प्राचीन काल में बिहार की शिक्षा व्यवस्था अत्यंत समृद्ध और विकसित थी। नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा ओदंतपुरा जैसे विश्वविद्यालय विश्व प्रसिद्ध शैक्षणिक केंद्र थे, जहाँ धर्म, दर्शन, साहित्य और ज्योतिष आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी। इन केंद्रों में देश-विदेश से छात्र अध्ययन करने आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त की थी।
मध्यकालीन काल में विदेशी आक्रमणों और स्थानीय शासकों के संरक्षण में कमी के कारण शिक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ गई। 12वीं शताब्दी के अंत में बख्तियार खिलजी के आक्रमण में नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय नष्ट हो गए।
औपनिवेशिक काल में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के बाद शिक्षा के क्षेत्र में कुछ प्रयास किए गए, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों की पूर्ति करना था।
ब्रिटिश शासन ने भारत में पाश्चात्य शिक्षा को मुख्यतः अपने प्रशासनिक और औपनिवेशिक हितों की पूर्ति के लिए विकसित किया। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से वे अपने लिए एक शिक्षित कर्मचारी वर्ग तैयार करना चाहते थे। इसके साथ ही पाश्चात्य विचारों और संस्कृति का प्रसार भी उनका उद्देश्य था।
ब्रिटिश सरकार भारत को कच्चे माल के स्रोत और तैयार माल के बाजार के रूप में विकसित करना चाहती थी, इसलिए तकनीकी और औद्योगिक शिक्षा को अधिक महत्व नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप शिक्षा व्यवस्था ऐसी बनाई गई जिससे अंग्रेजी शासन को दीर्घकाल तक मजबूत बनाए रखा जा सके।
1813 ई. के Charter Act 1813 के तहत शिक्षा के लिए प्रति वर्ष 1 लाख रुपये का अनुदान निर्धारित किया गया। राजा राम मोहन राय के प्रयासों से 1817 में कलकत्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना हुई।
1835 ई. में थॉमस बैबिंगटन मैकाले के स्मरण-पत्र के माध्यम से अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया। इसके बाद बिहार में जिला स्कूलों की स्थापना शुरू हुई। पूर्णिया (1835), बिहारशरीफ (1838) और भागलपुर (1840) में जिला स्कूल खोले गए।
मुजफ्फरपुर, हजारीबाग, चाईबासा, देवघर, पटना, आरा और पाकुड़ में भी सरकारी सहायता से उच्च विद्यालय स्थापित किए गए। भागलपुर में सैनिकों के बच्चों की शिक्षा के लिए हिल स्कूल खोला गया।
वुड्स डिस्पैच को भारत में अंग्रेजी शिक्षा का “मैग्नाकार्टा” कहा जाता है। इसके बाद बिहार में कई महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई -
हंटर शिक्षा आयोग ने व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष बल दिया। इस काल में कई कॉलेज स्थापित हुए -
रैले आयोग, के तहत माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की स्थापना तथा त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू किया गया। तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा दिया गया।
इस दौरान -
सैडलर आयोग ने उच्च एवं विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार पर बल दिया। इसके प्रभाव से 1924 में पटना इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना हुई।
हार्टोग समिति ने प्राथमिक शिक्षा और ग्रामीण छात्रों के लिए व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया। केवल योग्य छात्रों को उच्च शिक्षा देने की सिफारिश की गई। 1939 में Patna Women's College की स्थापना हुई।
महात्मा गांधी ने 1937 में वर्धा मूल शिक्षा योजना प्रस्तुत की। इसके अंतर्गत 7 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा मातृभाषा में शिक्षा पर बल दिया गया।
सार्जेंट योजना के अंतर्गत 6 से 11 वर्ष तक निःशुल्क शिक्षा तथा प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विस्तार पर बल दिया गया।
स्वतंत्रता के बाद बिहार में कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई -
पाश्चात्य शिक्षा ने भारत में ब्रिटिश सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। इसका उद्देश्य भारतीयों को मानसिक रूप से अंग्रेजी शासन के अधीन बनाए रखना था। तकनीकी और औद्योगिक शिक्षा की उपेक्षा की गई तथा यूरोपीय इतिहास और साहित्य पर अधिक जोर दिया गया।
इसके कारण भारतीय समाज में सामाजिक विभाजन बढ़ा, शिक्षा महँगी और अंग्रेजी आधारित होने के कारण आम जनता इससे दूर रही। मुस्लिम समाज और स्त्रियों की शिक्षा भी अपेक्षाकृत उपेक्षित रही।
पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से भारतीयों को लोकतंत्र, मानवतावाद और आधुनिक विचारों का ज्ञान प्राप्त हुआ। अंग्रेजी और यूरोपीय साहित्य पढ़ने का अवसर मिलने से वैश्विक विचारधाराओं का प्रसार हुआ।
इस शिक्षा ने एक नए शिक्षित मध्यम वर्ग को जन्म दिया, जिसने पत्रकारिता, प्रेस और सामाजिक सुधार आंदोलनों को आगे बढ़ाया। इसी शिक्षित वर्ग ने भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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