New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 10th Aug 2026, 3:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 18th Aug 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 10th Aug 2026, 3:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 18th Aug 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 8:00 AM

जातिगत अपराधों में अग्रिम जमानत पर रोक

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान व निकाय)

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत अग्रिम ज़मानत संबंधी कानून को स्पष्ट किया है। यह कानून जाति-आधारित अपराधों से हाशिए पर स्थित समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है।

हालिया वाद 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें जातिगत अपराधों के एक आरोपी को अग्रिम ज़मानत दी गई थी। 
  • किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 प्रथम दृष्टया अपराधों के लिए अग्रिम ज़मानत पर एक विशिष्ट प्रतिबंध लगाती है। 
    • यह मामला चुनावी विवाद से जुड़े जाति-आधारित हमले, गाली-गलौज एवं धमकी से संबंधित है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय 

  • सामान्यत: पीड़ितों की सुरक्षा एवं रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए एस.सी./एस.टी. अधिनियम के तहत अग्रिम ज़मानत पर पर रोक है।
  • अदालतें असाधारण मामलों में अग्रिम ज़मानत दे सकती हैं, जहाँ:
    • आरोप प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण या प्रेरित प्रतीत होते हैं। 
    • शिकायत में विशिष्ट तथ्यात्मक आधार का अभाव है।
  • इस फैसले का उद्देश्य एस.सी./एस.टी. पीड़ितों की सुरक्षा और दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन स्थापित करना है।

निर्णय के निहितार्थ 

  • सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इस बात पर ज़ोर देता है कि एस.सी./एस.टी. अधिनियम एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है बल्कि कमज़ोर समुदायों की गरिमा और सुरक्षा की रक्षा के लिए एक ठोस कवच है।
  • अग्रिम ज़मानत पर प्रतिबंध सख्त होने के बावजूद यह संवैधानिक रूप से सही है क्योंकि यह दलित व आदिवासी शिकायतकर्ताओं के ख़िलाफ़ धमकी और प्रतिशोध के वास्तविक ख़तरे को दूर करता है।
  • अदालतों को धारा 18 के विधायी उद्देश्य का सम्मान करना चाहिए और बिना सुनवाई के आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करके उसकी शक्ति को कमज़ोर करने से बचना चाहिए। 
  • साक्ष्य विश्लेषण में उलझे बिना प्राथमिकी के आधार पर ही ‘प्रथम दृष्टया परीक्षण’ लागू करना चाहिए। 
  • यह फैसला एस.सी./एस.टी. अधिनियम के तहत जवाबदेही को मज़बूत करता है और इस बात पर ज़ोर देता है कि क़ानून का शासन सबसे हाशिए पर स्थित लोगों की सुरक्षा के पक्ष में मज़बूती से खड़ा होना चाहिए।

एस.सी./एस.टी. अधिनियम के तहत अग्रिम ज़मानत पर रोक का कारण 

  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18, अग्रिम ज़मानत की अनुमति से संबंधित दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code: CrPC) की धारा 438 (वर्तमान में BNSS की धारा 482) के प्रयोग को स्पष्ट रूप से बाहर करती है। 
  • संसद ने पीड़ितों को धमकी से बचाने और प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने के लिए यह रोक लगाई है।

संबंधित वाद 

  • मध्य प्रदेश राज्य बनाम राम कृष्ण बलोठिया (1995), विलास पांडुरंग पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2012) और पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020) जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए न्यायालय ने दोहराया कि इस अधिनियम के तहत अपराध एक अलग वर्ग का हैं जो प्रणालीगत अस्पृश्यता व जातिगत भेदभाव से जुड़ा है। 
  • यह रोक संवैधानिक रूप से मान्य है और संविधान के अनुच्छेद 14 या 21 का उल्लंघन नहीं करती है। 
  • पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालतें ज़मानत के चरण में ‘मिनी-ट्रायल’ नहीं कर सकती हैं और उन्हें केवल यह जाँचना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

एस.सी./एस.टी. अधिनियम, 1989 के बारे में

  • एस.सी./एस.टी. समुदायों के विरुद्ध अत्याचारों को रोकने के लिए अधिनियमित
  • विशेष अदालतों, कठोर दंड एवं त्वरित सुनवाई का प्रावधान 
  •  वर्ष 2018 में अदालतों द्वारा अग्रिम ज़मानत पर प्रतिबंध लगाने वाले प्रावधानों को बहाल किया गया।

आगे की राह

  • वास्तविक मामलों में न्याय सुनिश्चित करने के लिए कार्यान्वयन तंत्र को मज़बूत करना
  • झूठे मामलों के माध्यम से उत्पीड़न से बचते हुए निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार सुनिश्चित करना
  • जाति-आधारित हिंसा को कम करने के लिए जागरूकता एवं संवेदनशीलता की आवश्यकता
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR