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भारत में कमजोर मानसून और तैयारी

संदर्भ 

  • जून 2026 के अंत तक वर्षा गतिविधियों में हल्की सुधार की प्रवृत्ति देखने को मिली है, लेकिन मानसून के प्रारंभिक चरण में व्यापक और संरचनात्मक कमी के कारण लंबे शुष्क काल को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है।
  • भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, वर्तमान में भारत के लगभग 75 प्रतिशत भू-भाग में 20 प्रतिशत से अधिक की गंभीर वर्षा कमी (rainfall deficiency) दर्ज की जा रही है।  

भारत में कमजोर मानसून: पृष्ठभूमि 

  • पिछले दशक में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से मानसूनी मौसम पैटर्न अत्यधिक अस्थिर हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर वर्षा का असमान वितरण बढ़ा है।
  • इस बढ़ती संवेदनशीलता के जवाब में भारत ने अपनी आर्थिक और पर्यावरणीय सहनशीलता को संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ किया है। इसमें व्यापक स्तर पर वर्षा जल संचयन प्रणाली का विकास, ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों के माध्यम से भूजल प्रबंधन में सुधार, तथा नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड का तीव्र विस्तार शामिल है। 

वर्तमान कमजोर मानसून की प्रमुख स्थिति 

जून में भारी वर्षा घाटा :

  • जून 2026 में कुल वर्षा में लगभग 40% की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस कमी की भरपाई जुलाई तक पूर्ण रूप से संभव नहीं होगी।

मानसून का सीमित विस्तार: 

  • मानसूनी हवाएँ अभी तक देश के लगभग आधे भू-भाग तक ही पहुँच पाई हैं, जबकि सामान्य परिस्थितियों में जून के अंत तक यह लगभग संपूर्ण देश को आच्छादित कर लेती हैं।

व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव : 

  • देश के लगभग 75% क्षेत्र में 20% या उससे अधिक की गंभीर वर्षा कमी बनी हुई है। 

भारत में कमजोर मानसून के प्रमुख कारण 

1. अल नीनो प्रभाव 

  • भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति, जिसे अल नीनो कहा जाता है, सक्रिय हो चुकी है। इसके कारण मानसूनी वर्षा की तीव्रता कमजोर पड़ गई है। 

2. विलंबित प्रभाव (Lag Effect)

  • यद्यपि अल नीनो जून 2026 के पहले सप्ताह में सक्रिय हुआ, इसका पूर्ण प्रभाव लगभग एक महीने बाद भारतीय मौसम प्रणाली पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इससे जुलाई–अगस्त में स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। 

3. एमजेओ (Madden Julian Oscillation) का प्रतिकूल चरण 

  • जून के अधिकांश समय में वर्षा को दबाने वाला एमजेओ चक्र भारत के ऊपर स्थित रहा, जिसके कारण नमी युक्त बादलों का प्रवाह बाधित हुआ और वे भारतीय क्षेत्र से दूर चले गए।  

4. निम्न दबाव प्रणालियों की कमजोरी

  • महासागर में विकसित निम्न दबाव प्रणालियाँ पर्याप्त तापीय एवं संरचनात्मक शक्ति अर्जित नहीं कर सकीं, जिससे निरंतर वर्षा का निर्माण नहीं हो पाया।

5. मानसूनी हवाओं की कमजोर गति  

  • प्रारंभिक मानसूनी हवाएँ अपेक्षित शक्ति और गति के साथ देश के मध्य भागों तक नहीं पहुँच सकीं, जिसके कारण बड़े क्षेत्रों में शुष्क स्थिति बनी रही।

कमजोर मानसून के प्रभाव 

कृषि पर संकट :

  • दीर्घकालिक सूखे की स्थिति खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन दोनों को प्रभावित करती है, जिससे कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ता है।

ग्रामीण आय और मांग में गिरावट: 

  • कृषि-आधारित जनसंख्या की आय में कमी आने से ग्रामीण उपभोग घटता है और बाजार की मांग भी प्रभावित होती है।

खाद्य सुरक्षा पर दबाव:

  • उत्पादन में कमी के कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की संभावना रहती है, जिससे सरकार को बफर स्टॉक का उपयोग या निर्यात प्रतिबंध जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। 

भूजल और जलाशयों पर प्रभाव:

  • कम वर्षा के कारण भूजल पुनर्भरण बाधित होता है, जिससे कुएँ सूखने लगते हैं और पेयजल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। 

जलविद्युत उत्पादन में गिरावट:

  • नदी और जलाशयों में जलस्तर कम होने से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे विद्युत आपूर्ति प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। 

भारत की तैयारी और अनुकूलन क्षमता  

1. पर्याप्त जलाशय भंडारण

  • पिछले दो वर्षों की अनुकूल वर्षा के कारण प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त जल भंडार उपलब्ध है, जो एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में कार्य कर रहा है। 

2. नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार 

  • सौर और पवन ऊर्जा के तीव्र विकास से विद्युत ग्रिड की जलविद्युत पर निर्भरता में कमी आई है, जिससे जल संसाधनों का संरक्षण संभव हुआ है। 

3. ग्रामीण योजनाओं के तहत जल संरचना विकास

  • रोजगार-आधारित योजनाओं के अंतर्गत चेक डैम, वर्षा जल संचयन संरचनाएँ और जल संरक्षण कार्यों का बड़े पैमाने पर विस्तार किया गया है।

4. भूजल स्तर में सुधार

  • वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन और संरक्षण उपायों के चलते कई क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार देखा गया है।

5. कृषि क्षेत्र में अनुकूलन

  • भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा जारी डिजिटल पूर्वानुमानों के आधार पर किसानों ने खरीफ बुवाई के समय में समायोजन किया है तथा पूर्व-मानसून वर्षा का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया है। 

निष्कर्ष

  • मजबूत जलाशय भंडारण, नवीकरणीय ऊर्जा की सुदृढ़ प्रणाली और व्यापक जल-संरक्षण नेटवर्क मिलकर देश को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। भविष्य में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए क्षेत्रीय जलवायु लचीलापन और स्मार्ट कृषि पूर्वानुमान प्रणालियों में सतत निवेश आवश्यक होगा, ताकि अनियमित मौसम के प्रभावों से भारतीय अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके।

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