1757 ई. के प्लासी युद्ध के पश्चात् अंग्रेज़ नीति-निर्माता की भूमिका में आ गए। उनका मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार तथा व्यापारिक लाभ अर्जित करना था। भारत में अंग्रेज़ी शासन की स्थापना के साथ ही उसके विरुद्ध विरोध भी प्रारम्भ हो गया था।
बंगाल में संन्यासी विद्रोह, खानदेश (गुजरात) में किसान असंतोष तथा संथाल, कोल, मुंडा, खासी एवं गोंड जैसी जनजातियों ने सशस्त्र विद्रोहों के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। यद्यपि इन विद्रोहों की प्रकृति स्थानीय, असंगठित एवं स्वतःस्फूर्त थी, इसलिए उनका प्रभाव सीमित रहा।
किन्तु 1857 ई. का विद्रोह अपने स्वरूप, व्यापकता और प्रभाव के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इस विद्रोह ने ब्रिटिश सत्ता की जड़ों को हिला दिया तथा भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ प्रस्तुत किया।

1857 के विद्रोह के कारण (Causes of the Revolt)

1857 के विद्रोह के आर्थिक कारण (Economic Cause)

1857 के विद्रोह के सामाजिक एवं धार्मिक कारण (Social & Religious Causes)

1857 के विद्रोह के राजनीतिक कारण (Political Causes)

1857 के विद्रोह के सैनिक कारण (Military Causes)

1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारण (Immediate Causes)

