बिहार में नूहानियों की शक्ति के पतन के पश्चात् शेरशाह सूरी का उदय हुआ। शेरशाह सूरी सूर वंश का संस्थापक तथा लोदी वंश के बाद भारत का द्वितीय अफगान शासक बना। उसका वास्तविक नाम फरीद खान था। उसका जन्म 1472 ई. में एक अफगान परिवार में हुआ था। उसके पिता हसन खाँ जौनपुर के जागीरदार थे।
उसकी प्रारंभिक शिक्षा जौनपुर में हुई। उसने दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी के यहाँ नौकरी की। एक शेर को मारने पर बहार खाँ लोहानी ने उसे ‘शेर खाँ’ की उपाधि दी। बाद में लोहानी ने उसे अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्त किया। लोहानी की मृत्यु के बाद शेरशाह ने उसकी विधवा बेगम से विवाह कर दक्षिण बिहार की सूबेदारी प्राप्त कर ली।
शेरशाह सूरी ने अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण युद्ध लड़े। 1528 ई. में चंदेरी के युद्ध में वह बाबर की ओर से मुगल सेना में शामिल हुआ था। 1529 ई. में घाघरा के युद्ध में उसने महमूद लोदी की ओर से बाबर का सामना किया, किंतु महमूद लोदी पराजित हुआ। इसी वर्ष शेर खाँ ने बंगाल के शासक नुसरत शाह को हराकर ‘हजरले आला’ की उपाधि प्राप्त की।
1539 ई. में चौसा के युद्ध में शेर खाँ ने हुमायूँ को पराजित किया। यह युद्ध बिहार के बक्सर के निकट कर्मनाशा नदी के तट पर हुआ था। विजय के बाद उसने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और सिक्के जारी किए। 1540 ई. में कन्नौज अथवा बिलग्राम के युद्ध में उसने हुमायूँ को निर्णायक रूप से पराजित किया, जिसके परिणामस्वरूप हुमायूँ को भारत छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा। इसी विजय के बाद शेरशाह के नेतृत्व में द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना हुई।
1544 ई. में शेरशाह का युद्ध मारवाड़ के शासक मालदेव से हुआ। इस युद्ध में राजपूत सरदार जयता और कुप्पा ने वीरता का परिचय दिया। इस संघर्ष के संदर्भ में शेरशाह ने कहा था कि “एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं अपना साम्राज्य खो बैठता।” 1545 ई. में कालिंजर अभियान उसका अंतिम अभियान सिद्ध हुआ। इसी दौरान तोप के गोले से आग लगने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। बिहार के सासाराम में उसका भव्य मकबरा स्थित है।
शेरशाह सूरी को उसकी विजयों से अधिक प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है। उसे “अकबर का पूर्वगामी” कहा जाता है क्योंकि उसके कई सुधारों को बाद में अकबर ने अपनाया। उसने परंपरागत तथा आधुनिक तत्वों का समन्वय करते हुए शासन व्यवस्था विकसित की। इसी कारण उसे प्राचीन और आधुनिक शासन व्यवस्था के बीच की कड़ी माना जाता है। शेरशाह को एक “उदार तानाशाह” भी कहा जाता है।
उसके शासन में दीवान-ए-विजारत राजस्व एवं वित्त का प्रमुख था, दीवान-ए-आरिज सेना का प्रमुख, दीवान-ए-रसालत विदेश विभाग का प्रमुख तथा दीवान-ए-इंशा संचार विभाग का अधिकारी था। गुप्तचर व्यवस्था का दायित्व बरीद पर था।
शेरशाह ने सल्तनतकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को जारी रखा। उसका साम्राज्य 47 सरकारों में विभाजित था और प्रत्येक सरकार कई परगनों में विभाजित थी। परगनों का प्रशासन शिकदार, आमील, फोतेदार और कारकुन जैसे अधिकारियों के हाथ में होता था।
गाँव प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। कानून एवं व्यवस्था के लिए मुख्य शिकदार तथा न्याय के लिए मुसिफ की नियुक्ति की जाती थी।
शेरशाह ने भू-राजस्व व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाया। भूमि मापन के लिए गज-ए-सिकंदरी का प्रयोग किया गया। भूमि को उपजाऊ, मध्यम और अनुपयुक्त श्रेणियों में बाँटा गया तथा औसत उत्पादन का एक-तिहाई हिस्सा राज्य कर के रूप में लिया जाता था।
उसने पट्टा और कबूलियत प्रणाली की शुरुआत की। राजस्व अधिकारियों को आमील और कानूनगो कहा जाता था, जिनका कार्य राजस्व अभिलेख तैयार करना था।
शेरशाह ने मुद्रा व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए। उसने चाँदी का ‘रुपया’ तथा ताँबे का ‘दाम’ चलाया, जो लंबे समय तक प्रचलन में रहे। बाद में मुगल शासकों ने भी इसी मुद्रा प्रणाली को अपनाया।
शेरशाह ने सड़क निर्माण पर विशेष ध्यान दिया। सोनारगाँव (बंगाल) से पेशावर तक की सड़क, जिसे बाद में ग्रांड ट्रंक रोड कहा गया, उसी की देन थी। इसके अतिरिक्त आगरा से बुरहानपुर, आगरा से चित्तौड़ तथा लाहौर से मुल्तान तक सड़कों का निर्माण कराया गया।
यात्रियों की सुविधा के लिए उसने अनेक सरायों का निर्माण करवाया, जो डाकघर और संचार केंद्र का भी कार्य करती थीं। अधिकांश सराय बाजार क्षेत्रों में बनाई गई थीं। प्रत्येक सराय की देखभाल एक शिकदार करता था। इन सरायों को सूर साम्राज्य की धमनियाँ कहा जाता था क्योंकि वे मजबूत संचार व्यवस्था का कार्य करती थीं।
शेरशाह सूरी के समकालीन प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी थे। शेरशाह के शासनकाल में ही जायसी ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पद्मावत’ की रचना की।
शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इस्लाम शाह गद्दी पर बैठा। इस्लाम शाह के शासनकाल में सूर साम्राज्य कमजोर होने लगा। इसी समय महदी आंदोलन भी चलाया गया, जिसका नेतृत्व शेख अलाई ने किया।
इसके बाद फिरोज शाह, मुहम्मद आदिल शाह, इब्राहिम शाह तथा सिकंदर शाह जैसे शासक हुए। आदिल शाह सूर का सेनापति और वजीर हेमू था। 1556 ई. में पानीपत के द्वितीय युद्ध में मुगलों और हेमू के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें मुगलों की विजय हुई और भारत में पुनः मुगल सत्ता स्थापित हुई।
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