आमतौर पर आदिवासी शेष समाज से पर्यथक रहने वाला तथा जंगलों में निवास करने वाला समूह है ,ब्रिटिश ब्रिटिश सरकार ने अपनी औपनिवेशिक नीति में शामिल करते हुए उनकी विशिष्ट भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया ।
परिणामस्वरूप जनजातियों द्वारा औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध जनजातीय आंदोलन का आरंभ हो गया ,इनका चरित्र अन्य सामुदायिक आंदोलनों से भिन्न, एकांकी और हिंसक था ।
बिहार के प्रमुख जनजातीय विद्रोह
संथाल विद्रोह/हूल विद्रोह (1855-56 ई.)
वर्ष 1855 में भागलपुर और राजमहल के आसपास के संथाल बहुल क्षेत्र जिसे 'दामिन-ए-कोह' कहा जाता था, के आदिवासियों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था । इस विद्रोह की शुरुआत वर्तमान झारखंड के साहिबगंज जिले के भोगनाडीह नामक स्थल से हुआ था यह एक संगठित जनजाति विद्रोह था ।
प्रमुख नेता - सिद्धू, कान्हू, चाँद एवं भैरव नामक चार भाइयों की महत्त्वपूर्ण भूमिका ।
इस विद्रोह की शुरुआत 30, जून 1855 को हुई थी जिसके उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 30 जून को 'हूल दिवस' मनाया जाता है।
भू-राजस्व नीति :
सन् 1793 में स्थायी बंदोबस्त के लागू होने के बाद ज़मींदारों ने लगान वसूली का कार्य अत्यंत कठोरतापूर्वक किया ।
आदिवासी कृषकों द्वारा समय पर लगान न चुकाने के कारण उन्हें उनकी भूमि से बेदखल कर दिया जाने लगा ।
वन संबंधी अधिकार :-
आदिवासी जीवनयापन के लिए वनोत्पादों पर आश्रित थे, कंपनी शासन ने वनों तक आदिवासियों की पहुँच को प्रतिबंधित किया । अंग्रेज़ों के इस कदम से नाराजगी बढ़ी ।
महाजनी प्रथा :-
जमींदारों द्वारा आदिवासियों को समय पर लगान के लिए मजबूर किया ।
उपज कम होने या नकदी के अभाव में महाजनों के शरण में जाना पड़ा ।
महाजनों द्वारा ऊँची ब्याजदर वसूल किया गया ।
बेगारी प्रथा :-
कंपनी ने शासन विस्तार के लिए विकासात्मक कार्य किए ,कार्यों के लिए अंग्रेजों द्वारा मज़दूरी भुगतान के बदले बेगार प्रथा को बढ़ावा दिया गया , आदिवासियों को आर्थिक एवं शारीरिक शिकार होना पड़ा ।
दिकुओं का प्रवेश :-
आदिवासी समाज अपनी पृथक मान्यताओं के कारण अन्य समाजों से अलग रहना पसंद करते थे ।
आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेज़ों ने औपनिवेशिक व्यवस्था का प्रसार किया वहाँ गैर-आदिवासी समुदाय का प्रवेश हुआ ।
इन गैर-आदिवासी समुदाय को ही दिकू कहा गया ।
मांझी व्यवस्था में हस्तक्षेप:
आदिवासी समाज विशेषकर संथालों में मांझी सामाजिक रूप से एक प्रतिष्ठित पद होता था ।
आदिवासी समाज के पंचायत में मांझी के निर्णय को काफी महत्त्व दिया जाता था ।
अंग्रेजों के प्रवेश ने इस मान्यता को प्रभावित किया ।
सरना व्यवस्था में हस्तक्षेप
संथालों के लिए सरना स्थल धार्मिक दृष्टि से सबसे पवित्र स्थल था ।
वर्ष 1813 के चार्टर एक्ट के तहत मिशनरियों के भारत में प्रवेश होने के पश्चात् उन्हें अपना धर्म त्यागकर ईसाई बनने के लिए मजबूर किया गया इससे आदिवासी बेहद आहत हुए ।
परहा पंचायत व्यवस्था में हस्तक्षेप:-
परहा पंचायत संथालों की प्रसाशनिक इकाई थी ।
कंपनी के प्रवेश होने से संथालों की इस परंपरागत प्रणाली को बाधित किया गया और औपनिवेशिक प्रणाली को अपनाने हेतु बाध्य किया गया ।
मुंडा /उलगुलान विद्रोह (1895-1900)
