हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद 7वीं शताब्दी में उत्तर भारत में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गई। इसके बाद 8वीं शताब्दी के मध्य में उत्तर भारत और दक्कन क्षेत्र में कई शक्तिशाली राजवंशों का उदय हुआ।
इनमें पाल वंश बिहार और बंगाल क्षेत्र में, गुर्जर-प्रतिहार पश्चिमी भारत और ऊपरी गंगा घाटी में तथा राष्ट्रकूट वंश दक्कन क्षेत्र में प्रमुख शक्ति बनकर उभरे।
इन तीनों राजवंशों के बीच उत्तर भारत पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए लंबे समय तक संघर्ष चला, जिसे इतिहास में ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ (Tripartite Struggle) कहा जाता है।
इस संघर्ष का मुख्य केंद्र कन्नौज था, क्योंकि उस समय यह राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण नगर माना जाता था। अंततः इस संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहार को सबसे अधिक सफलता मिली और वे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरे।
मध्यकालीन बिहार के प्रमुख वंश और शासक
पाल वंश
गोपाल (750 ई. - 770 ई.)
गोपाल पाल वंश के संस्थापक थे, जिन्होंने लगभग 750 ईस्वी में बिहार और बंगाल क्षेत्र में पाल वंश की स्थापना की। पाल वंश की राजधानी मुंगेर थी।
गोपाल बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने बौद्ध विहारों तथा शिक्षा केंद्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया। उनके शासनकाल में बिहार में बौद्ध धर्म और शिक्षा का व्यापक विकास हुआ।
धर्मपाल (770 ई. - 810 ई.)
गोपाल के पश्चात उनके पुत्र धर्मपाल पाल वंश के शासक बने। धर्मपाल को पाल वंश का सबसे महान और शक्तिशाली शासक माना जाता है। उन्होंने विक्रमसिला विश्वविधालय तथा सोमपुर महाविहार की स्थापना करवाई।
उनके शासनकाल में कन्नौज पर अधिकार को लेकर पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंशों के बीच प्रसिद्ध त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ। धर्मपाल ने कन्नौज पर विजय प्राप्त कर ‘उत्तरापथस्वामीन’ की उपाधि धारण की।
11वीं शताब्दी के गुजराती कवि सोड्ठ्ठल ने भी उन्हें ‘उत्तरापथ स्वामी’ कहा है। धर्मपाल ने नालंदा महाविहार को 200 गाँव तथा विक्रमशिला महाविहार को 100 गाँव दान में दिए। उन्हें ‘परमसौगात’ की उपाधि से भी संबोधित किया गया तथा उनके दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान हरिभद्र रहते थे।
देवपाल (810 ई. - 850 ई.)
देवपाल धर्मपाल के उत्तराधिकारी के रूप में पाल वंश की राजगद्दी पर बैठे। उन्होंने मुंगेर को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया। देवपाल ने भी कन्नौज को लेकर पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंशों के बीच हुए त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया।
उनके शासनकाल में पाल साम्राज्य का विस्तार काफी बढ़ा और उन्होंने प्राग ज्योतिषपुर (असम) तथा उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। आधुनिक नेपाल के पूर्वी भाग पर भी पालों का प्रभुत्व स्थापित हो गया था तथा कुछ समय के लिए वाराणसी तक का क्षेत्र उनके नियंत्रण में आ गया था।
9वीं शताब्दी के मध्य में भारत आए अरब व्यापारी सुलेमान ने अपने यात्रा विवरण में पाल साम्राज्य की शक्ति और समृद्धि का उल्लेख किया है। उसने पाल राज्य को ‘रुहमा’ या ‘धर्म’ नाम से संबोधित किया, जो संभवतः धर्मपाल के नाम का संक्षिप्त रूप था।
देवपाल ने ओदंतपुरी महाविहार (बिहार शरीफ) का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त जावा के शैलेन्द्रवंशी शासक बालपुत्र देव के अनुरोध पर उन्होंने नालंदा महाविहार में एक बौद्ध विहार के निर्माण हेतु पाँच गाँव दान में दिए।
महिपाल प्रथम (988 ई. - 1038 ई.)
महिपाल प्रथम के शासनकाल में पाल वंश का पुनरुत्थान हुआ, इसलिए उन्हें पाल वंश का ‘द्वितीय संस्थापक’ भी कहा जाता है। उन्होंने समस्त बंगाल और मगध क्षेत्र पर पुनः अधिकार स्थापित किया।
महिपाल प्रथम के समय राजेंद्र प्रथम ने बिहार और बंगाल क्षेत्र पर आक्रमण किया, जिसमें महिपाल पराजित हुए। उनके बाद आने वाले शासक कमजोर सिद्ध हुए, जिसका लाभ उठाकर बंगाल में कैवर्त शक्तिशाली हो गए तथा सेन वंश ने उत्तर बिहार और बंगाल के कुछ भागों में अपना राज्य स्थापित कर लिया। परिणामस्वरूप पालों की शक्ति मगध के सीमित क्षेत्रों तक सिमटकर रह गई।
रामपाल (1097 ई. - 1098 ई.)
रामपाल को पाल वंश का अंतिम प्रमुख शासक माना जाता है। उनके शासनकाल में प्रसिद्ध कैवर्त विद्रोह हुआ। रामपाल की मृत्यु के बाद गहड़वाल वंश ने बिहार में शाहाबाद और गया तक अपना विस्तार कर लिया।
वहीं सेन वंश के शासक विजयसेन और बल्लालसेन ने भी गया के पूर्वी क्षेत्रों तक अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसी राजनीतिक अराजकता के वातावरण में 12वीं शताब्दी के अंत तक तुर्कों के आक्रमण भी बिहार में आरंभ हो गए।
पाल शासकों से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
पाल वंश तिब्बत के साथ घनिष्ठ सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध थे। पाल शासकों के संरक्षण में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान संतरक्षित तथा दीपांकर को तिब्बत आमंत्रित किया गया, जहां उन्होंने बौद्ध धर्म के एक नए स्वरूप का प्रचार-प्रसार किया।
इसके परिणामस्वरूप अनेक तिब्बती बौद्ध विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए नालंदा विहार और विक्रमशिला विश्वविधालय आने लगे। इसके अतिरिक्त पालों के दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भी महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध स्थापित थे।