संदर्भ
अमेरिका एवं बांग्लादेश के बीच पारस्परिक व्यापार समझौते के अंतर्गत कुछ चयनित परिधान वस्तुओं पर शून्य पारस्परिक शुल्क (Zero Reciprocal Tariff) देने का प्रावधान किया गया है। इसने भारत के वस्त्र निर्यातकों के बीच चिंता की स्थिति उत्पन्न कर दी है।
अमेरिका–बांग्लादेश वस्त्र समझौते की पृष्ठभूमि
- अमेरिका ने ऐसी व्यवस्था बनाने पर सहमति व्यक्त की है जिसके तहत बांग्लादेश से आयातित कुछ वस्त्र एवं परिधान उत्पादों को शून्य पारस्परिक शुल्क दर का लाभ प्रदान किया जाएगा।
- हालाँकि, यह सुविधा पूर्णतः बिना शर्त नहीं है। यह रियायत केवल एक निश्चित आयात सीमा तक उपलब्ध होगी और इसके लिए अमेरिकी निर्मित कपास तथा मानव-निर्मित फाइबर (MMF) से बने वस्त्र इनपुट का उपयोग अनिवार्य होगा।
- यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बांग्लादेश अमेरिका को परिधान निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है और वह भारत, चीन तथा वियतनाम जैसे देशों से सीधा मुकाबला करता है।
बांग्लादेश के वस्त्र क्षेत्र की संरचना
- वर्ष 2024 में बांग्लादेश ने वैश्विक स्तर पर 50.9 अरब डॉलर के परिधानों का निर्यात किया, जिनमें से 7.4 अरब डॉलर का निर्यात अमेरिकी बाजार में हुआ।
- बांग्लादेश का वस्त्र उद्योग आयातित कच्चे माल पर अत्यधिक निर्भर है। वर्ष 2024 में उसने 16.1 अरब डॉलर मूल्य के वस्त्र इनपुट आयात किए जिनमें 3.1 अरब डॉलर का हिस्सा भारत से था।
- हर वर्ष बांग्लादेश लगभग 85 लाख गांठ कपास ब्राज़ील, भारत और विभिन्न अफ्रीकी देशों से खरीदता है। केवल 2024–25 में भारत ने बांग्लादेश को 12 से 14 लाख गांठ कपास तथा 1.47 अरब डॉलर मूल्य का सूती धागा निर्यात किया।
- इससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश का परिधान उद्योग भारतीय कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला से गहराई से जुड़ा हुआ है।
अमेरिकी बाजार में भारत की स्थिति
- भारत का वार्षिक परिधान निर्यात लगभग 16 अरब डॉलर का है जिसमें से लगभग एक-तिहाई हिस्सा अमेरिका को जाता है।
- भारत और बांग्लादेश दोनों मुख्यतः सूती परिधानों का उत्पादन करते हैं। ऐसे में बांग्लादेश को दी जाने वाली किसी भी प्रकार की विशेष व्यापारिक रियायत का सीधा प्रभाव भारतीय निर्यातकों पर पड़ता है क्योंकि दोनों देश समान उत्पाद श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करते हैं।
- इस समय भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका में 18% पारस्परिक शुल्क लगाया जाता है जबकि बांग्लादेशी वस्तुओं पर यह शुल्क 20% से घटाकर 19% कर दिया गया है। परिणामस्वरूप, दोनों देशों के बीच शुल्क अंतर अब काफी सीमित रह गया है।
भारत–अमेरिका कपास व्यापार
- भारत प्रतिवर्ष लगभग पाँच लाख गांठ अमेरिकी कपास का आयात करता है जिनमें से लगभग 2.5 लाख गांठ अतिरिक्त लंबी रेशा (ELS) श्रेणी की होती हैं, जैसे अमेरिकी PIMA कपास।
- भारत सामान्य कपास पर 11% आयात शुल्क लगाता है। हालांकि, ELS कपास को इस शुल्क से छूट प्राप्त है। भारतीय कताई मिलों को पहले ही अमेरिकी ब्रांडों द्वारा अमेरिकी कपास से धागा तैयार करने हेतु नामित किया जा चुका है।
- केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने संकेत दिया है कि भारतीय परिधान निर्यातकों को भी अमेरिकी बाजार में बांग्लादेश जैसी सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी। फिर भी, इस संबंध में व्यावहारिक दिशानिर्देशों की स्पष्ट जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है।
व्यापारिक परिदृश्य में संभावित परिवर्तन
- संभव है कि बांग्लादेश शून्य पारस्परिक शुल्क का लाभ उठाने के लिए भारतीय कपास के स्थान पर अमेरिकी कपास को प्राथमिकता दे।
- यदि ऐसा होता है तो इसका त्वरित प्रभाव उन भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा जो बांग्लादेश को कपास और सूती धागा उपलब्ध कराते हैं। हालाँकि, विशेषज्ञों का मत है कि बांग्लादेश के 63% से अधिक परिधान निर्यात यूरोपीय संघ को शुल्क-मुक्त आधार पर होते हैं।
- इसलिए, अमेरिकी कपास को व्यापक रूप से अपनाने के लिए उसे अपनी कताई और प्रसंस्करण क्षमता में उल्लेखनीय निवेश करना पड़ सकता है क्योंकि उसकी मौजूदा आपूर्ति श्रृंखला मुख्यतः यूरोपीय खरीदारों के अनुरूप विकसित है।
भारतीय निर्यातकों के समक्ष प्रमुख प्रश्न
- क्या भारत प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अमेरिकी कपास पर लगाया गया 11% आयात शुल्क हटाएगा?
- अमेरिका किस प्रक्रिया से परिधानों में अमेरिकी कपास की मात्रा की पुष्टि करेगा?
- बढ़ती मांग के कारण क्या अमेरिकी कपास महँगा हो जाएगा, जिससे लागत बढ़ सकती है?
- क्या यह रियायत केवल पारस्परिक शुल्क तक सीमित रहेगी या मूल सीमा शुल्क पर भी लागू होगी?
- यह ध्यान देने योग्य है कि भारत और बांग्लादेश दोनों को राहत केवल पारस्परिक शुल्क में मिलेगी, वह भी अमेरिकी कपास के उपयोग की शर्त पर; मूल सीमा शुल्क में कोई छूट नहीं होगी।
- यदि अमेरिकी कपास की कीमतों में वृद्धि होती है तो उससे निर्मित परिधान वैश्विक स्तर पर उपलब्ध सस्ती कपास से बने उत्पादों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं।
व्यापक रणनीतिक प्रभाव
- यह घटनाक्रम तीन प्रमुख संरचनात्मक पहलुओं को सामने लाता है-
- व्यापार समझौतों में मूल-नियम (Rules of Origin) का बढ़ता महत्व
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और भू-राजनीति के बीच गहराता संबंध
- निर्यात प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने के लिए घरेलू शुल्क नीतियों के पुनर्संतुलन की आवश्यकता
- भारत का वस्त्र क्षेत्र कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक ढाँचे में किसी भी बदलाव का देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।