इसकी शुरुआत सिंहभूम(झारखंड) के संकरा गांव से हुई थी विद्रोह सामंती व्यवस्था, जमींदारी प्रथा और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा ने मुंडा आदिवासियों को जल, जंगल की रक्षा के लिए लोगों को प्रेरित किया , इसके लिए उन्होंने उलगुलान नाम से एक आंदोलन की शुरुआत की थी ।
प्रमुख कारण:-
भूमि का हस्तांतरण :-
मुंडा आदिवासियों में सामूहिक भूमि-व्यवस्था खूटकट्टी व्यवस्था प्रचलित थी , अंग्रेज़ों की लगानं दृष्टिकोण से ये ठीक नहीं थी , अंग्रेज़ों ने खूटकट्टी-व्यवस्था को खत्म कर मुंडाओं की ज़मीन गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित कर दी ।
बेठ-बेगारी व्यवस्था :-
यह एक प्रकार की बंधुआ मजदूरी की प्रथा थी ।
साहूकारों द्वारा शोषण :-
आदिवासियों को साहूकारों से काफी उच्च व्याज पर उधार लेना पड़ता था ।
जब मुंडा आदिवासी इस ऋण को नहीं चुका पाते थे तो साहूकारों द्वारा उनकी भूमि पर अधिकार कर लिया जाता था ।
इस प्रक्रिया में महाजनों की सहायता सरकार करती थी ।
सामाजिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप
मिशनरियों व दिकुओं के प्रवेश से उनकी विशिष्टता प्रभावित हुई ।
इसका प्रतिरोध करने के लिए तैयार हए ।
बिरसा आंदोलन के परिणाम
अनुमंडलीय व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 1905 में खूंटी और गुमला को प्रशासनिक सुविधा के लिए अनुमंडल बनाया गया ।
वर्ष 1908 में छोटानागपुर क्षेत्र की विभिन्न जनजातियों की भूमि संबंधी अधिकारों के लिए ‘छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम’ पारित किया ।
अधिनियम के माध्यम से आदिवासियों की पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश की गई ।
आर्थिक शोषण से बचाने के लिए बैठ-बेगारी जैसी बंधुआ मजदूरी की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया ।
बिरसा मुंडा
मुंडा विद्रोह या उलगुलान के प्रवर्तक बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 को राँची जिला (वर्तमान में खूंटी जिला) के अंतर्गत उलिहातु नामक गाँव में हुआ था ।
उनकी माता का नाम करमी मुंडा और पिता सुगना मुंडा था बिरसा मुंडा के धार्मिक गुरु का नाम आनंद पांडेय था ।
बिरसा मुंडा को 'धरती आबा' के नाम से पुकारा जाता था इन्होंने 'बिरसाइयत' नाम से एक नया धर्म स्थापित किया 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल से गिरफ्तार किया गया था ।
इनकी मृत्यु 9 जून, 1900 को राँची स्थित जेल में हुई
10 नवंबर, 2021 को आजादी की लड़ाई में आदिवासीस्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के लिए बिरसा मुंडा की जयंती ‘15 नवंबर’ को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में घोषित ।
बिहार के अन्य प्रमुख जनजातीय विद्रोह (Other Major Tribal Rebellions of Bihar)
ढाल विद्रोह 1767:-
1767 ई.में अंग्रेजों के सिंहभूम में प्रवेश के बाद ढालभूम के अपदस्थ राजा जगन्नाथ ढाल के नेतृत्व में व्यापक विद्रोह हुआ ।
बिहार(झारखंड) का पहला जनजातीय विद्रोह ।
पहाड़िया विद्रोह (1772-80 ई.):-
यह विद्रोह 1770 के दशक में राजमहल के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित जनजातियों द्वारा ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था के विरोध में हुआ ।
आदिवासियों द्वारा छापामार संघर्ष की कड़ी चुनौतियों से परेशान होकर अंग्रेजी सरकार ने 1778 ई. में समझौता करके इस क्षेत्र को 'दामिन-ए-कोह' क्षेत्र अर्थात् पूरे क्षेत्र को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया .
तमाड़ विद्रोह (1789-94)
वर्ष 1771 में अंग्रेजों ने छोटानागपुर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया जिससे यहाँ के राजाओं एवं जमींदारों को कंपनी का संरक्षण प्राप्त हुआ ।
इसके परिणामस्वरूप यहाँ के लोगों का शोषण शुरू हुआ, जमीनें हड़पी जाने लगी ।
इस शोषण से तंग आकर यहाँ के ‘उराँव जनजाति’ के लोगों ने 1789 ई. में विद्रोह कर दिया ।
चेरो विद्रोह (1800-02):-
यह विद्रोह जयनाथ सिंह के स्थान पर गोपाल राय को राजा बनाने के पक्षपातपूर्ण नीति के विरोध में चेरो किसानों द्वारा शुरू किया गया ।
जब गोपाल राय के खिलाफ विरोध बढ़ गया तो गोपाल राय स्वयं विद्रोहियों से जा मिला ।
इसके बाद चूड़ामन को वहाँ का राजा बनाया गया ।
चूड़ामन पूर्णरूप से अंग्रेज भक्त था इससे लोगों में असंतोष और बढ़ गया ।
चेरो सरदार भूषण सिंह ने खुला विद्रोह घोषित कर दिया ।
अंततः भूषण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और वर्ष 1802 में फाँसी दे दी गई ।
हो विद्रोह (1821-22):-
यह विद्रोह छोटानागपुर के 'हो' जनजातियों द्वारा सिंहभूम के राजा जगन्नाथ सिंह के विरुद्ध किया गया ।
जगन्नाथ सिंह के प्रति 'हो' लोग तटस्थ थे, लेकिन जब जगन्नाथ सिंह के अंग्रेजों से मैत्रीपूर्ण संबंध हो गए और 'हो' मित्रों के साथ दुर्व्यवहार करने लगे तो इन लोगों ने विद्रोह कर दिया ।
कोल विद्रोह (1831-1832 ई.):-
यह छोटानागपुर क्षेत्र में हुआ था ।
वर्ष -1831 ई.।
नेतृत्व -बुद्धो भगत ।
कोल विद्रोह छोटानागपुर क्षेत्र के सिंहभूम, रांची, हजारीबाग, पलामू और मानभूम के पश्चिमी क्षेत्रों में हुआ था ।
इस विद्रोह का मुख्य कारण कोल मुखियाओं (मुंडा) से बड़े पैमाने पर जमीन का हस्तांतरण बाहरी लोगों को किया जाना था ।
भूमिज विद्रोह (1832-1833 ई.):-
विद्रोह का नेतृत्व गंगा नारायण ने किया ।
यह विद्रोह अंग्रेजों की शोषणकारी लगान व्यवस्था के खिलाफ किया गया था। इसका प्रभाव वीरभूम एवं सिंहभूम के क्षेत्रों में था ।
सरदारी आंदोलन (1859 -81 ई.):-
मुंडा जनजाति द्वारा वर्ष 1850 ई. के बाद आदिवासियों द्वारा ईसाई धर्म अपना लेने के बाद भूमि संबंधी समस्या गंभीर हो गई , इसके लिए जनजातीय सुधार आंदोलन चलाए गए ।
इस विद्रोह का उल्लेख एक्सी राय ने अपनी पुस्तक 'द मुंडाज' में किया है ।
इसका उद्देश्य जमींदारों को बाहर निकलना, बेगारी समाप्त करना ।
भूमि पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करना था ।
सफाहोड़ आंदोलन (1870):-
लाल हेम्ब्रम के द्वारा इस आंदोलन को सन् 1870 में चलाया गया था।
इसे वेधी नामक कर के विरोध में चलाया गया था ।
जमींदारों द्वारा किसानों से मांगे गए बेगार या अवैध उपकर को वेथी कहा जाता था ।
