New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 15th March 2026 GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 15th March 2026

चमेगैस्ट्रोडिया रीएकेंसिस

(प्रारंभिक परीक्षा : पर्यावरण एवं परिस्थितकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ  

जुलाई 2025 में मिजोरम विश्वविद्यालय एवं मणिपुर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मिजोरम के रीएक जंगल में एक नई व दुर्लभ ऑर्किड प्रजाति ‘चमेगैस्ट्रोडिया रीएकेंसिस (Chamaegastrodia reiekensis)’ की खोज की। यह खोज न केवल वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है बल्कि यह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की समृद्ध जैव-विविधता को भी उजागर करती है। 

नई प्रजाति के बारे में 

  • परिचय : यह चमेगैस्ट्रोडिया जीनस से संबंधित एक होलोमायकोट्रॉफिक ऑर्किड है, जिसका अर्थ है कि इसमें क्लोरोफिल एवं पत्तियों की कमी होती है। 
    • यह  अपनी पूरी पोषण आवश्यकताओं के लिए भूमिगत कवक (फंगी) पर निर्भर रहता है। इसकी यह विशेषता इसे अन्य ऑर्किड प्रजातियों से अलग करती है। 
    • यह प्रजाति छोटे आकार एवं छद्म रंग (क्रिप्टिक रंग) के कारण आसानी से दिखाई नहीं देती है, जिससे इसकी खोज व अध्ययन में चुनौतियाँ आती हैं।
  • नामकरण एवं भौगोलिक महत्व : इस प्रजाति का नाम मिजोरम के रीएक क्षेत्र के नाम पर रखा गया है, जो एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता है। 
  • जीनस : यह मिजोरम में चमेगैस्ट्रोडिया जीनस की पहली दर्ज प्रजाति है। वैश्विक स्तर पर इस जीनस की अब तक सात प्रजातियाँ ज्ञात थी और इस खोज के बाद इनकी संख्या आठ हो गई है। 
  • आवास : यह ऑर्किड 1,500 मीटर की ऊँचाई पर नम एवं ह्यूमस युक्त मृदा में, विशेष रूप से बांस के पास पाया जाता है।
  • पुष्पन एवं फलन : यह प्रजाति अगस्त से सितंबर तक पुष्पित होती है और अक्तूबर तक फल देती है।
  • पारिस्थितिक भूमिका : यह ऑर्किड कवक के साथ सहजीवी संबंध (म्यूचुअलिज्म) पर निर्भर है जो इसे पोषण प्रदान करता है। यह संबंध पारिस्थितिकी तंत्र की जटिलता एवं संतुलन को दर्शाता है।
  • संरक्षण स्थिति एवं चुनौतियाँ : अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के मानकों के अनुसार अतिसंकट ग्रस्त (CR) की श्रेणी में रखा गया है। 

संरक्षण की प्रमुख चुनौतियाँ 

  • सीमित उपस्थिति : इसका ऊपरी हिस्सा (जमीन के ऊपर) कुछ समय के लिए ही दिखाई देता है, जिससे इसका पता लगाना मुश्किल होता है।
  • कवक पर निर्भरता : इसकी जीविका भूमिगत कवक पर निर्भर है, जिसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है।
  • छद्म रंग : अपने रंग एवं छोटे आकार के कारण यह प्राकृतिक वातावरण में छिप जाता है जिससे अध्ययन व संरक्षण में कठिनाई होती है।
  • आवास क्षति : रीएक जंगल जैसे जैव-विविधता हॉटस्पॉट पर मानवीय गतिविधियों एवं जलवायु परिवर्तन का खतरा बना हुआ है।

संरक्षण के लिए सुझाव

  • आवास संरक्षण : रीएक जंगल जैसे क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करना और मानवीय हस्तक्षेप को कम करना
  • अनुसंधान एवं निगरानी : इस प्रजाति के आवास और कवक सहजीवी संबंधों पर गहन अध्ययन
  • जागरूकता अभियान : स्थानीय समुदायों को जैव-विविधता संरक्षण के लिए जागरूक करना
  • नीतिगत उपाय : IUCN दिशानिर्देशों के आधार पर संरक्षण योजनाओं को लागू करना
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X