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मध्य प्रदेश में बाघों की मृत्यु और पोस्टमॉर्टम प्रक्रिया

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी संरक्षण)

संदर्भ

भारत के ‘टाइगर स्टेट’ के रूप में विख्यात मध्य प्रदेश हाल के वर्षों में बाघों की मौत के बढ़ते मामलों के कारण चर्चा में रहा है। हाल ही में, बालाघाट जिले के लालबर्रा रेंज में एक बाघ के शव को जलाने के प्रयास में एक वन रक्षक, एक रेंज सहायक एवं छह अन्य वन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया।

मध्य प्रदेश में हालिया मुद्दा

  • मध्य प्रदेश में बाघों की मृत्यु की बढ़ती घटनाएँ चिंता का विषय हैं। वर्ष 2024 में राज्य में 46 बाघों की मौत दर्ज की गई, जो प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद से सर्वाधिक है। 
  • बालाघाट जिले में बाघ के शव को जलाने की घटना ने प्रशासन की जवाबदेही एवं पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। 
  • इस घटना में वन कर्मचारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किए बिना शव को नष्ट करने की कोशिश की, जो NTCA के दिशानिर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।

बाघ पोस्टमॉर्टम के लिए दिशानिर्देश

  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने बाघों के शवों की फोरेंसिक जाँच के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है। 
  • ये दिशानिर्देश सुनिश्चित करते हैं कि मौत के कारणों की जाँच पारदर्शी एवं वैज्ञानिक तरीके से हो।

बाघ के शव की खोज की रिपोर्ट करने की आवश्यकता 

  • यह फोरेंसिक जाँच को संभव बनाता है जिससे मृत्यु का कारण (प्राकृतिक, शिकार, या बीमारी) निर्धारित होता है।
  • बीमारी के प्रकोप को रोकने के लिए यह जाँच महत्वपूर्ण है, जैसे कि संक्रामक रोगों का प्रसार।
  • क्षेत्रीय विवादों के कारण मौत की जाँच से बाघों की आबादी के संरक्षण में मदद मिलती है।

जाँच प्रक्रिया

  • जिम्मेदारी: क्षेत्रीय वन अधिकारी, रेंज अधिकारी और सहायक वन संरक्षक की मुख्य जिम्मेदारी होती है।
  • तत्काल सूचना: क्षेत्रीय कर्मचारियों को तुरंत फील्ड डायरेक्टर को सूचित करना होता है और जाँच दल को बुलाना होता है।
  • स्वतंत्र गवाह: जब्ती या गिरफ्तारी के मामले में कम-से-कम दो स्वतंत्र गवाहों को शामिल किया जाता है।
  • स्थल प्रबंधन: घटनास्थल को टेप या रस्सी से घेरा जाता है। क्षेत्र की तस्वीरें और वीडियो विभिन्न कोणों से लिए जाते हैं।
  • साक्ष्य संग्रह: क्षेत्र को ग्रिड में बाँटकर साक्ष्य, जैसे- पशु/मानव/वाहन के निशान एकत्र किए जाते हैं। समय, तारीख एवं जी.पी.एस. स्थान नोट किया जाता है।
  • शिकार की आशंका: यदि शिकार का संदेह हो, तो शव पर बाहरी साक्ष्य, जैसे- घाव, गोली के निशान या जहर के लक्षण देखे जाते हैं।

