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जन्मस्थान के आधार पर आरक्षण और संवैधानिक उपबंध

(प्रारम्भिक परीक्षा: भारतीय राज्यतंत्र और शासन संविधान, राजनीतिक प्रणाली, लोकनीति, अधिकारों से सम्बंधित मुद्दे; मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2: विषय- भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना, संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय)

हाल ही में, मध्य प्रदेश सरकार के सभी सरकारी नौकरियों को“राज्य के बच्चों” के लिये आरक्षित करने का निर्णय लिया है। इस निर्णय के बाद से देश में समानता के मौलिक अधिकार से सम्बंधित चर्चा पुनः शुरू हो गई है।

समान व्यवहार के लिये संवैधानिक प्रावधान(Constitutional provision for Equal Treatment):

  • संविधान का अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोज़गार के मामलों में सभी नागरिकों के प्रति समान व्यवहारका आश्वासन देता है। यह अनुच्छेद राज्य को जन्म स्थान या निवास के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है।
  • अनुच्छेद 16(1) में कहा गया है कि ‘राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समता होगी’।
  • अनुच्छेद 16 (2) में कहा गया है कि “राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद या रोज़गार के सम्बंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद/भेदभाव किया जाएगा।” समानता का आश्वासन देने वाले संविधान के अन्य कई अनुच्छेद इसके पूरक हैं।
  • हालाँकि, संविधान का अनुच्छेद 16 (3) में कुछ अपवादों की बात की गई है और संसद किसी विशेष राज्य में नौकरियों के लिये निवास की आवश्यकता को "निर्धारित" कर सकती है।
  • यह शक्ति केवल संसद में निहित है, न कि राज्य विधानसभाओं में।

अधिवास के आधार पर आरक्षण पर संवैधानिक प्रतिबंध क्यों?

  • जब संविधान लागू हुआतो भारत,विभिन्न व्यक्तिगत रियासतों की भौगोलिक इकाई से एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ और इसके साथ ही सार्वभौमिक भारतीय नागरिकता के विचार को भी स्थापित किया गया।
  • भारत में एकल नागरिकता है और यह नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप से घूमने की स्वतंत्रता देती है।
  • इसलिये किसी भी राज्य में सार्वजनिक रोज़गार देने के लिये जन्म स्थान या निवास स्थान की आवश्यकता योग्यता नहीं हो सकती है।

क्या जाति जैसे अन्य आधारों पर आरक्षण नहीं दिया गया है?

संविधान में निहित समानता गणितीय समानता नहीं है और इसका मतलब यह नहीं है कि सभी नागरिकों को बिना किसी भेद के समान माना जाएगा।इसके लिये संविधान दो अलग-अलग पहलुओं को रेखांकित करता है जो भारतीय संविधान में प्रदत्त समानता को स्पष्ट करते हैं:

1. समानता के बीच विभेद नहीं, और
2. असमानता को खत्म करने के लिये सकारात्मक कदम

स्थानीय लोगों के लियेकोटा प्रणाली पर उच्चतम न्यायालय का फैसला:

  • उच्चतम न्यायालय, पूर्व में जन्म स्थान या निवास स्थान के आधार पर आरक्षण के खिलाफ फैसला सुना चुका है।
  • वर्ष 1984 में, डॉ. प्रदीप जैन बनाम भारत संघ में, "सन ऑफ़ द सॉयल (sons of the soil)" से जुड़े मुद्दे पर चर्चा की गई थी।
  • अदालत ने इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की थी कि इस तरह की नीतियाँ असंवैधानिक होंगी, लेकिन इस पर स्पष्ट रूप से कोई निर्णय नहीं दिया था क्योंकि यह मुद्दा समानता के अधिकार के विभिन्न पहलुओं से जुड़ा हुआ था।
  • वर्ष 1955 के डी.पी. जोशी बनाम मध्य भारत मामले में उच्चतम न्यायालय ने अधिवास या निवास स्थान तथा जन्मस्थान के बीच अंतर बताते हुए स्पष्ट किया था कि व्यक्ति का निवास स्थान बदलता रहता है लेकिन उसका जन्म स्थान निश्चित होता है। अधिवास का दर्जा जन्म स्थान के आधार पर दिया जाता है।
  • सुनंदा रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश (1995) में बाद के एक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने वर्ष1984 में राज्य सरकार की एक नीति, जिसमें उम्मीदवारों को 5% अतिरिक्त भारांक दिया गया था, को रद्द करने के लिये निर्णय दिया था।
  • वर्ष 2002 में, उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान में सरकारी शिक्षकों की नियुक्ति को अमान्य करार दिया था, जिसमें राज्य चयन बोर्ड द्वारा "सम्बंधित ज़िले या ज़िले के ग्रामीण क्षेत्रों के आवेदकों" को वरीयता दी गई थी।
  • वर्ष 2019 में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा एक भर्ती अधिसूचना पर भी टिप्पणी करते हुए उसे अमान्य बताया, जिसमें उत्तर प्रदेश की मूल निवासी महिलाओं के लिये प्राथमिकता निर्धारित की गई थी।

निजी क्षेत्र में स्थानीय लोगों के लिये नौकरियों के संदर्भ में:

  • यदि इस तरह की अनुमति मिलती है फिर भी इस तरह के कानून को लागू करना मुश्किल होगा।
  • निजी नियोक्ता पहले से अधिसूचित रिक्तियों को भरने के लिये वार्षिक रूप से भर्तियाँ नहीं निकालते बल्कि जब आवश्यकता होती है इस तरह की रोज़गार भर्तियों की सूचना निकालते हैं।
  • राज्य, स्थानीय लोगों को वरीयता दे सकता है लेकिन यह सुनिश्चित करना कि इसका पालन यथोचित तरीके से हो, मुश्किल लगता है।
  • वर्ष 2017 में कर्नाटक ने इसी तरह के कानून को लाने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य के महाधिवक्ता द्वारा इसकी वैधता पर सवाल उठाए जाने के बाद इसे हटा दिया गया था।
  • वर्ष 2019 में राज्य सरकार ने एक और अधिसूचना जारी की थी जिसमें निजी नियोक्ताओं को ब्लू-कॉलर नौकरियों (लिपिक और कारखाने के कर्मचारियों) के लिये कन्नड़ लोगों को चुनने के लिये कहा गया था।

फिर कुछ राज्यों में स्थानीय लोगों के लिये नौकरियों को आरक्षित करने वाले कानून कैसे हैं?

  • अनुच्छेद 16 (3) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए, संसद ने सार्वजनिक रोज़गार (निवास के रूप में आवश्यकता) अधिनियम लागू किया।
  • इस अधिनियम के द्वारा राज्यों में सभी मौजूदा निवास आवश्यकताओं को समाप्त करने की बात की गई और केवल आंध्र प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश के विशेष उदाहरणों के मामले में अपवादों को लागू करने की बात की गई।
  • संवैधानिक रूप से, कुछ राज्यों में अनुच्छेद 371 के तहत विशेष उपबंध भी किये गए हैं। धारा 371(d)के तहत आंध्र प्रदेश के पास निर्दिष्ट क्षेत्रों में "स्थानीय कैडर की सीधी भर्ती" करने की शक्ति है।
  • बहुत से राज्य अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में ही राज्य कार्य करने को प्रमुखता देते हैं अतः स्थानीय भाषा का ज्ञान ज़रूरी हो जाता है और इससे एक बात यह भी तय होती है कि इन क्षेत्रों/राज्यों में नौकरियों के लिये स्थानीय नागरिक पहली पसंद होते हैं। उदाहरण के लिये, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में रोज़गार के लिये भाषा परीक्षण की आवश्यकता होती है।

आगे की राह:

  • राज्य में पैदा हुए उम्मीदवारों को आरक्षण देने का निर्णय  संवैधानिक समानता और बंधुत्व की भावना के खिलाफ है। इन मामलों में अक्सर निर्णय राजनीति से प्रेरित होते हैं जिन्हें अक्सर न्यायपालिका द्वारा पलट दिया गया है।
  • सभी राज्य सरकारों या केंद्र सरकार को किसी भी योजना या उपबंध को लागू करते समय संविधान की मूल भावना का ध्यान रखना चाहिये।

(स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)

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