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राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ

संदर्भ 

  • हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के परिणामों ने राज्य में एक दिलचस्प संवैधानिक स्थिति पैदा कर दी है। अभिनेता से राजनेता बने सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेट्री कज़गम (TVK) को मात्र 10 सीटें हासिल हुईं, जो बहुमत के आंकड़े (118) से काफी दूर थी। हालांकि, अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन और राज्यपाल को 120 सदस्यों का समर्थन पत्र सौंपने के बाद, उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। यह घटनाक्रम एक बार फिर भारतीय संविधान के तहत त्रिशंकु विधानसभा और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों पर बहस को जन्म देता है।    

संवैधानिक ढांचा और राज्यपाल की भूमिका 

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(1) स्पष्ट करता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी। सामान्य परिस्थितियों में, जब किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता है, तो राज्यपाल के पास उस दल के नेता को आमंत्रित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। 
  • लेकिन, त्रिशंकु विधानसभा (जहां किसी को स्पष्ट बहुमत न हो) की स्थिति में राज्यपाल की भूमिका नाममात्र प्रमुख से परिवर्तित होकर निर्णायक हो जाती है। इस संबंध में सरकारिया आयोग (1987) और पुंछी आयोग (2010) ने स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में सरकार बनाने के कुछ महत्वपूर्ण वरीयता क्रम सुझाए हैं: 
    • चुनाव पूर्व गठबंधन (Pre-poll alliance)
    • सबसे बड़ा एकल दल (Single largest party), जिसे अन्य का समर्थन प्राप्त हो।
    • चुनाव पश्चात गठबंधन (Post-poll alliance), जिसमें सभी दल सरकार में शामिल हों।
    • चुनाव पश्चात गठबंधन, जहां कुछ दल बाहर से समर्थन दें। 

विवाद और न्यायिक हस्तक्षेप 

  • इतिहास गवाह है कि राज्यपालों ने इन सिफारिशों का पालन करने में हमेशा एकरूपता नहीं दिखाई है। जहाँ 2017 में गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी (कांग्रेस) के बजाय चुनाव पश्चात गठबंधन (भाजपा) को प्राथमिकता दी गई, वहीं 2018 में कर्नाटक में चुनाव पश्चात गठबंधन के दावे को दरकिनार कर सबसे बड़े दल को मौका दिया गया। 2019 का महाराष्ट्र घटनाक्रम भी राज्यपाल की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाता है। 

न्यायपालिका द्वारा राज्यपाल के विवेकाधिकार को नियंत्रित करने का प्रयास 

  • एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बहुमत का परीक्षण राजभवन में नहीं, बल्कि सदन के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए। 
  • रामेश्वर प्रसाद मामला (2006) : इस निर्णय ने पुनः स्थापित किया कि राज्यपाल का उद्देश्य एक स्थिर सरकार का गठन होना चाहिए, न कि किसी विशेष राजनीतिक हित को साधना। 

तमिलनाडु की स्थिति और भविष्य की राह 

  • तमिलनाडु के वर्तमान संदर्भ में, टीवीके का दावा चुनाव पश्चात गठबंधन पर टिका था। यहाँ संवैधानिक बारीकी यह है कि सरकार को सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होती है, न कि हमेशा कुल सदस्य संख्या की। राज्यपाल द्वारा टीवीके प्रमुख को शपथ दिलाना इस विश्वास पर आधारित है कि वे सदन में अपना बहुमत सिद्ध कर देंगे। 

निष्कर्ष और सुझाव 

  • राज्यपाल का पद केंद्र के प्रतिनिधि के बजाय राज्य के संरक्षक का होना चाहिए। इस दिशा में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति की हालिया सिफारिश अत्यंत महत्वपूर्ण है। वस्तुतः समिति ने सुझाव दिया है कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को नियंत्रित करने वाले नियमों को संविधान की एक नई अनुसूची में संहिताबद्ध (Codify) किया जाना चाहिए। 
  • जब तक ये शक्तियाँ लिखित नियमों में नहीं बांधी जाएंगी, तब तक राज्यपालों के निर्णयों में असंगतता और राजनीतिक पक्षपात की गुंजाइश बनी रहेगी। यद्यपि लोकतंत्र की गरिमा तभी सुरक्षित है जब संवैधानिक प्रमुख अपनी शक्तियों का प्रयोग सद्भावनापूर्वक और स्थापित लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप करें।
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