 में 62,501 मामले दर्ज किए गए और पुलिस के पास 17,000+ तथा न्यायालय में 2.33 लाख मामले लंबित थे।
  • अंतर-जातीय विवाह प्रोत्साहन : 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 18,936 युगलों को 2.5 लाख रुपए का प्रोत्साहन दिया गया। इसके सर्वाधिक लाभार्थी महाराष्ट्र (4,100), कर्नाटक (3,519) एवं तमिलनाडु (2,217) में सर्वाधिक थे।
  • डाटा की कमी : बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश एवं झारखंड ने अंतर-जातीय विवाह प्रोत्साहन पर डाटा नहीं उपलब्ध कराया। अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप ने PCR Act के कार्यान्वयन पर ‘शून्य’ जानकारी दी, जबकि मणिपुर ने कोई इनपुट नहीं दिया।

चुनौतियाँ

  • कम दोषसिद्धि दर : PCR अधिनियम के तहत मामलों में 97% से अधिक लंबित हैं, और लगभग सभी निपटाए गए मामलों में बरी होना कार्यान्वयन की कमजोरी को दर्शाता है।
  • पुलिस की अनिच्छा : पुलिस द्वारा शिकायतें दर्ज न करना या गलत तरीके से दर्ज करना (जैसे- भारतीय दंड संहिता के तहत) एक प्रमुख समस्या है।
  • संस्थागत पक्षपात : पुलिस, न्यायपालिका एवं प्रशासन में जातिगत पक्षपात प्रभावी प्रवर्तन में बाधा डालता है।
  • जागरूकता की कमी : कई पीड़ित अपने अधिकारों और कानूनी उपायों से अनजान होते हैं, जिसके कारण मामले दर्ज नहीं होते हैं।
  • प्रतिशोध का डर : सामाजिक बहिष्कार या हिंसा का डर पीड़ितों को शिकायत करने से रोकता है।
  • झूठे मुक़दमे : कुछ मामले झूठे मुकदमे से संबंधित होते हैं जिससे अभियुक्त बरी हो जाते हैं या आपसी समझौता हो जाता है।   
  • क्षेत्रीय भिन्नताएँ : कुछ राज्यों में अस्पृश्यता की प्रथा अधिक प्रचलित है किंतु डाटा संग्रह एवं निगरानी में असमानता है।

आगे की राह

  • प्रवर्तन को मजबूत करना : विशेष न्यायालय एवं पुलिस स्टेशनों को अधिक प्रभावी बनाना और जांच में तेजी लाना।
  • जागरूकता अभियान : स्कूलों, विश्वविद्यालयों एवं समुदायों में समानता व मानवाधिकारों पर शिक्षा को बढ़ावा देना।
  • संस्थागत सुधार : पुलिस एवं न्यायपालिका में विविधता व संवेदनशीलता प्रशिक्षण को बढ़ावा देना।
  • सामाजिक एकीकरण : अंतर-जातीय विवाह प्रोत्साहन और सामुदायिक पहलों को अधिक बढ़ाना।
  • डाटा संग्रह : सभी राज्यों से नियमित एवं पूर्ण डाटा एकत्र करने के लिए केंद्रीकृत तंत्र विकसित करना।
  • नागरिक समाज की भागीदारी : दलित संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों को समर्थन देना ताकि सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा मिल सके।

निष्कर्ष

अस्पृश्यता भारत में एक गंभीर सामाजिक और मानवाधिकार मुद्दा बना हुआ है, जिसके खिलाफ संवैधानिक व कानूनी उपायों के बावजूद पूर्ण सफलता नहीं मिली है। हालिया सरकारी रिपोर्ट उच्च लंबित मामलों और निम्न दोषसिद्धि दर की चुनौतियों को सामने लाती है। सामाजिक परिवर्तन के लिए कानूनी प्रवर्तन के साथ-साथ शिक्षा, जागरूकता एवं सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है। भारत को एक समावेशी व समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ने के लिए संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सुधारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को अधिक मजबूत करना होगा।

सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम (PCR Act), 1955

इस अधिनियम को पहले अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम के रूप में जाना जाता था, जो अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं-

  • धारा 3 : अस्पृश्यता के आधार पर किसी को सार्वजनिक स्थान, होटल या पूजा स्थल में प्रवेश से रोकना दंडनीय है, जिसमें 1-6 महीने की कैद और 100-500 रुपए का जुर्माना शामिल है।
  • धारा 4 : सामाजिक अक्षमताओं, जैसे- दुकान, रेस्तरां या सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों में प्रवेश से रोकना अपराध है।
  • धारा 5 : अस्पतालों, डिस्पेंसरियों या शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश से इनकार करना दंडनीय है।
  • धारा 6 : अस्पृश्यता के आधार पर किसी को सामान बेचने या सेवाएँ प्रदान करने से रोकना अपराध है।
  • धारा 10 : अपराधों को उकसाने को भी दंडनीय माना गया है और यदि कोई सार्वजनिक सेवक शिकायत की जाँच में लापरवाही करता है तो उसे उकसाने का दोषी माना जाएगा।
  • धारा 12 : अनुसूचित जाति के सदस्य के खिलाफ अपराध को अस्पृश्यता के आधार पर माना जाता है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो।
  • विशेष प्रावधान : विशेष मोबाइल कोर्ट और विशेष पुलिस स्टेशनों की स्थापना तथा सामूहिक जुर्माना लगाने की शक्ति (धारा 10A)।
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