संदर्भ
हाल ही में कोयला गैसीकरण को बढ़ावा देने के लिए, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 37,500 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज को मंजूरी दी है।
कोयला गैसीकरण क्या है ?
- कोयला गैसीकरण एक ऐसी तकनीकी प्रक्रिया है जिसके तहत कोयले को रासायनिक रूप से सिंथेटिक गैस या सिनगैस (Syngas) में बदला जाता है। इस सिनगैस का इस्तेमाल औद्योगिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण उत्पादों को तैयार करने में किया जाता है, जैसे कि:
- यूरिया और अमोनियम नाइट्रेट (उर्वरक)
- मेथनॉल और डाइमिथाइल ईथर
- सिंथेटिक प्राकृतिक गैस (SNG)
- हाइड्रोजन
- सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत के पास कोयले (लगभग 401 अरब टन) और लिग्नाइट (लगभग 47 अरब टन) का एक विशाल भंडार मौजूद है। कोयला गैसीकरण का मुख्य उद्देश्य इन घरेलू संसाधनों का पर्यावरण के अनुकूल और सतत (Sustainable) तरीके से अधिकतम उपयोग करना है।
- वर्तमान में भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशों पर काफी निर्भर है। कोयला मंत्रालय के अनुसार, देश को अपनी आवश्यकता का लगभग 20% यूरिया, लगभग शत-प्रतिशत अमोनिया और करीब 80 से 90% मेथनॉल बाहर से आयात करना पड़ता है। इस तकनीक से घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से विदेशों पर निर्भरता घटेगी।
- केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक 10 करोड़ (100 मिलियन) टन कोयले के गैसीकरण का एक बड़ा लक्ष्य तय किया है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हाल ही में एक नई योजना को मंजूरी दी गई है, जिसके तहत सरकार लगभग 7 करोड़ टन कोयले और लिग्नाइट के गैसीकरण प्रोजेक्ट्स को वित्तीय व नीतिगत सहायता प्रदान करेगी।
भारत में कोयला गैसीकरण की वर्तमान स्थिति
- भारत में कोयला गैसीकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में कई वित्तीय प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं।
- वर्ष 2026 में घोषित ₹37,500 करोड़ के नए पैकेज से पहले जनवरी 2024 में ₹8,500 करोड़ की एक योजना को मंजूरी दी गई थी।
- इस योजना के तहत हजारों करोड़ रुपये विभिन्न सरकारी और निजी क्षेत्र की परियोजनाओं को आवंटित किए जा चुके हैं। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और उनके संयुक्त उपक्रमों के साथ-साथ निजी उद्योग समूहों द्वारा संचालित परियोजनाएं भी शामिल हैं।
- देश की प्रमुख परियोजनाओं में ओडिशा के तालचर में स्थापित किए जा रहे कोयला-आधारित अमोनिया-यूरिया संयंत्र को विशेष महत्व दिया जा रहा है, जिसके आगामी वर्षों में उत्पादन शुरू करने की संभावना है।
- इसके अतिरिक्त, कोयले से सिंथेटिक गैस, अमोनियम नाइट्रेट, हाइड्रोजन, एथेनॉल तथा प्रत्यक्ष अपचयित लौह (Direct Reduced Iron) जैसे उत्पादों के निर्माण से जुड़ी कई परियोजनाएं भी विकास के विभिन्न चरणों में हैं।
तकनीकी चुनौतियां और स्वदेशी समाधान
- भारत में कोयला गैसीकरण के विस्तार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय कोयले की विशेष प्रकृति है। इसमें राख (Ash) की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है तथा इसकी ऊष्मीय गुणवत्ता और खनिज संरचना में भी विविधता पाई जाती है। ये विशेषताएं गैसीकरण प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं और पारंपरिक तकनीकों की प्रभावशीलता को सीमित कर सकती हैं।
- इन्हीं कारणों से भारतीय परिस्थितियों के लिए फ्लूइडाइज्ड बेड गैसीकरण तकनीक को अधिक उपयुक्त माना जाता है। वस्तुतः यह तकनीक कोयले और राख के पृथक्करण को अधिक प्रभावी बनाते हुए गैसीकरण प्रक्रिया को बेहतर ढंग से संचालित करने में सक्षम है।
- भारतीय कोयले की विशिष्टताओं के कारण यहाँ प्रयुक्त तकनीकी समाधान चीन, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इस्तेमाल होने वाली प्रणालियों से अलग हो सकते हैं।
स्वदेशीकरण और लागत में कमी
- कोयला गैसीकरण परियोजनाएं अत्यधिक पूंजी-प्रधान होती हैं और इन्हें स्थापित करने में लंबा समय तथा बड़ा निवेश आवश्यक होता है। विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि कुल उत्पादन लागत में पूंजीगत व्यय का हिस्सा काफी महत्वपूर्ण होता है। इसलिए परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करना इस क्षेत्र की सफलता के लिए आवश्यक है।
- इसी संदर्भ में स्वदेशी तकनीक और उपकरणों का विकास महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने उच्च राख वाले कोयले के लिए विशेष गैसीफायर तकनीक विकसित करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।
- वहीं कुछ निजी कंपनियाँ अपने संयंत्रों और उपकरणों का बड़ा हिस्सा देश में ही निर्मित करने में सफल रही हैं। उद्योग जगत का मानना है कि स्वदेशीकरण से परियोजनाओं की लागत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और विदेशी निर्भरता भी घटेगी।
आगे की राह
- यद्यपि भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, फिर भी कोयला गैसीकरण तकनीक अभी विकासशील अवस्था में है। कई उन्नत उपकरणों और प्रक्रियाओं के लिए विदेशी तकनीकी सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है। उद्योग प्रतिनिधियों ने सरकार से कुछ महत्वपूर्ण तकनीकों के आयात को सरल बनाने की मांग की है ताकि परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाई जा सके।
- सरकार ने संकेत दिया है कि वह आवश्यक तकनीकी सहयोग प्राप्त करने में उद्योगों की सहायता करेगी, हालांकि सुरक्षा और नियामकीय मानकों से संबंधित प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य रहेगा। इस प्रकार भारत कोयला गैसीकरण के क्षेत्र में घरेलू क्षमता निर्माण और वैश्विक तकनीकी सहयोग के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।