New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 22nd August, 3:00 PM August End Offer UPTO 75% Off, Valid Till : 29th Aug 2025 GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 24th August, 5:30 PM August End Offer UPTO 75% Off, Valid Till : 29th Aug 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 22nd August, 3:00 PM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 24th August, 5:30 PM

सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियां और कॉलेजियम प्रक्रिया

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2: न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य; विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।)

संदर्भ

हाल ही में, भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम (Supreme Court Collegium) की सिफारिश के दो दिन बाद, 27 अगस्त 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आलोक अराधे और पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपुल पंचोली को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया।

सर्वोच्च न्यायालय में हाल की नियुक्तियां

  • केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिश के आधार पर जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल पंचोली को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किया। 
  • यह नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय की कार्यशक्ति को 32 से बढ़ाकर 34 करने की दिशा में एक कदम है, जो इसकी स्वीकृत शक्ति के बराबर है। 
  • हालांकि, जस्टिस पंचोली की नियुक्ति को लेकर जस्टिस नागरत्ना की असहमति ने कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

जस्टिस नागरत्ना की असहमति

कॉलेजियम की एकमात्र महिला सदस्य जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने जस्टिस पंचोली की सिफारिश के खिलाफ एक मजबूत असहमति नोट (Dissent Note) दर्ज किया। उनकी आपत्तियाँ निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित थीं:

  • वर्ष 2023 में स्थानांतरण : जस्टिस पंचोली का गुजरात हाई कोर्ट से पटना हाई कोर्ट में स्थानांतरण सामान्य नहीं था और इसके पीछे न्यायिक अनुचितता की शिकायत थी, हालांकि जाँच में उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया था।
  • वरिष्ठता : जस्टिस पंचोली अखिल भारतीय हाई कोर्ट जजों की वरिष्ठता सूची में 57वें स्थान पर हैं। नागरत्ना ने तर्क दिया कि अधिक वरिष्ठ और योग्य जजों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • क्षेत्रीय असंतुलन : उनकी नियुक्ति से गुजरात हाई कोर्ट का सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिनिधित्व तीन जजों तक पहुंच जाएगा, जबकि कई अन्य हाई कोर्ट जैसे सिक्किम, तेलंगाना और झारखंड का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
  • संस्थागत प्रभाव : नागरत्ना ने चेतावनी दी कि पंचोली की नियुक्ति "न्याय प्रशासन के लिए प्रतिकूल"होगी और कॉलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता को जोखिम में डालेगी।

नागरत्ना ने अपने असहमति नोट को सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रकाशित करने का अनुरोध किया, लेकिन कॉलेजियम ने इसे सार्वजनिक नहीं किया, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठे।

कॉलेजियम प्रक्रिया के बारे में

कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) भारत में उच्च न्यायपालिका (Higher Judiciary) में जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण (Appointments and Transfers) के लिए एक अनूठी व्यवस्था है, जो संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है। यह तीन जजों के मामलों (Three Judges Cases) - 1981, 1993, और 1998 - के माध्यम से विकसित हुई। इस प्रणाली में:

  • सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और चार सबसे वरिष्ठ जज शामिल होते हैं।
  • हाई कोर्ट कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश और दो सबसे वरिष्ठ जज होते हैं, जो सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजते हैं।
  • सरकार केवल सलाह दे सकती है, लेकिन कॉलेजियम की पुन: सिफारिश (Reiterated Recommendation) सरकार पर बाध्यकारी होती है।

निर्णय लेने की प्रक्रिया

  • कॉलेजियम में निर्णय आमतौर पर सर्वसम्मति (Consensus) से लिए जाते हैं, लेकिन असहमति (Dissent) असामान्य नहीं है। 
  • तीसरे जजों के मामले (Third Judges Case, 1998) के अनुसार, यदि दो जज किसी नाम पर मजबूत आपत्ति (Strong Objection) दर्ज करते हैं, तो CJI उस सिफारिश को आगे नहीं बढ़ा सकते। 
    • जस्टिस पंचोली के मामले में, कॉलेजियम ने 4:1 के विभाजन (Split) के साथ निर्णय लिया, जिसमें नागरत्ना की असहमति को नजरअंदाज किया गया। 
  • कॉलेजियम में परामर्शी जजों की राय और वरिष्ठता, योग्यता और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व जैसे मानदंडों पर विचार किया जाता है।

निष्कर्ष

  • सर्वोच्च न्यायालय में हाल की नियुक्तियां और जस्टिस नागरत्ना की असहमति कॉलेजियम प्रणाली की ताकत और कमजोरियों को उजागर करती हैं। 
  • यह प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है, लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के कारण आलोचना का सामना करती है। 
  • कॉलेजियम प्रणाली को और अधिक समावेशी और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है, ताकि यह न केवल योग्यता और वरिष्ठता को प्राथमिकता दे, बल्कि क्षेत्रीय और लैंगिक विविधताको भी बढ़ावा दे। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में निष्पक्षता और जनता का विश्वास सर्वोपरि है।
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X