संदर्भ
- भारत ने विमानन मौसम निगरानी और हवाई यात्रा को अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय (IGI) हवाई अड्डे पर देश की पहली स्काईकास्ट प्रणाली (SkyCast System) का उद्घाटन किया।
- इस अत्याधुनिक तकनीक के सफल संस्थापन (Establishment) के साथ ही भारत विमानन क्षेत्र में अभूतपूर्व क्षमता हासिल करने वाला विश्व का 19वां देश बन गया है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर केवल 18 देशों के पास ही ऐसी उन्नत प्रणालियाँ उपलब्ध हैं।
स्काईकास्ट प्रणाली के बारे में
- स्काईकास्ट मूल रूप से एक एकीकृत वायुमंडलीय रिमोट सेंसिंग प्रणाली (Integrated Atmospheric Remote Sensing System) है।
- यह प्रणाली रनवे पर घने कोहरे की निगरानी, ट्रबुलेंस (वायुमंडलीय विक्षोभ) का सटीक पता लगाने और गंभीर मौसम के तात्कालिक पूर्वानुमान के लिए कई अत्याधुनिक तकनीकों को एक साथ जोड़ती है।
प्रमुख तकनीकी घटक:
व्यापक और वास्तविक समय (Real-time) की वायुमंडलीय जानकारी प्रदान करने के लिए स्काईकास्ट में निम्नलिखित उपकरणों को एकीकृत किया गया है:
- रडार विंड प्रोफाइलर (Radar Wind Profiler): यह स्काईकास्ट का मुख्य आधार है, जो हवाई अड्डे से लगभग 3 किलोमीटर ऊपर तक हवा की गति, दिशा, ट्रबुलेंस, ऊर्ध्वाधर वेग और बाउंड्री लेयर की गतिशीलता को लगातार मापता है।
- एसओडीएआर (SODAR - Sonic Detection and Ranging): यह ध्वनि तरंगों के माध्यम से निचले वायुमंडल का निरीक्षण करने के लिए।
- माइक्रोवेव रेडियोमीटर (Microwave Radiometer): यह वायुमंडल में नमी और तापमान के प्रोफाइल की मैपिंग के लिए ।
- ग्राउंड-बेस्ड फॉग एरोसोल स्पेक्ट्रोमीटर (GFAS): कोहरे की बूंदों, एरोसोल और एरोसोल-कोहरे की आपसी अंतःक्रियाओं (Interactions) का विस्तृत विश्लेषण करने के लिए।
- सीएल61 लिडार-आधारित सीलोमीटर (CL61 LiDAR-based Ceilometer): यह उपकरण कोहरे की ऊर्ध्वाधर (Vertical) संरचना की निरंतर निगरानी करता है, जिससे कोहरे के निर्माण और दृश्यता (Visibility) में कमी के कारणों को समझा जा सकता है।
टेक-ऑफ और लैंडिंग होगी अधिक सुरक्षित
- विमानन संचालन में विमान के टेक-ऑफ और लैंडिंग के चरण सबसे संवेदनशील होते हैं। हवा के रुख में अचानक बदलाव (विंड शीयर) या दृश्यता का कम होना बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है। स्काईकास्ट प्रणाली रनवे पर निगरानी और पूर्व-चेतावनी क्षमताओं को अत्यधिक मजबूत करेगी, जिससे कठिन मौसम स्थितियों में भी टेक-ऑफ और लैंडिंग को सुरक्षित बनाया जा सकेगा।
- यह प्रणाली कोहरे, एरोसोल, ट्रबुलेंस, नमी और दृश्यता के वास्तविक समय के डेटा को एक उन्नत विमानन मौसम सूचना प्रणाली में समाहित करती है। इसके माध्यम से
- पायलटों और एयरलाइनों को सटीक और समय पर उड़ान परामर्श मिलेंगे।
- हवाई अड्डा संचालकों और हवाई यातायात प्रबंधन (ATM) एजेंसियों को निर्णय लेने में सुगमता होगी, जिससे उड़ानों के मार्ग परिवर्तन (Diversion) और विलंब में कमी आएगी।
स्काईकास्ट प्रणाली का वैज्ञानिक आधार
- स्काईकास्ट प्रणाली का विकास अचानक नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे वर्षों का वैज्ञानिक अनुसंधान है। इसका मुख्य आधार विंटर फॉग एक्सपेरिमेंट (WFOEX) है, जिसे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आईआईटीएम (IITM - भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान) और आईएमडी (IMD - भारत मौसम विज्ञान विभाग) द्वारा संयुक्त रूप से वर्ष 2015 में आईजीआई हवाई अड्डे पर शुरू किया गया था।
- डब्ल्यूएफओईएक्स (WFOEX) के माध्यम से वैज्ञानिकों ने कोहरे के निर्माण की प्रक्रिया, एरोसोल-बादल की परस्पर क्रिया, दृश्यता में कमी और शहरी सीमा-परत (Urban Boundary-Layer) प्रक्रियाओं की गहरी समझ विकसित की। इसी शोध ने इस अगली पीढ़ी की परिचालन प्रणाली (Operational System) के मार्ग को प्रशस्त किया है।
बहुआयामी अनुप्रयोग (Multidimensional Applications)
हालाँकि स्काईकास्ट को प्राथमिक रूप से विमानन क्षेत्र के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन इसके अवलोकन और डेटा का उपयोग अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी किया जाएगा:
- उन्नत पूर्वानुमान मॉडल: मौसम के अधिक सटीक मॉडल्स विकसित करने में।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): एआई-सक्षम निर्णय समर्थन प्रणालियों (Decision Support Systems) को सुदृढ़ करने में।
- शहरी योजना: शहरी मौसम पूर्वानुमान और आपदा तैयारियों को बेहतर बनाने में।
- पर्यावरण प्रबंधन: वायु प्रदूषण प्रबंधन और परिवहन परामर्श जारी करने में सहायक।
मिशन मौसम और भारत की प्रतिबद्धता
- स्काईकास्ट प्रणाली की स्थापना भारत सरकार के महत्वाकांक्षी मिशन मौसम (Mission Mausam) के दृष्टिकोण के सर्वथा अनुरूप है। यह प्रणाली वैज्ञानिक नवाचार के माध्यम से देश में मौसम-अनुकूल बुनियादी ढांचे (Weather-Resilient Infrastructure) के निर्माण और विमानन क्षमता को वैश्विक स्तर पर ले जाने के प्रति भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।
- यह तकनीक न केवल विमानन सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, बल्कि आर्थिक नुकसान को कम कर भारतीय विमानन क्षेत्र को अधिक विश्वसनीय और सुदृढ़ बनाएगी।