New
Civil Services Day Offer - Valid Till : 28th April GS Foundation (P+M) - Delhi : 4th May 2026, 6:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 1st May 2026, 8:30PM Civil Services Day Offer - Valid Till : 28th April GS Foundation (P+M) - Delhi : 4th May 2026, 6:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 1st May 2026, 8:30PM

जैविक नियंत्रण तकनीक द्वारा फसल संरक्षण

(प्रारंभिक परीक्षा: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-3: बायो-टैक्नोलॉजी; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग)

संदर्भ

दक्षिण भारत में एक समय टैपिओका (कसावा) फसल लगभग नष्ट हो चुकी थी, लेकिन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों द्वारा अपनाई गई जैविक नियंत्रण तकनीक ने इसे पुनः जीवित कर दिया। दो वर्ष पहले छोड़े गए परजीवी ततैया ने इस संकटग्रस्त फसल को कीटों से मुक्त कर फिर से किसानों की आय बहाल की है।

टैपियोका (Tapioca) फसल के बारे में

  • टैपियोका, जिसे ‘कसावा’ या ‘साबूदाना’ भी कहा जाता है, एक कंदमूल वाली फसल है, जो भारत में लगभग 1.73 लाख हेक्टेयर पर उगाई जाती है। 
  • तमिलनाडु और केरल मिलकर देश के 90% से अधिक टैपियोका उत्पादन में योगदान देते हैं। 
  • भारत में इसकी पैदावार वैश्विक औसत (10.76 टन प्रति हेक्टेयर) से कहीं अधिक, 35 टन प्रति हेक्टेयर है। 
  • टैपियोका न केवल खाद्य स्रोत है, बल्कि इससे स्टार्च, सागो और अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद बनाए जाते हैं, जिनका भारत सालाना लगभग 20 करोड़ रुपये का निर्यात करता है। 
  • यह छोटे किसानों के लिए महत्वपूर्ण नकदी फसल एवं आजीविका का आधार है।

जैविक नियंत्रण से तात्पर्य

  • जैविक नियंत्रण, कीटों, खरपतवारों या बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए प्राकृतिक शिकारियों, परजीवियों या रोगजनकों जैसे अन्य जीवों का उपयोग करने की एक विधि है।
  • यह पारंपरिक रासायनिक कीटनाशकों का एक लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है। 
  • इसमें जैविक उत्पादों का उपयोग शामिल है जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बहुत कम या कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालते हैं।

जैविक नियंत्रण द्वारा फसल संरक्षण प्रयोग

  • माइलबग का प्रकोप: वर्ष 2020 में शुरू हुआ, जिसने 1.43 लाख हेक्टेयर टैपियोका फसलों को प्रभावित किया और पैदावार को 70% तक कम कर दिया।
  • जैविक नियंत्रण: ICAR-NBAIR ने रासायनिक कीटनाशकों के बजाय जैविक नियंत्रण अपनाया, जिसमें परजीवी ततैया ‘अनाग्यरस लोपेज़ी’ (Anagyrus lopezi) को छोड़ा गया।
  • पहल की शुरुआत: मार्च 2022 में सलेम के येथापुर में 300 किसानों के साथ पहला क्षेत्रीय रिलीज शुरू हुआ, जिसके बाद तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में 500 से अधिक खेतों में रिलीज किया गया।
  • परिणाम: वर्ष 2023-24 तक, प्रभावित जिलों में पैदावार 35 टन प्रति हेक्टेयर तक बहाल हुई, और माइलबग प्राकृतिक रूप से नियंत्रित हो गया।
  • प्रचार-प्रसार: NBAIR ने 2 लाख से अधिक ततैयों का वितरण किया, 3 उपग्रह उत्पादन केंद्र स्थापित किए, और 25 जागरूकता कार्यक्रमों के साथ प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए।

परजीवी ततैया के बारे में

अनाग्यरुस लोपेज़ी (Anagyrus lopezi) एक छोटी परजीवी ततैया है, जो विशेष रूप से कसावा माइलबग को लक्षित करती है। यह ततैया माइलबग के शरीर में अपने अंडे देती है, और इसके लार्वा कीट को अंदर से नष्ट कर देते हैं, जिससे माइलबग की आबादी प्राकृतिक रूप से कम होती है। इसकी विशेषताएं हैं:

  • मूल क्षेत्र: यह दक्षिण अमेरिका की मूल प्रजाति है, जहां माइलबग भी उत्पन्न हुआ था। इसे पश्चिम अफ्रीका के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर (IITA), बेनिन से आयात किया गया।
  • जैव-सुरक्षा: NBAIR ने अध्ययनों के बाद पुष्टि की कि यह ततैया केवल माइलबग को नुकसान पहुंचाती है, अन्य फसलों या लाभकारी कीटों को नहीं।
  • प्राकृतिक प्रसार: रिलीज के बाद, ततैया स्वाभाविक रूप से 30-40 किमी तक फैल गई, जिसने माइलबग को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया।
  • लाभ: पर्यावरण-अनुकूल, लागत-प्रभावी और छोटे किसानों के लिए सुलभ समाधान।

निष्कर्ष

अनाग्यरस लोपेज़ी परजीवी ततैया के उपयोग ने दक्षिण भारत की टैपियोका फसलों को माइलबग के प्रकोप से बचाया, जिससे किसानों की आजीविका और पर्यावरण दोनों की रक्षा हुई। यह जैविक नियंत्रण की शक्ति को दर्शाता है और रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक मॉडल प्रस्तुत करता है। दीर्घकालिक सफलता के लिए, जागरूकता, अनुसंधान और नीतिगत समर्थन को बढ़ावा देना होगा ताकि भारत की कृषि टिकाऊ और समृद्ध बनी रहे।

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR