चर्चा में क्यों ?
- उत्तर भारत के पारंपरिक कपास उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कपास की खेती का क्षेत्र लगातार घट रहा है।
- किसान कपास की जगह धान और अन्य फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। इसके प्रमुख कारण हैं धान की सुनिश्चित सरकारी खरीद, अपेक्षाकृत स्थिर आय, बढ़ती खेती लागत और बार-बार होने वाले कीट प्रकोप।
- इन तीनों राज्यों को भारत का उत्तरी कपास क्षेत्र (Northern Cotton Zone) कहा जाता है।

प्रमुख आँकड़े
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राज्य
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पिछले वर्ष कपास क्षेत्र
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वर्तमान वर्ष कपास क्षेत्र
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गिरावट
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पंजाब
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1.28 लाख हेक्टेयर
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0.80 लाख हेक्टेयर
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37.5%
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हरियाणा
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3.80 लाख हेक्टेयर
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2.95 लाख हेक्टेयर
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लगभग 85,000 हेक्टेयर
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राजस्थान
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6.55 लाख हेक्टेयर
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5.34 लाख हेक्टेयर
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18.5%
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कुल
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11.83 लाख हेक्टेयर
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9.09 लाख हेक्टेयर
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23.2%
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पंजाब में कपास की खेती में दीर्घकालिक गिरावट
- पंजाब में 1980 के दशक के अंत में लगभग 7 लाख हेक्टेयर भूमि पर कपास की खेती होती थी।
- कई वर्षों तक कपास का क्षेत्र 4–5 लाख हेक्टेयर से अधिक रहा।
- अब यह घटकर लगभग 80,000 हेक्टेयर रह गया है।
- 2015 के सफेद मक्खी (Whitefly) प्रकोप के बाद गिरावट तेज हुई।
- 2021 के बाद गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) के बार-बार प्रकोप ने समस्या को और बढ़ाया।
किसान कपास की खेती से क्यों दूर हो रहे हैं?
1. धान की सुनिश्चित सरकारी खरीद :-किसान धान को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसमें:
- सरकारी खरीद की सुविधा ,न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ,व्यापक मंडी नेटवर्क ,अपेक्षाकृत निश्चित आय ,समय पर भुगतान जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
- इसके विपरीत, कपास में उत्पादन और बाजार दोनों का जोखिम अधिक है।
2. बार-बार होने वाले कीट प्रकोप
- कपास की फसल को मुख्य रूप से:सफेद मक्खी (Whitefly) ,गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) जैसे कीट नुकसान पहुँचाते हैं।
- इनसे उत्पादन और कपास के रेशे की गुणवत्ता, दोनों प्रभावित होते हैं।
3. बीटी कपास की प्रभावशीलता में कमी
- बीटी कपास ने शुरुआत में कई सुंडी प्रजातियों से अच्छी सुरक्षा प्रदान की। लेकिन लंबे समय तक लगातार बीटी कपास के प्रयोग के कारण कुछ कीटों में प्रतिरोधकता (Resistance) विकसित हो गई है, विशेषकर गुलाबी सुंडी में।
4. खेती की बढ़ती लागत
- कपास की खेती में किसानों का खर्च बढ़ रहा है, जैसे:कीटनाशक ,कीट नियंत्रण ,बीज ,सिंचाई ,अन्य कृषि इनपुट यदि उत्पादन कम हो जाए, तो कपास की खेती आर्थिक रूप से कम आकर्षक हो जाती है।
5. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार
- पंजाब के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर मालवा क्षेत्र, में ट्यूबवेल सिंचाई के विस्तार से धान की खेती संभव हुई है। पहले जिन क्षेत्रों में भूजल की सीमित उपलब्धता के कारण कपास की ओर रुझान था, वहाँ अब किसान धान की ओर बढ़ रहे हैं।
गुलाबी सुंडी क्या है?
- गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का वैज्ञानिक नाम Pectinophora gossypiella है। यह कपास का एक प्रमुख कीट है।
- इसकी लार्वा अवस्था में सुंडी कपास की डोडियों (Bolls) के अंदर प्रवेश करके विकसित हो रहे बीज और रेशों को नुकसान पहुँचाती है।
प्रमुख प्रभाव
- कपास की उपज में कमी
- बीजों को नुकसान
- रेशे का रंग खराब होना
- रेशे की गुणवत्ता में गिरावट
- कीटनाशकों पर अधिक खर्च
- किसानों को आर्थिक नुकसान
बीटी कपास क्या है?
