जैव विविधता का संरक्षण : अवधारणा, दृष्टिकोण और चुनौतियाँ
जैव विविधता संरक्षण का अर्थ एवं महत्व (Meaning and Importance of Biodiversity Conservation)
जैव विविधता का संरक्षण उस प्रक्रिया को दर्शाता है जिसके अंतर्गत पृथ्वी पर उपलब्ध जीवों, उनकी प्रजातीय एवं आनुवंशिक विविधता तथा पारिस्थितिकी तंत्रों को सुरक्षित रखा जाता है।
यह संरक्षण आवश्यक पारिस्थितिक विविधता को बनाए रखने, खाद्य श्रृंखलाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने तथा पारिस्थितिकी तंत्रों की स्थिरता और लचीलापन बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जैव विविधता संरक्षण के बिना न तो सतत विकास संभव है और न ही मानव जीवन की दीर्घकालिक सुरक्षा।
जैव विविधता संरक्षण के प्रमुख दृष्टिकोण (Major Approaches to Biodiversity Conservation)
इन-सीटू संरक्षण (In-situ Conservation)
इन-सीटू संरक्षण वह विधि है जिसमें पौधों और जानवरों को उनके प्राकृतिक आवासों में ही संरक्षित किया जाता है।
यह संरक्षण का सबसे प्रभावी और प्राकृतिक तरीका माना जाता है, क्योंकि इसमें प्रजातियाँ अपने पारिस्थितिक परिवेश के साथ विकसित होती रहती हैं और प्राकृतिक विकासक्रम बना रहता है।
इन-सीटू संरक्षण के अंतर्गत स्थापित प्रमुख प्राकृतिक आवासों में राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व, आरक्षित वन तथा संरक्षित वन शामिल हैं।
यह दृष्टिकोण न केवल प्रजातियों की रक्षा करता है, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने में भी सहायक होता है।
एक्स-सीटू संरक्षण (Ex-situ Conservation)
एक्स-सीटू संरक्षण में जैव विविधता को उन स्थानों से बाहर संरक्षित किया जाता है, जहाँ वे प्रजातियाँ प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं।
यह विधि विशेष रूप से उन प्रजातियों के लिए उपयोगी होती है, जो विलुप्ति के कगार पर होती हैं या जिनका प्राकृतिक आवास अत्यधिक नष्ट हो चुका होता है।
इस संरक्षण पद्धति के अंतर्गत प्राणि उद्यान, वनस्पति उद्यान, बीज बैंक, जीन बैंक और ऊतक संवर्धन प्रयोगशालाएँ शामिल हैं, जहाँ पशुओं को नियंत्रित परिस्थितियों में पाला जाता है तथा पौधों की खेती या उनके बीजों का संरक्षण किया जाता है।
जैव विविधता संरक्षण में प्रमुख बाधाएँ (Major Challenges in Biodiversity Conservation)
संरक्षण को निम्न प्राथमिकता
अक्सर विकास योजनाओं और आर्थिक लक्ष्यों के सामने सजीव प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को कम प्राथमिकता दी जाती है।
इससे संरक्षण प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं और दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान होता है।
मौद्रिक शोषण (Commercial Exploitation)
वित्तीय लाभ के लिए वनों, वन्यजीवों और अन्य जैविक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जाता है।
यह शोषण संरक्षण उद्देश्यों को दरकिनार कर देता है और जैव विविधता ह्रास को बढ़ावा देता है।
ज्ञान एवं सूचना का अभाव (Knowledge Gap)
अनेक प्रजातियों और पारिस्थितिकी प्रणालियों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी का अभाव प्रभावी संरक्षण योजना और नीति निर्माण में एक बड़ी बाधा है। बिना पर्याप्त डेटा के संरक्षण रणनीतियाँ अक्सर अप्रभावी सिद्ध होती हैं।
विकास का दबाव (Developmental Pressure)
अनियोजित शहरीकरण, अवसंरचित औद्योगीकरण, अवसंरचना विस्तार और खनन गतिविधियाँ प्राकृतिक आवासों को नष्ट करती हैं।
यह विकास दबाव जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।