1857 के विद्रोह का बिहार में प्रसार (Spread in Bihar)
- 1857 की क्रांति ने भारतीय इतिहास के साथ-साथ बिहार के इतिहास को भी प्रभावित किया।1857 की क्रांति ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध देश में संचित सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक राजनीतिक असंतोष का परिणाम थी ,केंद्रीय स्तर पर यह क्रांति 10 मई, 1857 को शुरू हुई थी ।
- अविभाजित बिहार में इस क्रांति की शुरुआत 12 जून, 1857 को देवघर जिले के रोहिणी गाँव में हुआ , यहाँ 32वीं रेजीमेंट के के 5वीं इरेग्युलर केवेलरी के तीन सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था।
- पटना के कमिश्नर टेलर ने यहाँ के तीन प्रभावशाली मौलवियों मोहम्मद हुसैन, अहमदुल्ला, वजीबुल हक को 19 जून को बहावियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया, इससे पटना में स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई।
- इस तनावपूर्ण माहौल में ही 3 जुलाई, 1857 को पटना में एक पुस्तक विक्रेता पीर अली के नेतृत्व में व्यापक विद्रोह हुआ ।
- इस समय विद्रोहियों ने पटना सिटी तक के इलाके को अपने कब्जे में ले लिया। हालाँकि अफीम एजेंट लायल ने विद्रोह को दबाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली और वह सैनिकों के साथ मारे गए। इसके बाद पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने विद्रोह का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया। पीर अली सहित सभी नेताओं को फाँसी दे दी गई।
- इसके बाद विद्रोह की चिंगारी मुजफ्फरपुर पहुँच चुकी थी, जहाँ 25 जुलाई, 1857 को असंतुष्ट सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारी की हत्या कर डाली। इसी दिन दानापुर छावनी के तीन 7वीं, 8वीं और 40वीं रेजीमेंट के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और अगले दिन अर्थात् 26 जुलाई, 1857 को विद्रोही सैनिक शाहाबाद जिले में प्रवेश कर गए। यहाँ सैनिकों को कुंवर सिंह का सशक्त नेतृत्व प्राप्त हुआ।
- दक्षिण बिहार में ठाकुर विश्वनाथ सहदेव, पांडे गणपत राय के नेत्रत्व में विद्रोह हुआ ,इसे देखकर कंपनी शासन ने पटना, शाहाबाद, सारण, मुजफ्फरपुर और चंपारण आदि क्षेत्रों में मार्शल लॉ लागू कर दिया।
- दानापुर का सैनिक मुख्यालय मेजर जनरल लोआउट के संरक्षण में था।
- 1857 के विद्रोह के दौरान मुंगेर का क्षेत्र अप्रभावित रहा।
- जबकि दानापुर, गया, पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर और चंपारण 1857 के विद्रोह के प्रमुख केंद्र थे।
1857 के विद्रोह में कुँवर सिंह की भूमिका (Role of Kunwar Singh)
पूर्व-नियोजित :-
- अंग्रेजों द्वारा कुँवर सिंह की रियासत में अधिक हस्तक्षेप किए जाने के कारण, उन्हें पहले से ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ शिकायत थी ।बिहार में विद्रोह भड़कने से पहले ही कुँवर सिंह ने विद्रोह की तैयारी शुरू कर दी थी।
- अपने किले की मरम्मत, हथियारों और गोला-बारूद के उत्पादन के लिए कारखाना और लगभग 10,000 की संख्या में सशस्त्र सैनिकों की व्यवस्था की थी।
नेतृत्वकर्त्ता के रूप में:-
- 25 जुलाई, 1857 को दानापुर में विद्रोह के बाद सैनिकों ने लगभग 75 वर्षीय बाबू कुँवर सिंह से मिलने का फैसला किया।
- विद्रोही सैनिकों का कुँवर सिंह के साथ मिलना इस क्रांति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
- इनके नेतृत्व ने क्रांति को अत्यंत जुझारू और शक्तिशाली बना दिया।
गुरिल्ला पद्धति:-
- इन्होंने अंग्रेजों की चुनौती स्वीकार करते हुए विद्रोही सैनिकों की छोटी-छोटी टुकड़ियाँ बनाई और उन्हें गुरिल्ला युद्ध के लिए तैयार किया।
- आरा में विद्रोह को दबाने के लिए कैप्टन डनवर के नेतृत्व में जब ब्रिटिश सैनिक पटना से आरा की ओर आ रहे थे तो सोन नदी के समीप पहले से ही घात लगाकर बैठे विद्रोही सैनिकों ने उस पर हमला कर दिया।
- एक आँकड़े के अनुसार,अंग्रेजों के 415 में से लगभग 50 सैनिक ही जिंदा बचकर वापस लौटे।
विद्रोह को अखिल भारतीय स्वरूप:-
- उन्होंने विद्रोह को अखिल भारतीय स्वरूप देने के लिए अन्य विद्रोही नेताओं के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश की ,कुँवर सिंह ने 1857 के विद्रोह को बिहार के बाहर भी प्रसारित किया, जिसमें कानपुर, लखनऊ आदि प्रमुख हैं।
- लखनऊ में अवध के राजा ने उन्हें सम्मानित किया और आजमगढ़ पर अधिकार करने के लिए फरमान जारी किया।
- 22 मार्च, 1857 को आजमगढ़ के समीप अतरोलिया पर कुँवर सिंह ने कब्जा कर लिया जिससे ब्रिटिश की चिंता काफी बढ़ गई।
- इसके अतिरक्त ग्वालियर, रीवा आदि क्षेत्रों में विद्रोही समूहों के सहयोग से अंग्रेजों का विरोध किया।
- इनके प्रयासों ने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया।
अदम्य साहस और वीरता का परिचय:-
- जब वह आजमगढ़ में थे तो लॉर्ड कैनिंग ने लॉर्ड लुगार्ड को भेजा। लेकिन, समय पर सूचना मिलने से कुँवर सिंह ने आजमगढ़ छोड़ने का फैसला किया और गाजीपुर चले गए , लुगार्ड कुँवर सिंह को नहीं पकड़ सका ,गाजीपुर की जनता ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।
- लुगार्ड ने उनकी गिरफ्तारी के लिए डगलस को भेजा और 25,000 रुपए का इनाम घोषित किया ,17 अप्रैल, 1858 को डगलस ने उस पर हमला किया, लेकिन उसे पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
- इस लड़ाई में एक गोली से कुँवर सिंह का बायाँ हाथ जख्मी हो गया। कुँवर सिंह ने अपनी तलवार निकाली और अपना बायाँ हाथ कोहनी के पास से काटकर गंगा को अर्पित कर दिया ,26 अप्रैल 1858 को, कुँवर सिंह की मृत्यु हो गई ।
- उनकी मृत्यु के बाद उनके भाई अमर सिंह ने अंग्रेज़ों से लड़ाई जारी रखी। इस तरह कुँवर सिंह ने 1857 की क्रांति के इतिहास में बिहार के गौरव को ऊँचे शिखर पर पहुँचाया। उनके द्वारा किए गए कार्य बिहार के गौरवशाली इतिहास में स्वर्णाक्षरों के रूप में दर्ज हैं ।
कुँवर सिंह की भूमिका का मूल्यांकन (Evaluation of Kunwar singh’s Role)
- कुँवर सिंह ने 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करते हुए न केवल बिखरे हुए सैनिकों को एकता के सूत्र में आबद्ध करने का प्रयास किया और औपनिवेशिक सत्ता का संगठित प्रतिरोध करते हुए उन्होंने बिहार के विद्रोह को क्षेत्रीय दायरे से बाहर विस्तार देने का प्रयास किया ।
- शायद इतिहास में पहली बार 75साल के कुँवर सिंह ने युवा जोश के साथ अपने बूढ़े हाथों में तलवार लेकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रखर दोपहरी में उसे ललकारा और जुलाई, 1857 अप्रैल, 1858 के बीच महज नौ माह के दौरान पंद्रह भयानक युद्ध लड़े ।
- 1857 के विद्रोही नेताओं में युद्ध की कला की योग्यता रखने वाले कुंवर सिंह से बढ़कर कोई नेता नहीं था ।
बिहार के अन्य नेताओं को प्रेरित किया:-
- कुँवर सिंह ने छोटानागपुर, संथाल परगना और बिहार के अन्य हिस्सों में नेताओं को संघर्ष जारी रखने के लिए प्रेरित किया ।
- बिहार में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में कुँवर सिंह अग्रणी रहे हैं।
वीर कुँवर सिंह का परिचय

