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बिहार के मध्यकालीन क्षेत्रीय राजवंश

  • ग्यारहवीं शताब्दी के अंत तक बिहार में पाल साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो चुका था, जिससे क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने लगी और तुर्कों के सैन्य अभियानों की पृष्ठभूमि तैयार हुई। इसी दौर में बिहार में अनेक क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ, जिन्होंने बिहार के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को नई दिशा दी।

मिथिला के कर्नाट शासक

नान्यदेव

नान्यदेव ने 1097-98 ई. में तिरहुत क्षेत्र में कर्नाट राज्य की स्थापना की। यह राज्य मिथिला या तिरहुत का कर्नाट वंश कहलाया। नान्यदेव एक शक्तिशाली एवं महान शासक थे, जिनका अधिकार मिथिला के साथ नेपाल की तराई तक विस्तृत था। उन्होंने ‘कर्नाटकुल भूषण’ की उपाधि धारण की तथा उनकी राजधानी सिमराऊंगढ़ थी।

गंगदेव

नान्यदेव के पुत्र गंगदेव एक योग्य प्रशासक थे। उन्होंने सिमराँवगढ़ से शासन किया, जो वर्तमान नेपाल की तराई के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित था।

नरसिंहदेव

1187 ई. में नरसिंहदेव गद्दी पर बैठे। उनका संघर्ष बंगाल के सेन शासकों से लगातार चलता रहा। इसी कारण उन्होंने तुर्कों के साथ सहयोग की नीति अपनाई। जब बख्तियार खिलजी ने बिहार में अभियान चलाया, तब नरसिंहदेव ने उन्हें भेंट देकर संतुष्ट किया। उस समय उनका अधिकार तिरहुत और दरभंगा क्षेत्रों तक फैला था।

रामसिंह देव

रामसिंह देव के शासनकाल में तुर्क सेनापति तुगरिल तुगन ने तिरहुत पर आक्रमण किया, लेकिन वह असफल रहा। इस घटना का उल्लेख तिब्बती यात्री धर्मास्वामिन तथा विदेशी यात्री मुल्ला तकिया ने किया है। धर्मास्वामिन 1234 ई. में तिरहुत आए थे।

हरिसिंह देव

हरिसिंह देव (1295-1325 ई.) कर्नाट वंश के अंतिम प्रमुख शासक थे। वे एक महान समाज सुधारक माने जाते हैं। उनके शासनकाल में मिथिला क्षेत्र में ‘पंजी प्रबंध’ प्रणाली का विकास हुआ, जिसमें मैथिल ब्राह्मणों और मैथिल कायस्थों की वंशावलियों का लिखित रिकॉर्ड रखा जाता था।

1324-25 ई. में गयासुद्दीन तुगलक ने बिहार और बंगाल पर अधिकार स्थापित कर लिया तथा सिमराऊंगढ़ पर कब्ज़ा कर बिहार को तुगलक सल्तनत में मिला लिया। बाद में बिहारशरीफ को प्रांतीय राजधानी बनाया गया। 1378 ई. तक कर्नाट वंश का पूर्णतः अंत हो गया।

चेरो राजवंश

चेरो राजवंश का उदय 12वीं शताब्दी में बिहार के शाहाबाद, सारण, चंपारण और मुजफ्फरपुर क्षेत्रों में हुआ। यह एक जनजातीय राजवंश था। चेरो राजा फूलधर को जगदीशपुर मेले की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है। चेरो शासकों ने शेरशाह सूरी को मुगलों के विरुद्ध युद्ध में सहायता भी प्रदान की थी।

उज्जैनिया वंश

उज्जैनिया वंश मालवा के परमार वंश की शाखा मानी जाती है। इस वंश के संस्थापक संतन सिंह (देवराज) थे। इस वंश का शासन भोजपुर, डुमरांव, जगदीशपुर और बक्सर क्षेत्रों तक फैला हुआ था।

इस वंश के प्रमुख शासकों में संग्रामदेव, ओंकारदेव, दुर्लभदेव, राजा राम शाही, राजा नारायणमल तथा बाबू वीर कुंवर सिंह शामिल थे। बाबू कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह के महानायक थे और जगदीशपुर एस्टेट के शासक थे। सासाराम के अफगान जागीरदार हसन खाँ तथा उनके पुत्र शेर खाँ (शेरशाह सूरी) के उज्जैनिया शासकों से अच्छे संबंध थे।

वैनवार (ओइनवार) वंश

14वीं शताब्दी में तिरहुत पर मुसलमानों के अधिकार के बाद वैनवार वंश की स्थापना हुई। इस वंश के प्रमुख शासक महाराजा शिवसिंह थे। उनके दरबार में प्रसिद्ध मैथिल कवि विद्यापति ने ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की।

दरभंगा राजवंश

दरभंगा राजवंश का विस्तार मिथिला क्षेत्र के लगभग 8380 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था और इसका मुख्यालय दरभंगा था। इस राजवंश की स्थापना महेश ठाकुर ने की थी। कहा जाता है कि अकबर उनकी विद्वता से प्रभावित होकर उन्हें मिथिला का राज्य प्रदान किया था।

इस वंश में चन्द्रेश्वर का विशेष महत्व है, जिन्होंने ‘कृत्यरत्नाकर’ नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ से ज्ञात होता है कि 13वीं-14वीं शताब्दी में मिथिला के लोग मुख्यतः शिव तथा विष्णु के उपासक थे।

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