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डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी एवं कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला

वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले गंभीर रूप से संकटग्रस्त एक वृक्ष प्रजाति ‘डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी’ को क्षति पहुँचाने वाले एक नए कवकीय रोग के संबंध में चेतावनी जारी की है।

पश्चिमी घाट के लुप्तप्राय वृक्ष के बारे में 

  • वैज्ञानिक नाम : डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी (Dipterocarpus bourdillonii)
  • कुल (फैमिली) : डिप्टेरोकार्पेसी
  • स्थिति : यह IUCN रेड लिस्ट में सूचीबद्ध ‘अतिसंकट ग्रस्त’ (Critically Endangered) वृक्ष प्रजाति है।
  • भूमिका : भारत के पश्चिमी घाटों में स्थानिक यह वृक्ष वर्षावन की छतरी (कैनोपी) संरचना और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका निभाता है।
  • उपयोग : आर्थिक रूप से इसकी मज़बूत लकड़ी निर्माण एवं फर्नीचर के लिए मूल्यवान है जबकि इसके ओलियोरेसिन (लकड़ी का तेल) का पारंपरिक औषधीय व औद्योगिक उपयोग किया जाता है।
  • खतरें : अत्यधिक दोहन एवं आवास क्षति के कारण यह प्रजाति पहले से ही गंभीर खतरों का सामना कर रही है।
    • हालिया जैविक खतरा इसकी सुरक्षा एवं संरक्षण उपायों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

कवक के बारे में

  • वैज्ञानिक नाम : कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला (Corynespora cassiicola)
  • आक्रामकता : यह एक व्यापक फाइटोपैथोजेन है जो 530 से अधिक वनस्पति प्रजातियों में लीफ स्पॉट एवं टारगेट स्पॉट व झुलसा रोग उत्पन्न करता है जिसमें रबर, सोयाबीन, टमाटर, खीरा, कपास जैसी आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण फसलें और औषधीय व सजावटी पौधे शामिल हैं। 
  • अनुकूल परिस्थितियाँ : यह गर्म व आर्द्र जलवायु में पनपता है और वायु, पानी एवं मानवीय गतिविधियों के माध्यम से कोनिडिया (कवक द्वारा उत्पादित बीजाणु) के माध्यम से प्रसारित होता है। 
  • प्रभाव : यह रोगाणु प्रकाश संश्लेषण को बाधित करता है, जिससे पत्ते झड़ जाते हैं, उपज कम हो जाती है और गंभीर मामलों में पौधे की मौत हो जाती है।
  • शमन : 
    • रोगज़नक़ के प्रबंधन में प्रतिरोधी किस्मों, सांस्कृतिक प्रथाओं (जैसे- उचित अंतराल एवं संक्रमित भागों को हटाना) तथा मैन्कोज़ेब व एज़ोक्सीस्ट्रोबिन जैसे कवकनाशकों का उपयोग शामिल है।
    • रोग के प्रभाव को कम करने और प्रकोप की रोकथाम के लिए प्रारंभिक पहचान एवं एकीकृत रोग प्रबंधन महत्वपूर्ण है।

हालिया शोध के बारे में

  • माइकोस्फीयर जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार, डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी को प्रभावित करने वाले रोगज़नक़ कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला का यह पहला उदाहरण दर्ज किया गया है, जिससे गंभीर संरक्षण संबंधी चिंताएँ पैदा हो गई हैं।

  • यह अध्ययन रोग की महामारी विज्ञान को समझने, प्रभावी रोग प्रबंधन रणनीतियों का मार्गदर्शन करने और इस संकटग्रस्त प्रजाति की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
  • केरल में डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी को संक्रमित करने वाले कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला की जांच मॉर्फो-मॉलिक्यूलर उपकरणों का उपयोग करके की गई है। 
  • आणविक पहचान सटीक रोगज़नक़ पहचान सुनिश्चित करती है, आकृति विज्ञान-आधारित विधियों की सीमाओं को पार करती है और शीघ्र निदान एवं निगरानी की सुविधा प्रदान करती है।
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