पोस्टमॉर्टम प्रक्रिया

  • सैंपल संग्रह: NTCA के दिशानिर्देशों के अनुसार रक्त, शारीरिक तरल पदार्थ, ऊतक, बाल/फर, दाँत/हड्डी के टुकड़े और अन्य वस्तुएँ, जैसे- बारूद, कपड़े के रेशे, कारतूस, गोली या पैरों के निशान एकत्र किए जाते हैं।
  • पैकेजिंग: सैंपल पारदर्शी पॉलीथीन बैग में रखे जाते हैं और उन पर प्रदर्शनी संख्या एवं विवरण के साथ लेबल लगाया जाता है।
  • पोस्टमॉर्टम का स्थान और समय: पोस्टमॉर्टम को खोज स्थल के पास और दिन के उजाले में करना चाहिए। महत्वपूर्ण सैंपल बाद में जाँच के लिए एकत्र किए जाते हैं।
  • प्रतिनिधियों की उपस्थिति: NTCA, मुख्य वन्यजीव वार्डन एवं स्थानीय NGO के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में पोस्टमॉर्टम होता है।
  • यदि टीम उपलब्ध न हो: शव को डीप फ्रिज में संग्रहित किया जाता है।
  • रिपोर्ट: अंतिम पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मुख्य वन्यजीव वार्डन और NTCA को भेजी जाती है।

सावधानियाँ

  • पोस्टमॉर्टम दिन के उजाले में और सभी हितधारकों की उपस्थिति में हो ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
  • सैंपल को सावधानीपूर्वक एकत्र और लेबल किया जाए।
  • यदि तत्काल पोस्टमॉर्टम संभव न हो, तो शव को डीप फ्रिज में संरक्षित करना चाहिए।
  • शव को पूरी तरह जलाने से पहले सभी साक्ष्यों का दस्तावेजीकरण करना चाहिए।

प्रत्येक बाघ के शव का पोस्टमोर्टम क्यों आवश्यक है

  • शिकार पर नियंत्रण: अप्राकृतिक मृत्यु की जाँच से शिकार और अवैध व्यापार को रोका जा सकता है।
  • बीमारी की रोकथाम: संक्रामक रोगों की पहचान से बाघों की आबादी को बचाया जा सकता है।
  • पारिस्थितिक संतुलन: बाघ जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनकी मृत्यु की जाँच से वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
  • कानूनी जवाबदेही: गलत प्रक्रियाओं को रोकने के लिए पारदर्शी जाँच अनिवार्य है।

गलत प्रक्रिया की सजा

  • कानूनी कार्रवाई: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत शव को जलाने या गलत प्रक्रिया अपनाने पर सजा एवं जुर्माना हो सकता है।
  • निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई: बालाघाट मामले में एक डिप्टी रेंजर और वन रक्षक को निलंबित किया गया और छह अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
  • प्रतिष्ठा को नुकसान: ऐसी घटनाएँ वन विभाग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती हैं।

चुनौतियाँ

  • कर्मचारी कमी: मध्य प्रदेश में 30% बीट गार्ड्स की कमी है, जिससे निगरानी और जाँच प्रभावित होती है।
  • प्रशिक्षण की कमी: कर्मचारियों को NTCA दिशानिर्देशों के पालन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
  • पारदर्शिता की कमी: स्थानीय कर्मचारियों द्वारा सूचना छिपाने की प्रवृत्ति, जैसा कि बालाघाट मामले में देखा गया।
  • संसाधनों की कमी: फोरेंसिक जाँच और सैंपल संग्रह के लिए उपयुक्त उपकरण व बुनियादी ढांचे की कमी है।
  • शिकार एवं मानव-वन्यजीव संघर्ष: शिकार, विद्युतीकरण एवं सड़क दुर्घटनाएँ बाघों की मृत्यु के प्रमुख कारण हैं।

आगे की राह

  • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: वन कर्मचारियों को NTCA दिशानिर्देशों एवं फोरेंसिक जाँच के लिए प्रशिक्षित करना
  • तकनीकी उपयोग: AI-सक्षम कैमरा ट्रैप और ड्रोन निगरानी को बढ़ावा देना
  • पारदर्शिता: सभी हितधारकों को शामिल करके और प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण करके पारदर्शिता सुनिश्चित करना
  • कानूनी अनुपालन: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और NTCA दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन
  • सामुदायिक सहभागिता: स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल करना, जैसे कि पेंच टाइगर रिजर्व में अनुभूति कार्यक्रम
  • संसाधन आवंटन: फोरेंसिक जाँच और निगरानी के लिए अधिक संसाधन व कर्मचारी नियुक्त करना
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