दुनिया आज ऐसी तकनीकी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहाँ मशीनें केवल निर्देशों का पालन नहीं करतीं, बल्कि अपने आसपास के वातावरण को महसूस (सेंस), विश्लेषित (प्रोसेस) और उसके अनुसार प्रतिक्रिया (रिस्पॉन्ड) भी कर सकती हैं। भौतिक दुनिया और डिजिटल तकनीक के इस संगम से साइबर-फिजिकल सिस्टम (सीपीएस) की एक नई पीढ़ी विकसित हो रही है। सेंसर, सॉफ्टवेयर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संचार नेटवर्क के माध्यम से सीपीएस कंप्यूटिंग को भौतिक प्रक्रियाओं से जोड़ता है।
ड्राइवरलेस कार, स्मार्ट फैक्ट्री, रिमोट हेल्थ मॉनिटरिंग, स्मार्ट बिल्डिंग, कृषि में आईओटी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) और स्वायत्त रोबोट इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस प्रकार सीपीएस कंप्यूटेशन, कम्युनिकेशन और फिजिकल प्रोसेस को एकीकृत करके बुद्धिमान, कनेक्टेड और त्वरित प्रतिक्रिया देने वाली प्रणालियों का निर्माण करता है।
भारत के लिए सीपीएस का रणनीतिक महत्व
आज स्वास्थ्य, कृषि, खनन, ऊर्जा, परिवहन, संचार और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्र तेजी से डिजिटल हो रहे हैं। ऐसे में सीपीएस केवल तकनीकी नवाचार का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण आधार बन गया है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए सीपीएस ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाने, कृषि उत्पादकता सुधारने, खनन क्षेत्र को सुरक्षित बनाने, बेहतर परिवहन व्यवस्था विकसित करने और महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना को साइबर खतरों से सुरक्षित रखने में उपयोगी हो सकता है।
इसी महत्व को देखते हुए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स पर राष्ट्रीय मिशन (एनएम-आईसीपीएस) लागू किया जा रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2018 में इस मिशन को मंजूरी दी थी और नौ वर्षों के लिए ₹3,660 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया था। इसका उद्देश्य सीपीएस के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार, कौशल, उद्यमिता और व्यावसायीकरण के लिए राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
राष्ट्रीय मिशन से टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब तक
एनएम-आईसीपीएस की विशेषता यह है कि यह केवल प्रयोगशाला आधारित अनुसंधान तक सीमित नहीं है। यह अकादमिक संस्थानों, उद्योग, सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को एक साझा मंच पर लाकर अनुसंधान को वास्तविक जीवन की समस्याओं से जोड़ता है।
इसके अंतर्गत 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब (टीआईएच) स्थापित किए गए हैं। ये हब चार प्रमुख क्षेत्रों पर कार्य करते हैं - तकनीकी विकास, मानव संसाधन एवं कौशल विकास, नवाचार एवं स्टार्टअप विकास तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग।
इन हब का उद्देश्य अनुसंधान को उपयोगी उत्पादों और सेवाओं में बदलना है। वे तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित करने, स्टार्टअप को इनक्यूबेट करने तथा सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर राष्ट्रीय चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वर्ष 2025 में चार प्रमुख टीआईएच को टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशन रिसर्च पार्क (टीटीआरपी) के रूप में विकसित किया गया। आईआईटी कानपुर में साइबर सुरक्षा, आईआईएससी बेंगलुरु में रोबोटिक्स एवं एआई, आईआईटी-आईएसएम धनबाद में खनन तकनीक तथा आईआईटी इंदौर में डिजिटल हेल्थकेयर पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इससे शोध को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुँचाने की प्रक्रिया तेज हो रही है।
टेक्नोलॉजी, प्रतिभा और उद्यमिता का विकास
एनएम-आईसीपीएस के अंतर्गत अगस्त 2026 तक 1,146 तकनीकों को सक्षम बनाया गया और 1,329 तकनीकी उत्पादों के विकास में योगदान दिया गया। कृषि, स्वास्थ्य, खनन, साइबर सुरक्षा, एडवांस्ड कम्युनिकेशन और पोजिशनिंग जैसे क्षेत्रों में इन तकनीकों का उपयोग हो रहा है।