- सन् 1857 की क्रांति में कुँवर सिंह का नाम कई दृष्टि से उल्लेखनीय है
- वह एक वयोवृद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ बहादुरी से मुकाबला किया ।
- कुँवर सिंह उज्जैनिया राजपूतों की शाखा से आते है जो मालवा के परमार राजपूत से संबंधित थी ।
- कुँवर सिंह का जन्म बिहार के शाहाबाद के जगदीशपुर में सन् 1782 में हुआ था ।
- उनके पिता का नाम साहबजादा सिंह और माता का नाम पंचरतन कुँवर था।
- उनके पिता साहबजादा सिंह जगदीशपुर रियासत के प्रमुख थे, जो एक उदार एवं स्वाभिमानी व्यक्ति थे ।
- कुँवर सिंह की शिक्षा-दीक्षा जगदीशपुर मे ही हुई जहाँ उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और फारसी सीखी , वीर की रुचि पढ़ाई में कम थी तथा घुड़सवारी, कुश्ती और तलवारबाज़ी आदि पर अधिक ध्यान था।
1857 ई. के विद्रोह का परिणाम एवं प्रभाव
- कंपनी के शासन का अंत
- ब्रिटिश सरकार ने भारत सरकार अधिनियम, 1858 पारित किया।
- इसके तहत कंपनी के शासन को समाप्त कर ब्रिटिश क्राउन को सौंप ।
- ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में भारत सचिव का पद बनाया गया ।
- भारत सचिव की सहायता के लिये 15 सदस्यीय मंत्री परिषद का गठन किया गया ।
- हितवादी सरकारी नीति का उद्भव :-
- विद्रोह के पश्चात् ब्रिटिश द्वारा अपनी राजनीतिक सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उदारवादी नीतियों की घोषणा की गई।
- भारतीयों को प्रशासन में प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु भारत परिषद् अधिनियम, 1861 पारित किया गया ।
- सरकारी नौकरियों में नस्लीय भेदभाव कम किया गया 1861 ई. में 'भारतीय नागरिक सेवा अधिनियम' बनाया गया। इसके अंतर्गत प्रत्येक वर्ष लंदन में एक प्रतियोगिता परीक्षा अयोजित करने की बात की गई।
- जातीय विभेद को बढ़ावा हिन्दू-मुसलमानों के बीच मे सांप्रदायिकता पैदा की ।
- आर्थिक नीतियों में परिवर्तन लगान सुधार करते हुए लगान कानून पारित किया गया ।
- गवर्नर-जनरल की स्थिति में परिवर्तन :-
- 1858 ई. के अधिनियम द्वारा गवर्नर-जनरल की स्थिति में परिवर्तन हुआ।
- उसके पद की गरिमा को बढ़ाते हुए उसे वायसराय कहा जाने लगा।
- लॉर्ड कैनिंग ब्रिटिश भारत का प्रथम वायसराय बना ।
- वायसराय की सहायता के लिये कार्यकारिणी परिषद का गठन किया गया ।
- ब्रिटिश सत्ता में रजवाड़ों का समावेश :-
- रियासतों के विलय की नीति का त्याग कर दिया गया ।
- उन्हें गोद लेने का अधिकार वापस दे दिया गया।
- सेना का पुनर्गठन :-
- सैन्य पुनर्गठन के लिये ‘पील कमीशन’की नियुक्ति ।
- साम्राज्यवादी विस्तार की नीति में परिवर्तन :-
- विलय और विस्तार की नीति समाप्त ।
विद्रोह की विफलता के कारण
- संगठन का अभाव ।
- निश्चित उद्देश्य का अभाव ।
- आधुनिक हथियार व प्रौद्योगिकी का अभाव ।
- अधिकतर देशी राज्यों व सामंतों का अंग्रेजों के साथ बने रहना ।
- कुशल नेतृत्व का अभाव ।
- शिक्षित एवं बुद्धिजीवी वर्ग की उदासीनता ।