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डिजिटल असमानता : सामाजिक असमानता का दूसरा रूप

  • 17th October, 2020

(प्रारंभिक परीक्षा : आर्थिक तथा सामाजिक विकास, सतत विकास, गरीबी, समावेशन, जनसांख्यिकी तथा सामाजिक क्षेत्र में की गई पहल आदि)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2 : केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसँख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य निष्पादन, सरकारी नीतियों तथा विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय)

पृष्ठभूमि

कोविड-19 महामारी के कारण कार्यप्रणाली में व्यापक स्तर पर परिवर्तन आए हैं। कोविड-19 महामारी ने सभी के जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है। फेसमास्क, भौतिक दूरी और कांटेक्टलेस तकनीक तथा घर से कार्य अब ‘न्यू नार्मल’ (New Normal) का हिस्सा हैं। कम्प्यूटर या इंटरनेट जैसी तकनीकें अब एक सुविधा के रूप में ज़रूरी हो गई हैं। इसलिये तकनीक या इंटरनेट तक पहुँच को मूल अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान करना समय की माँग है।

डिजिटल असमानता/डिजिटल डिवाइड

यह अलग-अलग समूहों के मध्य सामाजिक और भौगोलिक आधार पर सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग या प्रभाव का असमान वितरण है। आयु, लिंग, शारीरिक विकलांगता, भाषा, शिक्षा प्रणाली, सामग्री तक पहुँच, प्रौद्योगिकी हार्डवेयर तक पहुँच, तकनीकी कौशल की कमी तथा रूढ़िवादी मनोवृत्ति जैसे कारक डिजिटल विषमता में योगदान देते हैं।

डिजिटल समावेशन की आवश्यकता

  • आर्थिक समस्याओं तथा डिजिटल साक्षरता की कमी के चलते डिजिटल असमानता व्यापक स्तर पर सामाजिक असमानता का रूप ले रही है।
  • वर्तमान महामारी ने बड़े स्तर पर कार्य संस्कृति में परिवर्तन किये हैं। सरकार के लगभग सभी कार्यक्रमों तथा योजनाओं का लाभ ऑनलाइन माध्यम से ही दिया जा रहा है। इसलिये लक्षित वर्ग तक पर्याप्त लाभ या सहायता पहुंचाने हेतु प्रौद्योगिकी तथा इंटरनेट की पहुँच आवश्यक है।

वर्तमान चुनौतियाँ

  • प्रौद्योगिकी का उपयोग सभी के लिये रोज़गार, शिक्षा और आय के स्तर पर भिन्न-भिन्न हो सकता है। कुछ लोग इंटरनेट तक पहुँच के लिये सार्वजनिक स्थानों (स्कूलों, पुस्तकालयों, रेलवे या मेट्रो स्टेशनों) का उपयोग करते हैं। लेकिन वर्तमान महामारी के दौरान भौतिक दूरी का पालन करने के कारण लोग सार्वजनिक केंद्रों पर इंटरनेट की सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हैं।
  • वर्तमान समय में समाज का एक बड़ा हिस्सा प्रौद्योगिकी तक पहुँच से वंचित है। उन्हें इंटरनेट या प्रौद्योगिकी के उपयोग से सम्बंधित पर्याप्त समझ भी नहीं है।

वर्तमान प्रयास

  • भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अनुसार, वर्ष 2018 में देश में कुल इंटरनेट घनत्व लगभग 49% था।
  • डिजिटल उपकरणों तथा इंटरनेट तक पहुँच के लिये बिजली तक पहुँच अनिवार्य है वर्तमान में भारत का लगभग 100% विद्युतीकरण किया जा चुका है।
  • भारत सरकार द्वारा ई-कॉमर्स और ई-गवर्नेंस को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 लागू किया गया है।
  • वर्ष 2016 में ग्राम पंचायतों तक इंटरनेट ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी सुनुश्चित करने हेतु नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क (NOF-N) परियोजना की शुरुआत की गई है।
  • भारत सरकार द्वारा पुणे स्थित सेंटर फॉर एडवांस कम्प्यूटिंग (C-DAC) की सहायता से डिजिटल विषमता की खाई को पाटने हेतु डिजिटल मोबाइल लाइब्रेरी की शुरुआत की गई है।
  • शहरी, ग्रामीण तथा दुर्गम क्षेत्रों तक डिजिटल पहुँच सुनिश्चित करने हेतु जन सेवा केंद्रों की स्थापना की गई है।
  • ग्रामीण तथा ख़राब आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा उपलब्ध करवाने हेतु हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा उन्नति परियोजना की शुरुआत की गई है।

डिजिटल समावेशन हेतु सुझाव

  • सभी के लिये वहनीय और मज़बूत ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा तक पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिये।
  • इंटरनेट उपयोग करने में सक्षम डिवाइस की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • डिजिटल असमानता को केवल प्रौद्योगिकी की भौतिक पहुँच तक ही सीमित नही रखना चाहिए बल्कि डिजिटल साक्षरता प्रशिक्षण को भी इसमें अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
  • गुणवत्तापूर्ण तकनीकी सहायता तक पहुँच सुनिश्चित हो।
  • आत्मनिर्भरता, सहभागिता और सहयोग को प्रोत्साहित करने वाले एप्लीकेशन तथा ऑनलाइन सामग्री तक सामान पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।

निष्कर्ष

महामारी के दौर में प्रौद्योगिकी ने अभूतपूर्व भूमिका (वर्चुअल बैठक, ऑनलाइन क्लास, न्यायालयों द्वारा वर्चुअल सुनवाई, घर से कार्य) अदा करते हुए संक्रमण के खतरे और प्रभाव को निश्चित रूप से कम किया है लेकिन डिजिटल असमानता की खाई को पाटने हेतु हमें इंटरनेट तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी तक पहुँच को एक अनिवार्य अधिकार के रूप में स्वीकृति प्रदान करनी होगी।

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