किसी भी तकनीकी क्रांति के लिए मानव संसाधन सबसे महत्वपूर्ण है। इस दिशा में मिशन ने 5,824 फेलोशिप प्रदान की हैं और 2.46 लाख से अधिक पेशेवरों को कौशल विकास प्रशिक्षण दिया है। साथ ही, 1,136 स्टार्टअप और स्पिन-ऑफ को इनक्यूबेट किया गया, जिससे 24,000 से अधिक रोजगार सृजित हुए। लगभग 200 अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारत की वैश्विक तकनीकी भागीदारी को मजबूत कर रहे हैं।
भारतजेन: भारतीय संदर्भ की एआई बुद्धिमत्ता
सीपीएस की अगली पीढ़ी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। इसी दिशा में एनएम-आईसीपीएस समर्थित भारतजेन भारतीय भाषाओं और सामाजिक संदर्भों के अनुरूप स्वदेशी एआई क्षमताओं को विकसित कर रहा है।
आईआईटी बॉम्बे के नेतृत्व में विकसित भारतजेन में टेक्स्ट, स्पीच और विजन-लैंग्वेज तकनीकों पर काम किया जा रहा है। इसका परम-2 फाउंडेशन मॉडल 17 अरब पैरामीटर वाला मॉडल है और 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं को समर्थन देता है।
श्रुतम और सूक्तम जैसे मॉडल क्रमशः स्पीच-टू-टेक्स्ट तथा टेक्स्ट-टू-स्पीच क्षमताएँ प्रदान करते हैं। आयुर्वेद, कृषि और कानूनी क्षेत्र के लिए विकसित आयुर परम, कृषि परम और कानूनी परम जैसे डोमेन-विशिष्ट मॉडल यह दर्शाते हैं कि भारत एआई को अपनी भाषाई और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
वास्तविक जीवन में सीपीएस के अनुप्रयोग
सीपीएस का प्रभाव केवल तकनीकी प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में आईआईटी इंदौर का चरकडीटी मानव शरीर का डिजिटल ट्विन बनाकर फेफड़ों, आँखों और हृदय जैसी प्रणालियों का सिमुलेशन करता है। इससे बीमारी की प्रगति समझने और उपचार के विकल्पों का वर्चुअल परीक्षण करने में सहायता मिल सकती है।
कृषि में एग्री-आईओटी फार्म मैनेजमेंट सिस्टम मिट्टी, मौसम और माइक्रो-क्लाइमेट की निगरानी करके पानी और उर्वरक के बेहतर उपयोग में मदद करता है।
खनन क्षेत्र में ड्रोन, रोबोटिक्स और रिमोट मॉनिटरिंग तकनीक खतरनाक क्षेत्रों में मानव जोखिम को कम कर रही हैं। वहीं 5जी-एडवांस्ड ओआरएएन तकनीक दूरदराज क्षेत्रों में तेज और किफायती कनेक्टिविटी को बढ़ावा दे सकती है।
साइबर सुरक्षा में आईटी-ओटी सिक्योरिटी ऑपरेशंस सेंटर महत्वपूर्ण डिजिटल एवं भौतिक अवसंरचना की निगरानी करता है। मोबिलिटी क्षेत्र में स्वायत्त वाहनों की टेस्टिंग और दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान जैसी तकनीकें सुरक्षित परिवहन व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
चुनौतियाँ और आगे की राह
सीपीएस के विस्तार के साथ कई चुनौतियाँ भी सामने हैं। इनमें डेटा सुरक्षा, साइबर हमले, गोपनीयता, तकनीकी मानकीकरण, उच्च लागत, कुशल मानव संसाधन की कमी और डिजिटल विभाजन प्रमुख हैं। स्वायत्त प्रणालियों के संदर्भ में जवाबदेही और नैतिकता भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
भारत को इन चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढाँचे, स्पष्ट नियामक व्यवस्था, उद्योग-अकादमिक साझेदारी और अनुसंधान में निरंतर निवेश की आवश्यकता है। साथ ही, स्वदेशी हार्डवेयर, सेंसर और एआई मॉडल के विकास पर जोर देकर आयात निर्भरता कम करनी होगी।
निष्कर्ष
साइबर-फिजिकल सिस्टम भारत के तकनीकी और आर्थिक भविष्य को बदलने की क्षमता रखते हैं। एनएम-आईसीपीएस ने अनुसंधान, कौशल, स्टार्टअप, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को एकीकृत करके इस दिशा में मजबूत संस्थागत आधार तैयार किया है।
भारतजेन जैसी पहल देश को बहुभाषी और संप्रभु एआई की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं, जबकि स्वास्थ्य, कृषि, खनन, संचार, साइबर सुरक्षा और मोबिलिटी में सीपीएस के अनुप्रयोग शोध को वास्तविक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव में बदल रहे हैं।
अतः सीपीएस केवल मशीनों को स्मार्ट बनाने की तकनीक नहीं है, बल्कि यह स्मार्ट अवसंरचना, बेहतर सार्वजनिक सेवाओं, नए रोजगार और आत्मनिर्भर तकनीकी क्षमता का आधार बन सकता है। यदि भारत नवाचार, कौशल और सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना को एक साथ आगे बढ़ाता है, तो साइबर-फिजिकल सिस्टम तकनीक-आधारित, नवाचार-प्रेरित और आत्मनिर्भर विकसित भारत के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।