खरवार आंदोलन (1874):-
नेतृत्वकर्ता -भागीरथ मांझी ।
आंदोलन का क्षेत्र संथाल परगना ।
यह आंदोलन प्राचीन मूल्यों और पारंपरिक जनजातीय मान्यताओं को पुनर्स्थापित करने के लिए चलाया गया था ।
इसमें सामाजिक कर्मों की शुद्धि के साथ भूमि-संबंधी सुधारों पर भी ध्यान दिया गया था ।
ताना भगत/ कुरुख धरम आंदोलन (1914):-
ताना का अर्थ होता है खींचना अर्थात् हे धर्मेश (उराँवों का देवता) हमें तुम अपनी ओर खींचो और बुराई से अलग करो ।
आंदोलन 21, अप्रैल 1914 ई. को गुमला जिला (वर्तमान झारखंड) के अंतर्गत विशुनपुर प्रखंड के चिंगरी नवाटोली गाँव से शुरू हुआ था ।
नेतृत्व उराँव जनजाति ।
उराँव झारखंड का प्रमुख जनजातीय समूह है ।
इस विद्रोह का नेतृत्व आदिवासी समूहों में भगत कहे जाने वाले संत, धर्माचार्य, फकीर आदि (जतरा भगत) ने किया ।
इसके अंतर्गत उराँव जनजाति में प्रचलित कुरीतियों, जैसे भूत-प्रेत की मान्यता, पशु बलि एवं मदिरा-पान आदि का विरोध तथा शाकाहार, तपस्या और संयम को प्रोत्साहित किया गया ।
इस विद्रोह की प्रमुख विशेषता यह थी कि गांधीवादी समर्थकों ने अपने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से आदिवासियों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा ।
बिहार के अन्य विद्रोह
नोनिया विद्रोह:-
वर्ष 1700-1800 के दौरान बिहार के नोनिया जाति के लोगों द्वारा शोरा उद्योग के शोषण के शिकार से परेशान होकर विद्रोह कर दिया था ।
यह विद्रोह शोरा उत्पादक क्षेत्र हाजीपुर, तिरहुत, सारण और पूर्णिया में हुआ ।
इन लोगों को शोरा उत्पादन का बहुत कम कीमत प्राप्त होता था ।
ये लोग अंग्रेज व्यापारियों के बदले किसी अन्य व्यापारियों को शोरा बेचने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ इनका संघर्ष हुआ ।
लोटा विद्रोह (1856 ई.):-
वर्ष 1857 की क्रांति से पूर्व ही 1856 ई. में मुजफ्फरपुर के जेल में बंद कैदियों ने विद्रोह कर दिया था ।
इसे लोटा विद्रोह कहा गया। उल्लेखनीय है कि जेल में कैदियों को इस समय पीतल का लोटा दिया जाता था ।
लेकिन एक निर्णय के बाद पीतल के स्थान पर मिट्टी के बर्तन देना प्रारंभ कर दिया जिसका विरोध इन कैदियों ने किया ।
इस निर्णय को वापस लेना पड़ा और कैदियों को पुनः पीतल का लोटा देना आरंभ किया ।
बहावी आंदोलन:-
मुस्लिम समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के उद्देश्य से वहावी आंदोलन की शुरुआत की गई ।
इस आंदोलन के प्रवर्तक अरब के अब्दुल बहाव थे ।
भारत में इस आंदोलन के नेता सैयद अहमद बरेलवी थे ।
इनका जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली में वर्ष 1776 में हुआ था ।
पटना में आंदोलन का नेतृत्व विलायत अली एवं इनायत अली ने किया ।