- बीटी कपास (Bt Cotton) एक आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) कपास है, जिसमें मिट्टी में पाए जाने वाले जीवाणु Bacillus thuringiensis से प्राप्त जीन डाले जाते हैं।
- भारत में प्रमुख बीटी कपास संकरों में cry1Ac और cry2Ab जैसे जीन पाए जाते हैं।
- ये जीन ऐसे Bt प्रोटीन बनाते हैं जो कुछ विशेष सुंडी प्रजातियों के लिए विषैले होते हैं।
गुलाबी सुंडी के प्रति बीटी कपास कमजोर क्यों पड़ रहा है?
- यह मुख्य रूप से विकासवादी प्रतिरोध (Evolutionary Resistance) का मामला है।
- गुलाबी सुंडी मुख्यतः कपास पर निर्भर रहने वाला एकभक्षी (Monophagous) कीट है। इसलिए कपास के खेतों में इसकी आबादी लंबे समय तक बीटी प्रोटीन के संपर्क में रहती है।
- समय के साथ प्रक्रिया इस प्रकार होती है:लगातार बीटी का संपर्क → प्रतिरोधी कीटों का चयन → प्रतिरोधी आबादी में वृद्धि → बीटी कपास की प्रभावशीलता में कमी
- गुलाबी सुंडी का जीवन-चक्र अपेक्षाकृत छोटा, लगभग 25–35 दिन, होने के कारण एक मौसम में इसकी कई पीढ़ियाँ विकसित हो सकती हैं। इससे प्रतिरोध विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
महत्वपूर्ण अंतर
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कीट
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प्रकृति
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गुलाबी सुंडी
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एकभक्षी (Monophagous)
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अमेरिकन सुंडी
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बहुभक्षी (Polyphagous)
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बहुभक्षी कीट कई अलग-अलग फसलों पर भोजन कर सकते हैं, जैसे मक्का, ज्वार, टमाटर, भिंडी, चना और लोबिया।
क्या बीटी कपास असफल हो गई है?
बीटी कपास ने भारत में शुरुआती वर्षों में कपास उत्पादन बढ़ाने और कई सुंडी प्रजातियों से होने वाले नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालाँकि, कुछ क्षेत्रों में इसकी प्रभावशीलता कम हुई है। इसके कारण हैं:
- कीटों में प्रतिरोधकता का विकास
- समान बीटी लक्षणों का बार-बार प्रयोग
- कीटों की आबादी में बदलाव
- उचित कीट प्रबंधन का अभाव
इसलिए समाधान केवल बीटी कपास को छोड़ना नहीं है। इसके बजाय एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM), बेहतर किस्मों, कीट निगरानी और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाना आवश्यक है।
कपास की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ
- कपास एक उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय फसल है। इसे सामान्यतः अर्ध-शुष्क पौधा (Semi-xerophyte) माना जाता है।
तापमान
- अच्छे अंकुरण के लिए न्यूनतम तापमान: लगभग 15°C
- वनस्पतिक वृद्धि के लिए अनुकूल तापमान: 21–27°C
- लगभग 43°C तक तापमान सहन कर सकती है।
- फलन के समय गर्म दिन और ठंडी रातें कपास की डोडी एवं रेशे के विकास के लिए अनुकूल होती हैं।
मिट्टी
कपास के लिए अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी आवश्यक है। यह जलभराव के प्रति संवेदनशील है।
- उत्तर भारत: जल-निकास वाली जलोढ़ मिट्टी
- मध्य भारत: काली चिकनी मिट्टी
- दक्षिण भारत: काली एवं मिश्रित काली-लाल मिट्टी
भारत के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र
भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों को तीन कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में बाँटा जाता है।
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क्षेत्र
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प्रमुख राज्य
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उत्तरी क्षेत्र
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पंजाब, हरियाणा, राजस्थान
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मध्य क्षेत्र
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गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश
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दक्षिणी क्षेत्र
