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व्हीकल-टू-व्हीकल (V2V) सुरक्षा तकनीक

चर्चा में क्यों ?

  • भारत में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतें एक गंभीर सार्वजनिक समस्या बनी हुई हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार तकनीकी समाधान अपनाने पर ज़ोर दे रही है। 
  • इसी क्रम में हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की कि दूरसंचार विभाग (DoT) ने वाहन-से-वाहन संचार प्रणाली के विकास हेतु 30 GHz रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम आवंटित किया है।  

V2V तकनीक क्या है ?

  • Vehicle-to-Vehicle (V2V) एक वायरलेस संचार तकनीक है, जिसके माध्यम से वाहन आपस में रीयल-टाइम जानकारी साझा कर सकते हैं। 
  • इसमें वाहन की गति, स्थिति, दिशा, ब्रेकिंग और त्वरण जैसी जानकारियाँ शामिल होती हैं। यह तकनीक Vehicle-to-Everything (V2X) की उपश्रेणी है और Intelligent Transport System (ITS) के अंतर्गत आती है। 
  • इसका मूल उद्देश्य चालक को केवल दृश्य संकेतों पर निर्भर न रखते हुए डिजिटल चेतावनियों के माध्यम से पहले से सतर्क करना है।

कार्यप्रणाली

  • इस प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक वाहन में एक On-Board Unit (OBU) लगाई जाएगी, जो आसपास मौजूद अन्य वाहनों से वायरलेस तरीके से संवाद करेगी। 
  • आमतौर पर V2V प्रणाली लगभग 300 मीटर की दूरी तक कार्य करती है। यदि कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाता है, सड़क किनारे कोई भारी वाहन खड़ा है, आगे कोहरा है या कोई ब्लैक स्पॉट मौजूद है, तो यह सूचना पास के वाहनों को तुरंत मिल जाती है। 
  • इससे चालक को समय रहते प्रतिक्रिया देने का अवसर मिलता है और दुर्घटनाओं की संभावना कम हो जाती है।

भारत के लिए इसकी आवश्यकता

  • भारत सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है। 
  • चीन और अमेरिका जैसे बड़े देशों की तुलना में भी भारत में दुर्घटना मृत्यु दर कहीं अधिक है।
  • सड़क किनारे खड़े ट्रक, तेज़ गति, कम दृश्यता और अचानक ब्रेक जैसी परिस्थितियाँ भारत में दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं। 
  • V2V तकनीक इन समस्याओं का पूर्व-चेतावनी आधारित समाधान प्रदान करती है, जिससे जान-माल की क्षति को कम किया जा सकता है।

कार्यान्वयन योजना और लागत

  • सरकार के अनुसार एक On-Board Unit (OBU) की लागत लगभग ₹5,000 से ₹7,000 होगी। 
  • इसे पहले चरण में नई गाड़ियों में अनिवार्य रूप से लगाया जाएगा और बाद में पुराने वाहनों में भी फिट किया जाएगा।
  • राष्ट्रीय आवृत्ति आवंटन योजना के तहत दूरसंचार विभाग द्वारा स्पेक्ट्रम मुफ्त उपलब्ध कराया जाएगा।
  • सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) वाहन निर्माताओं (OEMs) के साथ मिलकर इसके तकनीकी मानक तैयार कर रहा है और DoT के साथ एक संयुक्त टास्क फोर्स का गठन किया गया है। 
  • सरकार का लक्ष्य इसे इसी वर्ष लागू करने का है, हालांकि अभी औपचारिक तारीख घोषित नहीं हुई है।

संभावित चुनौतियाँ

  • V2V तकनीक के सामने कुछ तकनीकी और संस्थागत चुनौतियाँ भी हैं। सभी वाहनों के लिए एकसमान नेटवर्क और फ्रीक्वेंसी सपोर्ट सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है।
  • गलत या अधूरी सूचना के प्रसारण से दुर्घटना का जोखिम भी बना रहता है। इसके अलावा यह प्रणाली वाहन की लोकेशन और चालक से जुड़ा संवेदनशील डेटा एकत्र करती है, जिससे गोपनीयता और डेटा सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • साइबर हमले की स्थिति में पूरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम के दुरुपयोग की आशंका को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

वैश्विक अनुभव

  • अमेरिका V2V तकनीक के अनुसंधान और कार्यान्वयन में अग्रणी माना जाता है और वहाँ इसके लिए मजबूत नियामक ढाँचा मौजूद है। 
  • यूरोप के कई देश; जैसे जर्मनी, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम इसे स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और नई गाड़ियों में शामिल कर रहे हैं। 
  • चीन और जापान भी इस क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं; जापान का ITS Connect Program ट्रैफिक सिग्नल डेटा, ब्लाइंड-स्पॉट चेतावनी और आपातकालीन वाहन अलर्ट जैसी सुविधाएँ प्रदान करता है। 
  • भारत सहित यूएई, सऊदी अरब, ब्राज़ील और मेक्सिको जैसे देश अभी इसके पायलट चरण में हैं।

निष्कर्ष

Vehicle-to-Vehicle (V2V) तकनीक भारत में सड़क सुरक्षा के लिए एक परिवर्तनकारी पहल सिद्ध हो सकती है। यदि इसे स्पष्ट मानकों, मजबूत डेटा संरक्षण नियमों और प्रभावी साइबर सुरक्षा ढाँचे के साथ लागू किया जाए, तो यह सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी ला सकती है तथा भारत को एक स्मार्ट, सुरक्षित और भविष्य-उन्मुख परिवहन प्रणाली की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

प्रश्न. भारत में वाहन-से-वाहन (V2V) संचार प्रणाली के विकास हेतु दूरसंचार विभाग (DoT) ने कौन-सा स्पेक्ट्रम आवंटित किया है ?

(a) 5 GHz

(b) 10 GHz

(c) 26 GHz

(d) 30 GHz

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