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तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक
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भारत में कपास की प्रमुख प्रजातियाँ
भारत विश्व का ऐसा प्रमुख देश है जहाँ कपास की चारों प्रमुख प्रजातियों की खेती की जाती है:
- Gossypium arboreum – एशियाई कपास
- Gossypium herbaceum – एशियाई कपास
- Gossypium barbadense – मिस्री कपास
- Gossypium hirsutum – अमेरिकी अपलैंड कपास
कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारी उपाय
1. कपास उत्पादकता मिशन
केंद्र सरकार ने 2026–27 से 2030–31 की अवधि के लिए कपास उत्पादकता मिशन को मंजूरी दी है।
- कुल परिव्यय: ₹5,659 करोड़
- लक्ष्य: कपास की लिंट उत्पादकता को 441 किग्रा/हेक्टेयर से बढ़ाकर 755 किग्रा/हेक्टेयर करना।
प्रमुख क्षेत्र
- अधिक उपज देने वाले बीजों का विकास
- उच्च घनत्व रोपण प्रणाली (HDPS)
- निकट दूरी पर रोपण
- जिनिंग और प्रसंस्करण का आधुनिकीकरण
- कपास परीक्षण सुविधाओं में सुधार
- मंडियों का डिजिटल एकीकरण
- कपास की गुणवत्ता और ब्रांडिंग में सुधार
2. कपास किसान ऐप
- कपास किसान ऐप किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत कपास खरीद की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है।
3. कस्तूरी कॉटन भारत
कस्तूरी कॉटन भारत पहल का उद्देश्य है:
- भारतीय कपास की गुणवत्ता में सुधार
- ब्रांडिंग
- ट्रेसेबिलिटी/उत्पत्ति की पहचान
- वैश्विक बाजार में भारतीय कपास की स्थिति मजबूत करना
4. भारतीय कपास निगम (CCI)
- Cotton Corporation of India (CCI) वह सरकारी एजेंसी है जो कपास की कीमत MSP से नीचे जाने पर MSP के तहत खरीद करती है।
कपास की खेती में गिरावट क्यों महत्वपूर्ण है?
- कपास केवल एक नकदी फसल नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी एक बड़ी मूल्य शृंखला है:किसान → जिनिंग → कताई → वस्त्र उद्योग → परिधान → निर्यात
- इसलिए कपास उत्पादन में गिरावट का प्रभाव पड़ सकता है:
- किसानों की आय पर
- वस्त्र उद्योग पर
- ग्रामीण रोजगार पर
- कपास निर्यात पर
- कच्चे माल की उपलब्धता पर
- वैश्विक कपास बाजार में भारत की स्थिति पर
यह सरकार के 5F विजन से भी जुड़ा है: -Farm → Fibre → Factory → Fashion → Foreign
अर्थात्: खेत → रेशा → कारखाना → फैशन → विदेशी बाजार
आगे की राह
1. एकीकृत कीट प्रबंधन को बढ़ावा
- जैविक, सांस्कृतिक, यांत्रिक और रासायनिक उपायों को मिलाकर कीटों का नियंत्रण किया जाए, ताकि केवल कीटनाशकों या एक ही बीटी लक्षण पर निर्भरता कम हो।
2. कीट एवं जलवायु-सहिष्णु किस्में विकसित करना
- ऐसी कपास किस्मों पर अनुसंधान बढ़ाना चाहिए जो गुलाबी सुंडी, गर्मी और बदलते वर्षा पैटर्न का सामना कर सकें।
3. कीट निगरानी मजबूत करना
- गुलाबी सुंडी की समय रहते पहचान होने पर फसल नुकसान को कम किया जा सकता है।
4. बाजार समर्थन में सुधार
- बेहतर मूल्य, समय पर सरकारी खरीद और भरोसेमंद बाजार उपलब्ध कराकर कपास की खेती को किसानों के लिए अधिक लाभदायक बनाया जा सकता है।
5. टिकाऊ फसल प्रणाली को बढ़ावा
- फसल चयन में केवल आय ही नहीं, बल्कि जल उपलब्धता और पर्यावरणीय स्थिरता को भी ध्यान में रखना चाहिए।
FAQs
1. उत्तर भारत में कपास की खेती क्यों घट रही है?
उत्तर: कपास की खेती में गिरावट के प्रमुख कारण सफेद मक्खी और गुलाबी सुंडी का प्रकोप, बीटी कपास की घटती प्रभावशीलता, बढ़ती खेती लागत, कम एवं अनिश्चित उपज तथा धान की अपेक्षाकृत सुनिश्चित सरकारी खरीद हैं।
2. भारत के उत्तरी कपास क्षेत्र में कौन-कौन से राज्य शामिल हैं?
उत्तर: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान भारत के उत्तरी कपास क्षेत्र में शामिल हैं।
3. गुलाबी सुंडी क्या है?
उत्तर: गुलाबी सुंडी (Pectinophora gossypiella) कपास की एक प्रमुख कीट प्रजाति है। इसकी लार्वा कपास की डोडियों में प्रवेश करके बीज और रेशे को नुकसान पहुँचाती है, जिससे उपज और रेशे की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।
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